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न स्टूडेंट्स, न स्टाफ, बिस्तर भी खाली... फिर किसके लिए जारी होते रहे करोड़ों रुपये? CAG ने खोली महाराष्ट्र के 'Ghost Hostels' की सच्चाई
Ghost Hostels In Maharashtra: महाराष्ट्र विधानसभा में पेश CAG की कंप्लायंस ऑडिट रिपोर्ट-2024 में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के छह 'घोस्ट हॉस्टल' पिछले चार वर्षों तक संचालित हुए बिना ही 1.62 करोड़ रुपये की सरकारी फंडिंग प्राप्त करते रहे। जालना, बुलढाणा और लातूर के इन हॉस्टलों में छात्रों के रहने के कोई सबूत नहीं मिले, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में छात्र और स्टाफ दर्ज थे। आइए जानते हैं कि आखिर ये सनसनीखेज मामला है क्या।
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महाराष्ट्र के 'भूतिया हॉस्टल' का रहस्य! जहां कभी नहीं रहे छात्र, फिर भी करोड़ों रुपये होते रहे खर्च। AI IMAGE
Ghost Hostels In Maharashtra: देश में आए दिन सरकारी धन के दुरुपयोग की खबरें सामने आती रहती हैं, लेकिन महाराष्ट्र में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। दरअसल, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य में छह ऐसे "घोस्ट हॉस्टल" (सिर्फ कागजों पर संचालित छात्रावास) हैं, जहां एक भी छात्र नहीं है।
इसके बावजूद इन हॉस्टलों को चार वर्षों तक कुल 1.62 करोड़ रुपये की सरकारी फंडिंग जारी की गई। यानी सरकारी रिकॉर्ड में छात्रावास संचालित दिखाए गए, छात्रों और स्टाफ का भी रिकॉर्ड मौजूद था, लेकिन जमीनी हकीकत में इमारतें बंद पड़ी थीं, कमरों पर धूल जमी थी और बेड खाली पड़े थे।
10 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में पेश की गई कैग (Comptroller and Auditor General) की कंप्लायंस ऑडिट रिपोर्ट-2024 में पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए संचालित सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त छात्रावासों की व्यवस्था में गंभीर खामियों का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, इन हॉस्टलों में बुनियादी ढांचे, सुरक्षा, स्वच्छता और वित्तीय प्रबंधन से जुड़ी कई बड़ी अनियमितताएं पाई गईं।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह रहा कि सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग ने पिछले चार वर्षों के दौरान ऐसे छह छात्रावासों को 1.62 करोड़ रुपये की सरकारी सहायता जारी की, जो वास्तविकता में संचालित ही नहीं हो रहे थे। CAG ने इन संस्थानों को 'घोस्ट हॉस्टल' करार देते हुए इसे सरकारी धन के गंभीर दुरुपयोग का मामला बताया है। ऑडिट टीम ने 18 सरकारी और 21 सहायता प्राप्त छात्रावासों का निरीक्षण किया। जांच में कई गंभीर खामियां सामने आईं।

महाराष्ट्र में सराकरी हॉस्टल्स को मिल रही फंडिंग की खुली पोल। AI IMAGE
दिव्यांग छात्रों के साथ भी नियमों का उल्लंघन
रिपोर्ट के अनुसार, अहिल्यानगर, धाराशिव, जालना और नागपुर के कुछ छात्रावासों में दिव्यांग छात्रों को ऊपरी मंजिल पर कमरे दिए गए, जबकि नियमों के मुताबिक उन्हें ग्राउंड फ्लोर पर कमरे आवंटित किए जाने चाहिए थे। वहीं, राज्य के 280 सरकारी हॉस्टलों में बायोमेट्रिक मशीनें लगाई गई थीं, लेकिन इनमें से केवल 46 मशीनें ही कार्यरत मिलीं।CAG ने यह भी बताया कि वर्ष 2023-24 में सरकारी छात्रावासों के लिए 487 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था, लेकिन उसमें से 56.65 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए।
किस हॉस्टल में सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा मिला?
CAG रिपोर्ट में जालना जिले के मोदीखान हॉस्टल को सबसे गंभीर मामलों में से एक बताया गया है। ऑडिट के दौरान यह छात्रावास पूरी तरह जर्जर और बंद मिला, जहां किसी छात्र के रहने के कोई निशान नहीं थे। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में यहां 38 छात्रों और एक अधीक्षक (सुपरिटेंडेंट) की मौजूदगी दर्ज थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि राज्य सरकार ने इस बंद पड़े हॉस्टल को पिछले चार वर्षों में 18 लाख रुपये मानदेय के रूप में जारी किए।
रिपोर्ट के मुताबिक, CAG की टीम जब जालना के जाफराबाद स्थित 24 छात्रों की क्षमता वाले छात्रावास पहुंची, तो वहां धूल से ढके खाली बिस्तर मिले और लंबे समय से किसी के रहने के कोई संकेत नहीं थे। जांच में जालना के चार अन्य छात्रावासों के अलावा बुलढाणा और लातूर में भी एक-एक ऐसे 'घोस्ट हॉस्टल' का खुलासा हुआ, जो सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में संचालित दिखाए जा रहे थे।
हॉस्टल से वंचित रह गए 8,930 छात्र
बता दें कि सरकार की योजना थी कि हर तालुका में एक सरकारी छात्रावास बनाया जाए, लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। इसकी वजह से 117 तालुकों के लगभग 8,930 छात्र छात्रावास की सुविधा से वंचित रह गए। रिपोर्ट के अनुसार, 49 सरकारी हॉस्टल बिना अधीक्षक के संचालित हो रहे थे, जबकि 5 लड़कियों के छात्रावासों की जिम्मेदारी पुरुष अधीक्षकों के पास थी। सरकार ने वर्ष 2020 तक 500 सरकारी छात्रावास बनाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन मार्च 2024 तक केवल 443 छात्रावास ही स्थापित हो सके। निर्माण में हुई देरी के कारण छात्र कल्याण से जुड़ी इस योजना का उद्देश्य प्रभावित हुआ।
यह मामला सिर्फ धोखाधड़ी का नहीं, बल्कि सरकारी निगरानी, सार्वजनिक धन के उपयोग और छात्र कल्याण योजनाओं की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि सरकारी रिकॉर्ड में छात्र मौजूद हों और छात्रावासों को लगातार फंड मिलता रहे, लेकिन जमीनी स्तर पर वे बंद पड़े हों, तो इसका सीधा नुकसान उन गरीब, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हजारों छात्रों को होता है, जिन्हें वास्तव में इन छात्रावासों की सबसे अधिक जरूरत है।