अमीर बना सकता है माता लक्ष्मी का यह सिद्ध स्तोत्र, सावन के शुक्रवार से शुरू कर दें पाठ; बदल जाएगी तकदीर की तस्वीर

Published on 6 अग॰ 2026

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कनकधारा स्तोत्र पढ़ने के लाभ

Kanakdhara Stotram in Sawan Benefits: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। वहीं, इस महीने आने वाले शुक्रवार माता लक्ष्मी की उपासना के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। माना जाता है कि सावन के शुक्रवारों में माता लक्ष्मी का पूजन दरिद्रता से मुक्ति दिलाता है। खासकर अगर आप सावन में कनकधारा स्तोत्र का पाठ करते हैं तो आपको इसका लाभ कुछ ही दिनों में देखने को मिल जाता है। कनकधारा स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

कनकधारा स्तोत्र माता लक्ष्मी की स्तुति में रचा गया संस्कृत स्तोत्र है। इसकी रचना स्वयं आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी। कनकधारा की सबसे प्रसिद्ध कथा एक गरीब महिला, एक आंवले और शंकराचार्य की करुणा से जुड़ी है। मान्यता है कि महिला के पास देने के लिए कुछ नहीं था, फिर भी उसने अपने घर में उपलब्ध एक आंवला श्रद्धा के साथ भिक्षा में दे दिया। महिला की इस भावना से प्रभावित होकर शंकराचार्य ने माता लक्ष्मी की स्तुति की और इसके बाद उसके घर स्वर्ण आंवलों की वर्षा होने की कथा प्रचलित है।

इसी कथा से कनकधारा स्तोत्र को धन, समृद्धि और दरिद्रता से मुक्ति की कामना से जोड़कर देखा जाता है। इसके श्लोकों में माता लक्ष्मी के स्वरूप, उनकी करुणा, उनके शुभ दृष्टिपात और भगवान विष्णु के साथ उनके दिव्य संबंध की स्तुति की गई है।

क्या है कनकधारा स्तोत्र

कनकधारा स्तोत्र संस्कृत भाषा में रचित माता लक्ष्मी की स्तुति है। 'कनक' का अर्थ सोना और 'धारा' का अर्थ प्रवाह या धारा होता है। इस तरह कनकधारा का अर्थ सोने की धारा है। कनकधारा स्तोत्र में माता लक्ष्मी को समुद्र से उत्पन्न देवी, भगवान विष्णु की पत्नी, कमल पर विराजमान और समस्त जगत के लिए कल्याणकारी शक्ति के रूप में नमन किया गया है। इसके श्लोकों में देवी की कृपादृष्टि की कामना बार-बार की गई है।

कैसे हुई कनकधारा स्तोत्र की रचना

कनकधारा स्तोत्र की रचना से जुड़ी कथा आदिगुरु शंकराचार्य के बाल्यकाल से संबंधित मानी गई है। प्रचलित कथा के अनुसार, बालक शंकराचार्य भिक्षा मांगने के लिए एक गरीब ब्राह्मण महिला के घर पहुंचे। उस समय उस निर्धन महिला के पास भोजन के लिए देने को कुछ भी नहीं था। महिला ने घर में काफी खोजबीन की, मगर उसे ऐसा कोई भोजन नहीं मिला जिसे वह भिक्षा में दे सके। जब उसने ज्यादा खोजा तो अंत में उसे घर में एक आंवला मिला। महिला ने अपनी गरीबी और अभाव के बावजूद उस आंवले को बाल शंकराचार्य को भिक्षा में दे दिया।

उस महिला की स्थिति और उसके भाव ने शंकराचार्य को प्रभावित किया। अपने पास खुद कुछ न होने के बावजूद उसने अतिथि को खाली हाथ नहीं लौटाया। इसी करुणा और दान की भावना से प्रभावित होकर शंकराचार्य ने माता लक्ष्मी की स्तुति की।

सोने के आंवलों की होने लगी वर्षा

मान्यता है कि आदिशंकराचार्य ने स्तोत्र में माता लक्ष्मी से उस गरीब महिला की दरिद्रता दूर करने की प्रार्थना की। उनकी स्तुति से माता लक्ष्मी प्रसन्न हुईं और उन्होंने उस महिला के घर स्वर्ण आंवलों की वर्षा कर दी। इस कारण यह स्तोत्र कनकधारा कहलाया।

