UP में किधर जाएंगे ब्राह्मण, FCRA बिल पर गरमाई सियासत? Coffee Par Kurukshetra - India TV Hindi

Published on 6 अग॰ 2026

उत्तर प्रदेश में अगले साल 2027 में विधानसभा चुनाव का आयोजन होना है। ऐसे में राज्य में सियासत तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संभावित गठबंधन पर लोगों की नजरें हैं और राजनीतिक दल इस मुद्दे पर भी मंथन कर रहे हैं कि इस बार यूपी के ब्राह्मण किस ओर जाएंगे। वहीं, दूसरी ओर संसद में जारी मॉनसून सत्र के दौरान FCRA बिल पर भी बहस गरमाई हुई है। इंडिया टीवी के लोकप्रिय शो 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में गुरुवार 6 अगस्त को शो के एंकर और मेहमानों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति, आगामी विधानसभा चुनाव और प्रस्तावित FCRA संशोधन बिल को लेकर विस्तृत चर्चा की। इस चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर शामिल रहे।

सपा-कांग्रेस के बीच फॉर्मूला तय

चर्चा के दौरान विश्लेषकों उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के संभावित गठबंधन पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि दोनों दलों के बीच 2017 विधानसभा चुनाव जैसा सीट बंटवारे का फॉर्मूला बनाए रखने पर सहमति बनने की चर्चा है। 2017 में कांग्रेस ने 114 और समाजवादी पार्टी ने 311 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन गठबंधन को कुल 54 सीटें ही हासिल हुई थीं, जबकि बीजेपी ने 312 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।

अखिलेश यादव की नजर ब्राह्मण वोटों पर

कार्यक्रम में चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि इस बार अखिलेश यादव विपक्ष के लिए बेहतर माहौल मान रहे हैं। NEET विवाद, कुछ वर्गों की नाराजगी और अन्य मुद्दों को विपक्ष बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है। इसी कड़ी में अखिलेश यादव ने हाल ही में ब्राह्मण सम्मेलन के दौरान PDA की नई व्याख्या करते हुए "P" को पंडित बताया। हालांकि, पैनल में इस पर सवाल उठाए गए कि ब्राह्मणों की नाराजगी दिखाने के लिए गैंगस्टर विकास दुबे का उदाहरण देना राजनीतिक रूप से गलत संदेश दे सकता है। चर्चा में विश्लेषकों ने कहा कि समाजवादी पार्टी लगातार PDA की राजनीति की बात करती है, लेकिन जमीन पर पिछड़े और दलित समाज के बीच संबंधों की वास्तविक स्थिति को भी समझना जरूरी है। साथ ही यह भी याद दिलाया गया कि समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान कानून व्यवस्था बड़ा चुनावी मुद्दा रही है और बीजेपी आगामी चुनाव में इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाएगी।

कानून व्यवस्था महिलाओं के लिए बड़ा मुद्दा

कार्यक्रम के दौरान एक्सपर्ट्स ने योगी आदित्यनाथ सरकार की कानून व्यवस्था को महिलाओं के लिए बड़ा चुनावी मुद्दा बताया। विश्लेषकों ने बताया कि महिलाओं के बीच सुरक्षा की भावना सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जा रही है। साथ ही यह भी कहा गया है कि बिहार और अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं के लिए बड़ी लाभार्थी योजना लाने की तैयारी चल रही है। चर्चा में जानकारी दी गई है कि सरकार के पास करीब 4 करोड़ महिलाओं का डेटा पहले से मौजूद है और योजना लागू होने पर यह चुनावी समीकरण बदल सकती है।

शो के दौरान विश्लेषकों ने राम मंदिर और धार्मिक मुद्दों पर भी चर्चा की। कार्यक्रम में कहा गया कि समाजवादी पार्टी राम मंदिर से जुड़े मुद्दों को उठाकर बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे को चुनौती देने की कोशिश कर रही है, जबकि बीजेपी कानून व्यवस्था और हिंदुत्व दोनों को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती है। इस दौरान संभल हिंसा, माफिया कार्रवाई और अतीक अहमद-मुख्तार अंसारी जैसे मामलों का भी जिक्र किया गया।

FCRA बिल किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं

कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में प्रस्तावित FCRA (विदेशी अंशदान विनियमन कानून) संशोधन बिल पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने सरकार के पक्ष को रखते हुए बताया कि ये बिल किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। इस बिल का उद्देश्य विदेशी फंडिंग की बेहतर निगरानी, पारदर्शिता और धन के सही इस्तेमाल को सुनिश्चित करना है। चर्चा में ये भी बताया गया कि विदेशी धन उसी उद्देश्य पर खर्च करना होगा, जिसके लिए वह प्राप्त हुआ है। प्रशासनिक खर्च की सीमा तय करने और सभी FCRA खातों को एक निर्धारित बैंक शाखा से जोड़ने जैसे प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया।

विश्लेषकों ने यह भी कहा कि अगर किसी संस्था का लाइसेंस रद्द हो जाता है तो उसकी संपत्ति पहले एक नामित प्राधिकरण के पास रहेगी और लाइसेंस बहाल होने पर वापस की जा सकेगी। वहीं, विश्लेषकों विपक्ष और कुछ ईसाई संगठनों की ओर से इस बिल पर चिंता जताए जाने का भी जिक्र किया। सरकार की ओर से यह संदेश दिए जाने की बात भी सामने आई है कि विपक्ष के सुझावों पर विचार किया जा सकता है। 

सोशल मीडिया राजनीतिक नैरेटिव बनाने का माध्यम?

इस दौरान कार्यक्रम में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मेटा की पॉलिसी, राजनीतिक कंटेंट के प्रचार और विदेशी प्रभाव जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। विश्लेषकों ने कहा कि सोशल मीडिया आज राजनीतिक नैरेटिव बनाने का बड़ा माध्यम बन चुका है और इसकी निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।

(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)

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