अध्यात्म
प्रसाद दोनों हाथों से क्यों लिया जाता है? सिर्फ परंपरा नहीं, इसके पीछे छिपे हैं कई गहरे कारण
- Authored by: विनीत
- Updated Jul 13, 2026, 05:05 PM IST
Prasad dono hathon se kyu lete hain: क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर मंदिर में प्रसाद दोनों हाथों से क्यों लिया जाता है? क्या सिर ढककर प्रसाद लेना जरूरी है और क्या एक हाथ से प्रसाद लेना गलत माना जाता है? जानिए धार्मिक मान्यताएं क्या कहती हैं।
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प्रसाद दोनों हाथों से क्यों लिया जाता है
Prasad dono hathon se kyu lete hain: मंदिर में दर्शन के बाद जब पुजारी प्रसाद देते हैं, तो ज्यादातर लोग उसे दोनों हाथों से ग्रहण करते हैं। कई बार बड़े-बुजुर्ग यह भी कहते हैं कि प्रसाद लेते समय जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और उसे सम्मान के साथ स्वीकार करना चाहिए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दोनों हाथों से प्रसाद लेने की परंपरा क्यों बनी? क्या यह केवल धार्मिक नियम (religious belief) है या इसके पीछे कोई व्यावहारिक और सांस्कृतिक सोच भी छिपी है? दिलचस्प बात यह है कि इसका जवाब सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है। इसमें मंदिर की मर्यादा, भारतीय संस्कृति, व्यवहार और मनोविज्ञान जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं। आइए जानते हैं कि इस छोटी-सी परंपरा के पीछे इतने बड़े अर्थ क्यों छिपे हैं।
सबसे पहले समझिए 'प्रसाद' का वास्तविक अर्थ क्या है
ज्यादातर लोग प्रसाद को केवल मिठाई, फल या पंचामृत समझते हैं, जबकि संस्कृत में 'प्रसाद' का अर्थ केवल खाने की वस्तु नहीं है। इसका अर्थ है ईश्वर की कृपा, अनुग्रह, प्रसन्नता और मन की निर्मलता। पूजा के दौरान भगवान को अर्पित की गई वस्तु जब भक्तों को वापस दी जाती है, तो वह केवल भोजन नहीं रहती, बल्कि उसे ईश्वर के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि प्रसाद ग्रहण करने के तरीके को भी सम्मान और श्रद्धा से जोड़ा गया है।
दोनों हाथों से प्रसाद लेने के पीछे हैं तीन महत्वपूर्ण कारण
सबसे पहला कारण धार्मिक है। दोनों हाथ आगे बढ़ाकर प्रसाद लेना समर्पण और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। भारतीय संस्कृति में जब भी किसी गुरु, संत या बड़े व्यक्ति से आशीर्वाद या कोई पवित्र वस्तु ली जाती है, तो दोनों हाथों का उपयोग सम्मान व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
दूसरा कारण पूरी तरह व्यवहारिक है। कई बार प्रसाद में पंचामृत, सूखे मेवे, फल या छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं। यदि उन्हें एक हाथ से लिया जाए, तो उनके गिरने की संभावना बढ़ जाती है। चूंकि प्रसाद को पवित्र माना जाता है, इसलिए उसे जमीन पर गिराना उचित नहीं माना जाता। दोनों हाथ स्वाभाविक रूप से उसे सुरक्षित रखने में मदद करते हैं।
तीसरा कारण मनोवैज्ञानिक है। व्यवहार विशेषज्ञ मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति दोनों हाथों से कोई वस्तु ग्रहण करता है, तो उसकी शारीरिक भाषा सम्मान, स्वीकार्यता और विनम्रता का संकेत देती है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति ही नहीं, दुनिया की कई सभ्यताओं में भी सम्मानपूर्वक कोई वस्तु दोनों हाथों से देने और लेने की परंपरा मिलती है।
क्या शास्त्रों में दोनों हाथों से प्रसाद लेने का नियम लिखा है
धर्मशास्त्रों में प्रसाद का सम्मान करने, उसे अनादर से बचाने और श्रद्धा के साथ ग्रहण करने पर जोर दिया गया है। हालांकि ऐसा कोई व्यापक और सार्वभौमिक शास्त्रीय नियम नहीं मिलता जिसमें यह कहा गया हो कि प्रसाद केवल दोनों हाथों से ही लेना अनिवार्य है। यह परंपरा मुख्य रूप से सदाचार (आचार-व्यवहार) और मंदिरों की परंपराओं से विकसित हुई है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग मंदिरों और संप्रदायों में छोटी-छोटी परंपराओं में अंतर भी देखने को मिलता है।
क्या प्रसाद लेते समय सिर ढकना जरूरी होता है
कई मंदिरों विशेषकर कुछ वैष्णव परंपराओं, गुरुद्वारों और क्षेत्रीय धार्मिक स्थलों में सिर ढककर प्रवेश करना या प्रसाद ग्रहण करना सम्मान का प्रतीक माना जाता है। वहीं देश के अनेक मंदिरों में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं होती। कुछ आध्यात्मिक परंपराएं इसे विनम्रता और ईश्वर के प्रति आदर से जोड़कर देखती हैं। इसलिए यदि किसी मंदिर की अपनी परंपरा हो, तो उसका पालन करना शिष्टाचार माना जाता है। इसे पूरे सनातन धर्म का अनिवार्य नियम मानना सही नहीं होगा।
क्या एक हाथ से प्रसाद लेना गलत या अशुभ माना जाता है
यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार अधिकांश मान्य धर्मग्रंथों में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि एक हाथ से प्रसाद लेने पर पाप या अशुभ फल मिलता है। फिर भी जहां संभव हो, दोनों हाथों से प्रसाद लेना अधिक सम्मानजनक माना जाता है। यदि किसी विशेष परिस्थिति में व्यक्ति एक ही हाथ से प्रसाद ग्रहण करता है, तो उससे अधिक महत्वपूर्ण उसका श्रद्धा का भाव है। आस्था का मूल्य केवल बाहरी तरीके से नहीं, बल्कि मन की भावना से भी तय होता है।
प्रसाद ग्रहण करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए
मंदिर की परंपरा के अनुसार शांत मन से प्रसाद ग्रहण करें। यदि संभव हो तो दाहिने हाथ को आगे रखते हुए बाएं हाथ से उसे सहारा दें, क्योंकि कई मंदिरों में यही व्यवहारिक तरीका अपनाया जाता है। प्रसाद लेने के बाद उसे जमीन, जूते या किसी अपवित्र स्थान पर न रखें। यदि प्रसाद अधिक हो, तो उसे सम्मानपूर्वक परिवार या अन्य लोगों के साथ बांटना भी शुभ माना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रसाद को केवल भोजन नहीं, बल्कि ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया जाए।
निष्कर्ष
प्रसाद दोनों हाथों से लेने की परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है। इसके पीछे श्रद्धा, विनम्रता, मंदिर की मर्यादा, भारतीय संस्कृति और व्यवहारिक समझ सभी जुड़े हुए हैं। साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि हर मंदिर और संप्रदाय की अपनी परंपरा हो सकती है। इसलिए किसी भी धार्मिक स्थल पर वहां के नियमों और परंपराओं का सम्मान करना ही सबसे उचित माना जाता है। आखिरकार प्रसाद का सबसे बड़ा महत्व उसके रूप में नहीं, बल्कि उस भाव में है, जिसके साथ उसे भगवान का आशीर्वाद मानकर स्वीकार किया जाता है।
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विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विष... और देखें
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