
सुरुचि सिंह ने एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल जीताImage Credit source: PTI
माता-पिता की बात को मानना, उनके बताए रास्ते पर चलना… ये भारतीय संस्कृति और इस देश की सदियों पुरानी परंपरा का सबसे खास हिस्सा है. अक्सर अभिभावकों की सलाह को मानकर ही हमारे देश में बच्चे आगे बढ़ते हैं और सफलता हासिल करते हैं. खास तौर पर खेल की बात आती है तो इसका चलन काफी बढ़ा है. क्रिकेट से लेकर बैडमिंटन, हॉकी और एथलेटिक्स तक में ये देखने को मिला है. मगर 20 साल की शूटर सुरुचि सिंह ने अलग राह चुनी और इस राह ने उन्हें एशियन गेम्स के गोल्ड मेडल तक पहुंचा दिया.
25 सितंबर 2026 की सुबह को सुरुचि सिंह और उनके पिता इंदर सिंह हमेशा-हमेशा के लिए याद रखेंगे. इस सुबह का वक्त हरियाणा के झज्जर और आइची-नागोया में अलग-अलग था. जापान के इस शहर में चल रहे एशियन गेम्स 2026 में सुरुचि का ये आखिरी दिन होने वाला था और इसके साथ ही इन गेम्स में खुद को साबित करने का आखिरी मौका भी था. करीब 48 घंटे पहले ही उन्हें निराशा हाथ लगी थी.
आखिरी इवेंट में रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल
मगर जैसे कुश्ती में अपने प्रतिद्वंद्वी को हवा में पूरी तरह उठाकर पलटकर कोई रेसलर 5 पॉइंट हासिल करता है और जीत के करीब पहुंचता है. बस उसी अंदाज में आखिरी मैच में सुरुचि ने भी ऐसा ही प्रदर्शन करते हुए अपने फैसले को सही साबित कर दिया. कमलजीत के साथ मिलकर सुरुचि ने 10 मीटर एयर पिस्टल मिक्स्ड टीम का गोल्ड मेडल जीतकर एशियन गेम्स 2026 में भारत को एक बड़ी सफलता और राहत दिलाई.
पिस्टल शूटिंग में पिछले 2 दिनों भारत को महिला और पुरुष के मुकाबलों में बुरी तरह निराशा हाथ लगी थी. सुरुचि भी इसका हिस्सा थीं, जो मेडल जीतने में नाकाम रही थीं. शुक्रवार को एशियन गेम्स में पिस्टल शूटिंग का आखिरी मुकाबला था और सुरुचि ने कमलजीत के साथ मिलकर इसे यादगार बना दिया. दोनों ने क्वालिफाइंग में 587 पॉइंट्स के साथ पहला स्थान हासिल किया और फिर फाइनल में 484.6 के नए एशियन रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीता और पिस्टल शूटिंग में देश की लाज रखी.
पिता की बात नहीं मानी, फिर भी चैंपियन
सुरुचि की कहानी में कुश्ती का जिक्र इसलिए किया क्योंकि अगर उनके पिता की चलती या वो अपने पिता की बात मानतीं तो ये लड़की निशानेबाजी के बजाए कुश्ती में अपने दांव-पेच आजमा रही होती. असल में हरियाणा पुलिस में काम करने वाले इंदर सिंह अपनी बेटी को कुश्ती में भेजना चाहते थे क्योंकि झज्जर और आस-पास के इलाकों में कुश्ती का काफी बोल-बाला है. साथ ही इंदर सिंह का एक चचेरा भाई खुद नामी पहलवान था, जिन्होंने डेफओलंपिक में कई मेडल जीते थे.
मगर सुरुचि को बंदूक से प्यार हो गया और उन्होंने इसी खेल में आगे बढ़ने का फैसला किया. सिर्फ 13 साल की उम्र में सुरुचि ने भिवानी में एक शूटिंग एकेडमी में ट्रेनिंग शुरू की और आगे बढ़ती रहीं. मगर इस दौरान कोरोनावायरस महामारी ने दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया. ऐसे में झज्जर के अपने घर में ही सुरुचि को टेंपररी रेंज बनवाकर प्रैक्टिस करनी पड़ी. इस युवा निशानेबाज ने यहां से लगातार ऊंचाइयां ही छुई हैं. 2025 में उन्होंने ISSF शूटिंग वर्ल्ड कप में अपनी सीनियर मनु भाकर को हराकर गोल्ड मेडल जीता था. अब एशियन गेम्स में भी गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने बंदूक को चुनने के अपने फैसले को सही साबित किया.

सुमित सुन्द्रियाल
इस वक्त TV9 हिंदी (स्पोर्ट्स 9) में असिस्टेंट न्यूज एडिटर (स्पोर्ट्स) की भूमिका में हूं. यहां तक पहुंचने की शुरुआत 2009 से हुई, जब जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मास मीडिया ऑनर्स कोर्स (2009-12) में एडमिशन लिया. फिर 2013 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से हिंदी पत्रकारिता में पोस्ट-ग्रेजुएशन डिप्लोमा पूरा किया. यहीं से 2013 में पहली बार पेशेवर पत्रकारिता में कदम रखे और सबसे पहले न्यूज 18 इंडिया टीवी चैनल में जगह बनाई. डिजिटल पत्रकारिता में एंट्री लेने से पहले करीब 6 साल टीवी इंडस्ट्री में ही गुजरे, जहां असानमेंट डेस्क पर काम किया. असाइनमेंट डेस्क पर रहते हुए जानकारी जुटाना सबसे अहम काम होता है और उस खबर के हर पहलू को जांचना और उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी होती है. यही काम न्यूज 18 इंडिया में रहते हुए किया. इसके बाद खेल और खेल की खबरों के मोह ने डिजिटल जर्नलिज्म की ओर मोड़ा और एक नया सफर शुरू हुआ. इसकी शुरुआत IPL 2019 के दौरान हुई, जब क्विंट हिंदी का दामन थामा. एक साल क्विंट के साथ खेल की खबरें लिखने के बाद इसी काम में नया मुकाम हासिल करने के लिए TV9 हिंदी से रिश्ता जुड़ा. पिछले 3 साल से यहीं पर खेल की हर छोटी-बड़ी, गंभीर और मजेदार खबरें आप तक पहुंचा रहां हूं और लगातार बेहतर तरीके से पेश करने का प्रयास कर रहा हूं.
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