Published: Tuesday, July 14, 2026, 19:42 [IST]
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जिलों का दौरा कर विकास परियोजनाओं के जरिए माहौल बनाने में जुटे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी संगठन ने बूथ स्तर पर पूरी रणनीति बदलने का फैसला कर लिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद आई नई वोटर लिस्ट। इस प्रक्रिया में करीब 2.04 करोड़ मतदाताओं के नाम हट गए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा नाम उन जिलों में कटे हैं, जिन्हें लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है। वहीं मुस्लिम बहुल जिलों में वोट कम कटे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या SIR का असर 2027 के चुनावी समीकरण बदल सकता है। SIR लिस्ट के बाद आने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह नई वोटर लिस्ट बीजेपी का खेल बिगाड़ देगी?
2 करोड़ वोटरों के नाम कटना: किसे फायदा और किसका नुकसान?
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नवदीप रिनवा ने हाल ही में फाइनल वोटर लिस्ट जारी की है। 27 अक्टूबर 2025 से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू हुआ था। 166 दिनों के लंबे अभियान के बाद यूपी की वोटर लिस्ट से 2 करोड़ से ज्यादा (लगभग 2.04 करोड़) वोटरों के नाम काट दिए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में वोटरों का कम होना किसी भी चुनाव के नतीजों को पूरी तरह पलटने के लिए काफी है।
इस लिस्ट के आने के बाद भाजपा की परेशानियां बढ़ गई हैं। SIR लिस्ट से सबसे बड़ा झटका सत्ताधारी बीजेपी को लग सकता है। इसके पीछे की मुख्य वजह यह है कि जिन इलाकों से सबसे ज्यादा वोट कटे हैं, वे पारंपरिक रूप से बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। इसके उलट विपक्षी दलों के प्रभाव वाले या मुस्लिम बहुल इलाकों में वोट कटने की दर बेहद कम रही है। ऐसे में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों को बिना कुछ किए ही कई सीटों पर बढ़त मिल सकती है।
हालांकि सिर्फ वोट कटने के आंकड़ों से यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी एक दल को सीधा फायदा या नुकसान होगा। फिर भी राजनीतिक नजरिए से देखें तो जिन इलाकों में बीजेपी लगातार मजबूत रही है, वहीं ज्यादा नाम हटने से पार्टी के सामने संगठनात्मक चुनौती बढ़ सकती है। असर इस बात पर निर्भर करेगा कि जिन मतदाताओं के नाम हटे हैं, उनमें से कितने लोग अपील या नए आवेदन के जरिए फिर सूची में जुड़ते हैं और चुनाव तक दल अपने समर्थकों को कितनी प्रभावी तरह से संगठित कर पाते हैं।
UP SIR: किस इलाके में कटे सबसे ज्यादा वोट?
इस नई लिस्ट के आंकड़ों को देखें तो साफ हो जाता है कि बीजेपी के शहरी और गढ़ माने जाने वाले जिलों में वोटरों के नाम सबसे ज्यादा कटे हैं।
- लखनऊ: यहां सबसे ज्यादा 9.14 लाख (22.89%) वोटरों के नाम लिस्ट से हटा दिए गए।
- प्रयागराज: इस जिले में 8.26 लाख (17.62%) वोटर कम हो गए।
- कानपुर: यहां 6.87 लाख (19.42%) वोटरों के नाम कटे।
- गाजियाबाद: दिल्ली से सटे इस जिले में 5.74 लाख (20.24%) वोटरों के नाम हटे।
- नोएडा और साहिबाबाद: साहिबाबाद विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा 30.36% और नोएडा में 23.85% वोटरों के नाम साफ हो गए।
वहीं बिजनौर, मुरादाबाद, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जैसे मुस्लिम आबादी वाले जिलों में वोटर कटने की दर केवल 10 से 12 फीसदी के आसपास ही रही। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही अंदेशा जताया था कि इस लिस्टिंग में बीजेपी समर्थकों के वोट ज्यादा कट सकते हैं और आंकड़ों ने इसी बात पर मुहर लगा दी है।
CM योगी और BJP ने अब क्या नई रणनीति बनाई है?
SIR के बाद सामने आए नए आंकड़ों को देखते हुए बीजेपी ने संगठन को बूथ स्तर पर फिर से खड़ा करने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी ने 19 से 22 जुलाई के बीच सभी विधानसभा क्षेत्रों में बूथ सम्मेलन आयोजित करने का फैसला किया है।
नई वोटर लिस्ट के आधार पर बूथों की मैपिंग होगी। जहां मतदाताओं की संख्या बढ़ी है, वहां नई बूथ समितियां बनाई जाएंगी। जिन इलाकों में 80 से ज्यादा बूथ होंगे, वहां नए मंडल भी गठित किए जाएंगे।
साथ ही पुराने कार्यकर्ताओं, पूर्व पदाधिकारियों और सेक्टर संयोजकों को फिर सक्रिय करने का अभियान भी शुरू किया जा रहा है। बीजेपी की कोशिश साफ है कि अगर वोटर लिस्ट बदली है तो संगठन भी उसी हिसाब से बदला जाए, ताकि 2027 की चुनावी तैयारी बूथ स्तर से ही मजबूत की जा सके।
बूथ स्तर पर बीजेपी क्या बदलाव करने जा रही है?
