Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने दुमका के काठीकुंड थाना क्षेत्र में पुलिस टीम पर हुए हमले और पाकुड़ के तत्कालीन एसपी समेत पांच पुलिसकर्मियों की हत्या से जुड़े यूएपीए मामले में आरोपी राज कुमार भगत उर्फ राजकुमार भगत की जमानत याचिका खारिज कर दी है.
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कोर्ट ने अपीलकर्ता राज कुमार भगत की क्रिमिनल अपील पर यह फैसला सुनाया. अपीलकर्ता ने दुमका के जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-III द्वारा 2 फरवरी 2026 को नियमित जमानत देने से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी.
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पहले भी 20 जुलाई 2023 को आरोपी की जमानत अपील को मेरिट पर खारिज किया जा चुका है. उस समय कोर्ट ने केस डायरी के पैरा 150 और 151 में स्वतंत्र गवाहों के बयान का उल्लेख किया था, जिसमें आरोपी का नाम 29 जून 2013 को जमानी में प्रतिबंधित संगठन एमसीसी की बैठक में शामिल होने वालों में आया था. कोर्ट के अनुसार, इस बैठक में गंभीर अपराध की साजिश रचे जाने का आरोप है और इसके तीन दिन बाद 2 जुलाई 2013 को पुलिस टीम पर हमला हुआ था.
तीन साल 10 माह से जेल में है आरोपी
आरोपी की ओर से दलील दी गयी कि वह 7 नवंबर 2022 से जेल में है और करीब तीन साल 10 माह से न्यायिक हिरासत में है. उसके वकील ने कहा कि एफआईआर में उसका नाम नहीं है, उसके पास से कोई आपत्तिजनक बरामदगी नहीं हुई और उसके खिलाफ प्रत्यक्ष या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी नहीं है. यह भी कहा गया कि अभियोजन ने 47 गवाहों को सूचीबद्ध किया है, जिनमें 12 की ही गवाही हुई है और 35 गवाहों की गवाही अभी बाकी है.
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि इसी मामले में सह-आरोपी को हाइकोर्ट से जमानत मिल चुकी है, इसलिए उसे भी समानता (पैरिटी) के आधार पर जमानत दी जानी चाहिए.
कोर्ट ने समानता की दलील नहीं मानी
खंडपीठ ने कहा कि सह-आरोपियों को मिली जमानत के आधार पर वर्तमान आरोपी को स्वत: जमानत नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने पाया कि सह-आरोपी को जमानत देते समय उनके मामले में अभियुक्त बनाए जाने के तरीके और लंबी अवधि की हिरासत जैसे अलग-अलग तथ्यों पर विचार किया गया था.
वहीं, वर्तमान आरोपी के मामले में केस डायरी के पैरा 150 और 151 में स्वतंत्र गवाहों द्वारा उसके नाम का उल्लेख करते हुए साजिश वाली बैठक में शामिल होने की विशिष्ट भूमिका बतायी गयी है. इस कारण कोर्ट ने कहा कि उसके मामले में पैरिटी का लाभ नहीं दिया जा सकता.
खंडपीठ ने कहा कि मामले में गंभीर आरोप हैं और आरोपी की संलिप्तता का उल्लेख पहले ही केस डायरी में किया जा चुका है. केवल लंबी हिरासत या मुकदमे में देरी के आधार पर इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं होगा.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान आदेश में की गयी टिप्पणियां केवल जमानत अपील के निस्तारण तक सीमित हैं और मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी के मामले को प्रभावित नहीं करेंगी.
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