Published: Monday, October 5, 2026, 14:25 [IST]
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को फिलहाल सस्पेंड करने से इनकार कर दिया है। मामला चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया और उससे जुड़े करीब 14 फैसलों का है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि ये फैसले बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए।
कोर्ट ने अभी आरोपों को सही नहीं माना है। उसने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से कानून का उल्लंघन साबित हुआ, तो संबंधित फैसलों पर रोक लगाई जा सकती है या उन्हें रद्द किया जा सकता है।
ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने की मांग क्यों उठी?
इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह और वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने याचिका दायर की है। राकेश कुमार सिंह की तरफ से वरिष्ठ वकील विकास सिंह कोर्ट में पेश हुए। उनका कहना है कि चुनाव आयोग के फैसले तय प्रक्रिया के मुताबिक होने चाहिए। जहां सहमति न बने, वहां बहुमत का रास्ता है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि SIR, फॉर्म-6 में बदलाव और आयोग के दूसरे फैसलों में इस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। इसी आधार पर उन्होंने ज्ञानेश कुमार को CEC पद से हटाने या कम से कम अगली सुनवाई तक उनके कामकाज पर रोक लगाने की मांग की। उन्होंने अनूप बरनवाल केस वाली पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग भी उठाई, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति में CJI की भूमिका थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पहले चुनाव आयोग का जवाब आने दें
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी। मोहना की बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, विवेक जोशी, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और DG IT सीमा खन्ना को नोटिस जारी किया है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता की दलील एक मीडिया रिपोर्ट पर टिकी है। सिर्फ खबर के आधार पर अदालत कोई बड़ा आदेश नहीं दे सकती। पहले चुनाव आयोग का जवाब आना चाहिए। विकास सिंह ने कहा कि आयोग की अपनी प्रेस रिलीज भी है और उसने रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों को साफ तौर पर खारिज नहीं किया है।
CJI ने जवाब दिया, "पहले चुनाव आयोग को अपना पक्ष रखने दीजिए। कानून का पालन करना उसकी जिम्मेदारी है। अगर रिकॉर्ड से कानून का उल्लंघन मिला, तो कोर्ट संबंधित फैसले को पलट सकता है।"
SIR के 14 फैसलों पर क्या है विवाद?
मामले का सबसे अहम हिस्सा यही है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पिछले करीब 10 महीनों में SIR को लेकर चुनाव आयोग के अंदर मतभेद सामने आए। जिस मीडिया रिपोर्ट का याचिका में हवाला दिया गया, उसके मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई।
इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज होने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि अगर तीनों आयुक्तों के बीच सहमति नहीं थी, तो क्या संबंधित फैसले तय कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक लिए गए? यही बात अब सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के जवाब से समझना चाहता है।
2023 के कानून ने CEC को कितना ताकतवर बनाया?
विकास सिंह ने सुनवाई में 2023 के कानून और उसकी धारा 16 का भी मुद्दा उठाया। उनका दावा है कि नए कानून में CEC और चुनाव आयुक्तों को कानूनी सुरक्षा दी गई है। उन्होंने कहा कि CEC को रिटायरमेंट के बाद भी सुरक्षा मिलती है, जो उनके मुताबिक दूसरे संवैधानिक पदों के मुकाबले बहुत व्यापक है।
विकास सिंह ने कहा, "इस कानून ने CEC की स्थिति बहुत ताकतवर कर दी है। प्रधानमंत्री को भी ऐसी सुरक्षा नहीं मिली और जजों को भी इस स्तर का संरक्षण नहीं है।" जस्टिस बागची ने इस दलील पर सवाल किया कि पद पर रहते हुए सुरक्षा पहले भी कानून में मौजूद थी। जवाब में सिंह ने कहा कि नया कानून रिटायरमेंट के बाद भी सुरक्षा देता है। कोर्ट ने बताया कि इस कानून को चुनौती देने वाला मामला पहले से लंबित है।
क्या सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड कर सकता है?
यहां कानूनी स्थिति भी समझना जरूरी है। याचिकाकर्ता ने सीधे CEC को सस्पेंड करने की मांग की है। लेकिन दिए गए रिकॉर्ड में यह साफ कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 में सुप्रीम कोर्ट को CEC को सस्पेंड करने की कोई अलग या साफ शक्ति नहीं दी गई है।
हालांकि कोर्ट चुनाव आयोग के फैसलों की न्यायिक समीक्षा कर सकता है। अगर कोई फैसला कानून या संविधान के खिलाफ पाया जाता है, तो उस पर रोक लगाई जा सकती है या उसे रद्द किया जा सकता है। कोर्ट ने सुनवाई में यह भी कहा कि अगर रिकॉर्ड से पता चला कि कोई फैसला जरूरी सहमति के बिना लिया गया था, तो उसके कानूनी अधिकार पर सवाल उठ सकता है।
CEC बोले- पहले रिकॉर्ड देखेंगे, फिर फैसला होगा
वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलील रखी। उन्होंने कहा कि ऐसा कानून गलत कामों को सुरक्षा नहीं दे सकता और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने दिल्ली में SIR और फॉर्म-6 में जोड़ी गई दो नई शर्तों का भी जिक्र किया।
वहीं कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की कई मांगें आपस में जुड़ी हुई हैं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आयोग में फैसले सहमति से लेने की कोशिश होनी चाहिए, लेकिन सहमति न बनने पर कानून के मुताबिक बहुमत का रास्ता भी मौजूद है।
विपक्ष फिर ला सकता है महाभियोग प्रस्ताव
इस विवाद का राजनीतिक असर भी दिख सकता है। रिकॉर्ड के मुताबिक विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ फिर महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। अप्रैल 2026 में भी ऐसा नोटिस दिया गया था, लेकिन लोकसभा में प्रस्ताव खारिज हो गया था। राज्यसभा में मामला लंबित बताया गया है।
इस बार कांग्रेस विपक्षी दलों से बातचीत कर रही है और अगले दो हफ्तों में प्रस्ताव लाने की संभावना जताई गई है। इसके अलावा एक वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र भेजकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग भी की है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC को निलंबित नहीं किया है। अगला बड़ा सवाल चुनाव आयोग के जवाब पर टिका है। अगर आयोग रिकॉर्ड के साथ यह साबित कर देता है कि फैसले तय प्रक्रिया के मुताबिक हुए थे, तो याचिकाकर्ताओं की दलील कमजोर पड़ सकती है। लेकिन अगर कोर्ट को कानून के उल्लंघन का ठोस आधार मिलता है, तो संबंधित SIR फैसलों पर रोक या उन्हें रद्द करने का रास्ता खुल सकता है। यही इस सुनवाई का सबसे अहम कानूनी पहलू है।