SIR के बाद बदली वोटर लिस्ट को देखते हुए बीजेपी अब संगठन को नए सिरे से खड़ा करने में जुट गई है। पार्टी ने फैसला किया है कि जहां मतदाताओं की संख्या और बूथों का ढांचा बदला है, वहां बूथ समितियों का भी पुनर्गठन होगा। जिन इलाकों में 80 से ज्यादा बूथ हो गए हैं, वहां नए मंडलों का गठन किया जाएगा।
19 से 22 जुलाई तक सभी विधानसभा क्षेत्रों में बूथ सम्मेलन होंगे। सेक्टर संयोजकों की अलग बैठकें कराई जाएंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मन की बात' कार्यक्रम को भी बूथ स्तर तक पहुंचाने की तैयारी है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पुराने कार्यकर्ताओं, पूर्व पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से संपर्क अभियान तेज करने का निर्देश दिया है। साफ है कि बीजेपी चुनावी तैयारी की शुरुआत बूथ से करना चाहती है।
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के मुताबिक, पार्टी अब अपने पुराने कार्यकर्ताओं, पूर्व पदाधिकारियों और सीनियर जनप्रतिनिधियों से संपर्क का अभियान और तेज करने जा रही है ताकि बूथ स्तर पर संगठन को दोबारा लोहे की तरह मजबूत किया जा सके।
SIR Data Explained: अब समझिए 2.04 करोड़ नाम कैसे कटे? चुनाव आयोग ने क्या कहा?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा के मुताबिक SIR अभियान 166 दिन तक चला। इस दौरान करीब 3.26 करोड़ नोटिस जारी किए गए। इनमें लगभग 1.04 करोड़ मतदाता ऐसे थे, जिनका रिकॉर्ड सही तरीके से मैप नहीं था। जबकि 2.22 करोड़ मामलों में अलग-अलग तरह की गलतियां मिलीं।
27 अक्टूबर 2025 को प्रदेश में 15.44 करोड़ मतदाता दर्ज थे। शुरुआती ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर 12.55 करोड़ रह गई। दावे, आपत्तियों और सुनवाई के बाद अंतिम सूची में 13,39,84,792 मतदाता शामिल किए गए। यानी ड्राफ्ट सूची के बाद 84.28 लाख नए मतदाता फिर जुड़े।
चुनाव आयोग का कहना है कि अगर किसी का नाम अंतिम सूची में नहीं है तो वह पहले जिला निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकता है। जरूरत पड़ने पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास दूसरी अपील भी की जा सकती है। नए मतदाता के तौर पर फॉर्म-6 भरने का विकल्प भी खुला है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक नाम हटाने की सबसे बड़ी वजह नोटिस का जवाब नहीं मिलना और मतदाता का दूसरे स्थान पर शिफ्ट होना रहा। नाम हटने की वजहें हैं
- 3.50 लाख मतदाताओं ने नोटिस का जवाब नहीं दिया।
- करीब 3.28 लाख लोगों का पता बदल चुका था।
- 79,076 नाम डुप्लीकेट एंट्री होने की वजह से हटाए गए।
- 55,865 मतदाताओं के निधन की पुष्टि हुई।
- 2,069 मामलों में व्यक्ति या तो नाबालिग पाया गया या भारतीय नागरिक नहीं था।
इसके अलावा फॉर्म-7 के जरिए तीसरे पक्ष की शिकायतों पर भी 1.20 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए। चुनाव आयोग का कहना है कि हर मामले में सुनवाई और जांच के बाद ही फैसला लिया गया।
क्या SIR 2027 के यूपी चुनाव का गेम बदल सकता है?
राजनीतिक तौर पर यह सबसे बड़ा सवाल है। अगर सिर्फ वोट कटने के प्रतिशत को देखा जाए तो बीजेपी के प्रभाव वाले जिलों में ज्यादा नाम हटे हैं। ऐसे में पार्टी को अपने पारंपरिक वोटरों को दोबारा सूची में शामिल कराने और बूथ स्तर पर सक्रिय करने के लिए मेहनत करनी पड़ सकती है।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इस मुद्दे को चुनावी बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश करेंगे। विपक्षी पार्टी कोशिश करेंगी कि जिन इलाकों में उनका सामाजिक आधार मजबूत है, वहां एक भी समर्थक वोट सूची से बाहर न रह जाए। यानी आने वाले महीनों में असली मुकाबला सिर्फ रैलियों का नहीं बल्कि वोटर लिस्ट मैनेजमेंट का भी होगा।