श्री धौलपुर अचलेश्वर महादेव कथा - Shri Dholpur Achaleshwar Mahadev Katha

Published on 4 अग॰ 2026

आज मैं आपको देवाधिदेव महादेव की उस अद्भुत महिमा का वर्णन सुनाने जा रहा हूं, जो राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित धवलपुरी (वर्तमान धौलपुर) के बीहड़ों में रची गई है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र मत्स्य जनपद का हिस्सा था, जहाँ राजा धवल देव का शासन रहा। चम्बल नदी की लहरों के बीच स्थित यह स्थान भक्तों के कष्टों को हरने वाला और साक्षात शिव का जागृत स्थान है। 

प्रथम अध्याय: 

प्राचीन काल में इस वन क्षेत्र में चरवाहे अपनी गायें चराया करते थे। एक समय की बात है, चरवाहों ने देखा कि उनकी गायें एक निश्चित स्थान पर खड़ी होकर स्वतः ही अपने स्तनों से दूध की धारा गिराती हैं। जब उस स्थान की सफाई की गई, तो वहाँ से एक दिव्य स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। उसी समय वहाँ रात्रि विश्राम कर रहे ऋषि-मुनियों के एक समूह को स्वप्न में महादेव के साक्षात दर्शन हुए, जिसमें प्रभु ने अपनी उपस्थिति का संकेत दिया। तदोपरांत शास्त्रों के अनुसार यहाँ भगवान की प्रतिष्ठा और पूजन विधि-विधान से आरंभ हुआ। 

द्वितीय अध्याय

भगवान अचलेश्वर महादेव की सबसे बड़ी महिमा उनके शिवलिंग का क्षण-क्षण में रंग बदलना है। भक्त श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण करते हैं कि भगवान सूर्य की किरणों के साथ अपनी आभा बदलते हैं।

  • प्रातः काल में महादेव का शिवलिंग लाल वर्ण का दिखाई देता है।
  • मध्याह्न (दोपहर) में इसका रंग केसरिया हो जाता है।
  • संध्या और रात्रि के समय भगवान सांवले या गहरे रंग के दिखाई देते हैं। 

भक्त इसे महादेव की दिव्य लीला मानते हैं, जिसका रहस्य आज तक कोई भी मनुष्य या विज्ञान पूर्णतः नहीं सुलझा सका है। 

तृतीय अध्याय

एक समय राजाओं और भक्तों के मन में इस शिवलिंग की गहराई जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने सत्य जानने हेतु शिवलिंग के आधार की खुदाई करवाई। 51 फीट तक खुदाई करने के बाद भी शिवलिंग का कोई अंत या सिरा प्राप्त नहीं हुआ। जैसे-जैसे खुदाई बढ़ती गई, शिवलिंग और भी विशाल होता चला गया। अंततः हार मानकर भक्तों ने खुदाई रोक दी और यह स्वीकार किया कि महादेव अनंत हैं। इसी गहराई और अचल होने के कारण प्रभु का नाम 'अचलेश्वर महादेव' प्रसिद्ध हुआ। 

चतुर्थ अध्याय

जो अविवाहित युवक-युवतियां यहाँ आकर भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं, उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। विशेषकर 16 सोमवार तक श्रद्धापूर्वक पूजा करने से विवाह में आने वाली समस्त बाधाएं दूर हो जाती हैं और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। इसी स्थान पर एक और चमत्कार देखा जाता है कि सावन और नाग पंचमी के अवसर पर एक विशाल नाग प्रकट होता है। वह नाग शिवलिंग की परिक्रमा कर दर्शन करता है और किसी भी श्रद्धालु को हानि पहुँचाए बिना वापस चला जाता है, जिसे भक्त महादेव का साक्षात सेवक मानते हैं। 

पंचम अध्याय

पूर्व काल में यह मंदिर दुर्गम बीहड़ों और डकैतों के प्रभाव के कारण जनमानस के लिए अत्यंत कठिन था, जहाँ पहुँचने का मार्ग पथरीला और उबड़-खाबड़ था। किंतु जैसे-जैसे महादेव के चमत्कारों की कीर्ति फैली, यहाँ भक्तों का सैलाब उमड़ने लगा। धौलपुर शहर से मात्र 5 किलोमीटर दूर चम्बल के किनारे स्थित इस मंदिर में वर्षा ऋतु में स्वयं माँ चम्बल बढ़कर भगवान के चरणों का स्पर्श करती हैं। 

जो भक्त इस कथा को प्रेमपूर्वक सुनता है या सुनाता है, महादेव उसके समस्त संकटों का नाश कर उसे सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। 

॥ आचार्य-उपदेश-अवस्थिना विरचिता इति श्रीधौलपुर-अचलेश्वरमहादेवकथा सम्पूर्णा ॥

॥ क्षमाप्रार्थना ॥

आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महेश्वर।

यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥

॥ हर हर महादेव ॥

॥ ॐ नमः शिवाय ॥