क्या कहता है यह स्तोत्र

कनकधारा स्तोत्र के आरंभिक श्लोकों में माता लक्ष्मी की कृपादृष्टि की कामना की गई है। देवी के नेत्रों और उनकी दृष्टि की तुलना कमल तथा भौंरों जैसे सुंदर प्राकृतिक बिंबों से की गई है। एक श्लोक में माता लक्ष्मी की उस दृष्टि की प्रार्थना की गई है जो भगवान विष्णु के मुख की ओर प्रेम और संकोच से बार-बार जाती है। दूसरे श्लोकों में देवी को भगवान विष्णु के हृदय की शोभा और संसार के कल्याण का आधार बताया गया है। स्तोत्र के आगे के हिस्से में माता लक्ष्मी को विभिन्न नामों और स्वरूपों से प्रणाम किया गया है। उन्हें श्री, कमला, भृगुनंदिनी, नारायण की प्रिया और कमलालय जैसी उपाधियों से संबोधित किया गया है।

स्तोत्र में है धन की कामना

कनकधारा स्तोत्र का उद्देश्य केवल सोना या भौतिक धन मांगना नहीं है। इसमें माता लक्ष्मी की कृपादृष्टि, कल्याण, समृद्धि और शुभ फल की कामना की गई है। एक प्रसिद्ध श्लोक में देवी की वंदना को संपत्ति प्रदान करने वाला, इंद्रियों को आनंद देने वाला और साम्राज्य तथा वैभव प्रदान करने वाला बताया गया है। दूसरे श्लोक में देवी की कृपादृष्टि से सभी प्रकार की संपदा प्राप्त होने की प्रार्थना की गई है।

कर्ज और आर्थिक परेशानी हो जाती है दूर

माता लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी माना जाता है। कनकधारा स्तोत्र में बार-बार उनकी कृपादृष्टि और संपदा की कामना की गई है। इसके पाठ को कर्ज व आर्थिक परेशानी से मुक्ति के लिए सबसे प्रभावी उपाय माना गया है। शुक्रवार को माता लक्ष्मी की आराधना का दिन माना जाता है। सावन के महीने में शुक्रवार की लक्ष्मी पूजा के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

सावन के शुक्रवार को सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा स्थान पर माता लक्ष्मी का स्मरण करें। इसके बाद दीपक जलाकर देवी को लाल पुष्प और आंवला अर्पित करें, फिर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें। इसका पाठ सुबह या शाम किया जा सकता है। माना जाता है कि इसका नियमित पाठ धन की परेशानियों को आने नहीं देता है।

सिद्ध है कननकधारा स्तोत्र

यह स्तोत्र स्वयं सिद्ध है। इस कारण इसका पाठ शीघ्र फल देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कनकधारा स्तोत्र का पाठ माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। आर्थिक परेशानियों से राहत, घर में सुख-समृद्धि, धन की स्थिरता और दरिद्रता दूर होने की कामना से इसका पाठ किया जाता है। इसका पाठ प्रतिदिन करने से कर्ज और आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलती है।

श्री कनकधारा स्तोत्र

श्लोक 1

अङ्ग हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती

भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।

अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला

माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥1॥

अर्थ: जिस प्रकार भ्रमरी अधखिले फूलों से सजे तमाल वृक्ष का आश्रय लेती है, उसी प्रकार माता लक्ष्मी की दृष्टि भगवान श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित अंगों पर पड़ती रहती है। देवी की उस कृपामयी दृष्टि में समस्त ऐश्वर्य का निवास है। मंगल की अधिष्ठात्री माता लक्ष्मी की वह शुभ दृष्टि मेरे जीवन में भी मंगल लेकर आए।

श्लोक 2

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः

प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।

माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या

सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥2॥

अर्थ: जिस प्रकार भ्रमरी बड़े कमल के फूल के आसपास बार-बार मंडराती रहती है, उसी प्रकार माता लक्ष्मी की मनोहर दृष्टि प्रेम और संकोच के कारण भगवान श्रीहरि के मुख की ओर बार-बार जाती और लौटती रहती है। समुद्र से उत्पन्न माता लक्ष्मी की वही सुंदर दृष्टिमाला मुझे धन और समृद्धि प्रदान करे।

