तमिलनाडु के चिदंबरम स्थित प्राचीन तिल्लै वन से भगवान शिव के नटराज रूप की एक अद्भुत पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि उस वन में कुछ महान ऋषि रहते थे। वे यज्ञ, मंत्र और तपस्या में अत्यंत शक्तिशाली थे। धीरे-धीरे उनके भीतर अपनी शक्ति को लेकर इतना अहंकार उत्पन्न हो गया कि वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। उन्हें विश्वास हो गया कि उनके यज्ञ और मंत्रों की शक्ति से वे संसार की हर शक्ति को नियंत्रित कर सकते हैं।
ऋषियों के इस अहंकार को दूर करने के लिए भगवान शिव ने एक सुंदर भिक्षुक का रूप धारण किया। भगवान विष्णु भी उनके साथ मोहिनी रूप में वहाँ पहुँचे। ऋषियों की पत्नियाँ भिक्षुक के रूप में आए शिव की ओर आकर्षित होने लगीं और ऋषि मोहिनी के रूप पर मोहित हो गए। जब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, तो वे क्रोध से भर उठे और उन्होंने यज्ञ की अभिचारिक शक्ति से शिव पर आक्रमण करने का निश्चय किया।
सबसे पहले यज्ञ की अग्नि से एक भयंकर बाघ प्रकट हुआ। वह शिव पर झपटा, लेकिन महादेव ने उसे सहज ही परास्त कर दिया और उसकी खाल को अपने वस्त्र के रूप में धारण कर लिया।
इसके बाद ऋषियों ने एक विषैला सर्प उत्पन्न किया। शिव ने उस सर्प को भी अपने गले का आभूषण बना लिया। फिर एक हिरण उत्पन्न किया गया, जिसे महादेव ने अपने हाथ में धारण कर लिया।
ऋषियों का अहंकार फिर भी समाप्त नहीं हुआ।
अंत में उन्होंने अपस्मार नामक एक बौने राक्षस को उत्पन्न किया। अपस्मार को अज्ञानता, अहंकार और आध्यात्मिक अंधकार का प्रतीक माना जाता है।
महादेव ने उसे भूमि पर गिराकर उसके ऊपर अपना एक पैर रख दिया। तभी उन्होंने एक अद्भुत आनंद तांडव आरंभ किया। उनकी जटाएँ चारों दिशाओं में फैल गईं। एक हाथ में डमरू बजने लगा और दूसरे हाथ में अग्नि प्रकट हुई। एक हाथ अभयमुद्रा में उठा, मानो भक्तों से कह रहा हो, “डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
उनका दूसरा हाथ ऊपर उठे हुए चरण की ओर संकेत करता है। यही चरण भक्त के लिए आश्रय और मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।
नटराज के इस रूप में शिव की पंचकृत्य शक्तियाँ भी दिखाई देती हैं, सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह।
डमरू सृष्टि का प्रतीक है, अग्नि संहार का, अभयमुद्रा रक्षा और आश्वासन की, अपस्मार पर रखा चरण अज्ञान और अहंकार के दमन की, जबकि उठा हुआ चरण अनुग्रह और मुक्ति का प्रतीक है।
और महादेव के चारों ओर बना अग्नि का वलय मानो पूरे ब्रह्मांड के अनंत चक्र को दर्शाता है।
इस प्रकार नटराज केवल नृत्य करते हुए शिव की मूर्ति नहीं हैं। उनके प्रत्येक अंग में एक गहरा संदेश छिपा है, जहाँ सृष्टि है, वहाँ परिवर्तन है; जहाँ अज्ञान है, वहाँ ज्ञान का मार्ग है; और जहाँ बंधन है, वहीं महादेव की कृपा से मुक्ति का द्वार भी है।
इसीलिए नटराज का तांडव केवल विनाश का नृत्य नहीं, बल्कि सृष्टि, संहार और मुक्ति के शाश्वत रहस्य का दिव्य नृत्य है। ॐ नमः शिवाय 🙏