श्लोक 3

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष –

मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।

ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध –

मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥3॥

अर्थ: माता लक्ष्मी की वह कृपादृष्टि देवताओं के राजा इंद्र के पद जैसा वैभव प्रदान करने में समर्थ है। वह भगवान विष्णु को भी अत्यंत आनंद देने वाली है और नीले कमल के भीतर के भाग के समान सुंदर है। लक्ष्मीजी की वही आधी खुली हुई दृष्टि क्षणभर के लिए मुझ पर भी पड़े और मेरा कल्याण करे।

श्लोक 4

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द –

मानन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।

आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं

भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥4॥

अर्थ: शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान विष्णु की पत्नी माता लक्ष्मी का वह नेत्र मेरे लिए ऐश्वर्य प्रदान करने वाला हो, जिसकी पुतली और भौंहें प्रेम के कारण कुछ झुकी हुई हैं। आनंद के स्वरूप भगवान मुकुंद को अपने सामने पाकर देवी की दृष्टि प्रेम और लज्जा से कुछ तिरछी हो जाती है। उनकी वही कृपादृष्टि मेरे जीवन में समृद्धि लेकर आए।

श्लोक 5

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या

हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।

कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला

कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥5॥

अर्थ: भगवान विष्णु के कौस्तुभ मणि से सुशोभित वक्षस्थल पर माता लक्ष्मी नीलमणियों की हारावली के समान शोभायमान होती हैं। उनकी कृपादृष्टि स्वयं भगवान के मन में भी प्रेम उत्पन्न करने वाली है। कमल में निवास करने वाली माता लक्ष्मी की वही कटाक्षमाला मेरे जीवन में कल्याण लेकर आए।

श्लोक 6

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारे –

र्धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।

मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्ति –

र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥6॥

अर्थ: जिस प्रकार काले बादलों के समूह में बिजली चमकती है, उसी प्रकार कैटभ नामक असुर के शत्रु भगवान विष्णु के श्याम वक्षस्थल पर माता लक्ष्मी सुशोभित होती हैं। भृगुवंश को आनंद देने वाली और समस्त संसार की माता लक्ष्मी की वह पूजनीय मूर्ति मेरे लिए मंगल और कल्याण प्रदान करे।

श्लोक 7

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत्प्रभावान्

माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।

मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं

मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥7॥

अर्थ: समुद्र की पुत्री माता लक्ष्मी की वह धीमी, कोमल और अर्धखुली दृष्टि मुझ पर भी पड़े, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान विष्णु के हृदय में अपना स्थान प्राप्त किया था। देवी की वही कृपादृष्टि मेरे जीवन में शुभता और सौभाग्य लेकर आए।

श्लोक 8

दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा –

मस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।

दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं

नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥8॥

अर्थ: भगवान नारायण की प्रिया माता लक्ष्मी के नेत्र रूपी बादल दया रूपी अनुकूल हवा से प्रेरित होकर मुझ जैसे निर्धन और दुखी व्यक्ति पर धन की वर्षा करें। देवी की कृपादृष्टि मेरे जीवन के दुख और दुष्कर्मों से उत्पन्न संताप को दूर करके सुख और समृद्धि प्रदान करे।

श्लोक 9

इष्टा विशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र –

दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।

दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां

पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥9॥

अर्थ: माता लक्ष्मी की दयापूर्ण दृष्टि जिन लोगों पर पड़ती है, वे अपनी श्रेष्ठ बुद्धि और योग्यता के साथ स्वर्ग के समान उच्च पद प्राप्त करते हैं। कमल के भीतर के भाग की तरह चमकने वाली पद्मासना लक्ष्मी की वह कृपादृष्टि मुझे मनचाही समृद्धि, उन्नति और पुष्टि प्रदान करे।

श्लोक 10

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति

शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।

सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै

तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥10॥

अर्थ: सृष्टि के समय माता लक्ष्मी ब्रह्मशक्ति के रूप में, पालन के समय विष्णुशक्ति के रूप में और संहार के समय रुद्रशक्ति के रूप में स्थित रहती हैं। वाणी की देवी, भगवान विष्णु की सुंदर प्रिया और विभिन्न दिव्य रूपों में विराजमान उस देवी को नमन है, जो तीनों लोकों के स्वामी भगवान नारायण की शक्ति हैं।

श्लोक 11

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै

रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।

शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै

पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥11॥

अर्थ: शुभ कर्मों का फल प्रदान करने वाली श्रुति के रूप में माता लक्ष्मी को प्रणाम है। सुंदर गुणों की समुद्र स्वरूपा रति के रूप में उन्हें नमस्कार है। सौ पंखुड़ियों वाले कमल में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा देवी को प्रणाम है। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु की प्रिय और पुष्टि प्रदान करने वाली माता लक्ष्मी को बार-बार नमन है।

श्लोक 12

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै

नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै।

नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै

नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥12॥

अर्थ: कमल के समान सुंदर मुख वाली माता लक्ष्मी को प्रणाम है। क्षीरसागर से उत्पन्न होने वाली देवी को नमन है। चंद्रमा और अमृत की सहोदरी माता लक्ष्मी को प्रणाम है। भगवान नारायण की प्रिय पत्नी को बार-बार नमन है।

श्लोक 13

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि

साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।

त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि

मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥13॥

अर्थ: हे कमल के समान नेत्रों वाली माता लक्ष्मी! आपकी वंदना संपत्ति प्रदान करने वाली, सभी इंद्रियों को आनंद देने वाली और महान वैभव प्रदान करने वाली है। आपकी पूजा और वंदना मनुष्य के कष्टों को दूर करने वाली है। हे पूजनीय माता! मुझे हमेशा आपके चरणों की वंदना करने का अवसर प्राप्त होता रहे।

श्लोक 14

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः

सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।

संतनोति वचनाङ्गमानसै –

स्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥14॥

अर्थ: जिन माता लक्ष्मी के कृपाकटाक्ष की उपासना करने से भक्त को जीवन के सभी मनोरथ और संपत्तियां प्राप्त होती हैं, मैं भगवान मुरारी के हृदय में निवास करने वाली उन्हीं लक्ष्मी देवी का मन, वाणी और कर्म से भजन करता हूं।

श्लोक 15

सरसिजनिलये सरोजहस्ते

धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे

त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥15॥

अर्थ: हे कमल में निवास करने वाली देवी! आपके हाथों में कमल सुशोभित है। उज्ज्वल वस्त्र, सुगंध और सुंदर मालाओं से आपका स्वरूप अत्यंत मनोहर दिखाई देता है। हे भगवान हरि की प्रिय माता लक्ष्मी! तीनों लोकों को ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 16

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट –

स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।

प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष –

लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥16॥

अर्थ: जिन माता लक्ष्मी का अभिषेक दिशाओं के हाथियों द्वारा स्वर्ण कलशों से गिराए गए पवित्र और सुंदर जल से किया जाता है, उन जगत की माता को मैं प्रातःकाल प्रणाम करता हूं। वे समस्त लोकों के स्वामी भगवान विष्णु की पत्नी और क्षीरसागर की पुत्री हैं।

श्लोक 17

कमले कमलाक्षवल्लभे

त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्‌गैः।

अवलोकय मामकिञ्चनानां

प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥17॥

अर्थ: हे कमलनयन भगवान विष्णु की प्रिय माता लक्ष्मी! मैं निर्धनों में सबसे अधिक दीन हूं और आपकी स्वाभाविक करुणा का पात्र हूं। अपनी करुणा से उमड़ती हुई कृपादृष्टि की तरंगों से मेरी ओर देखिए और मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

श्लोक 18

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं

त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।

गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो

भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥18॥

अर्थ: जो लोग प्रतिदिन इन स्तुतियों के माध्यम से वेदस्वरूपा और तीनों लोकों की माता भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे पृथ्वी पर श्रेष्ठ गुणों से संपन्न और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं। ऐसे लोगों का मन श्रेष्ठ भावों से युक्त होता है और विद्वान लोग भी उनके गुणों का सम्मान करते हैं।

॥ इस प्रकार श्रीमत् शंकराचार्य रचित कनकधारा स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ॥

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं और मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Mohit Tiwari

मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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