भारतीय बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा लिक्विडिटी को कंट्रोल करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने गुरुवार को ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री का पहला चरण पूरा कर लिया है। इस प्रक्रिया में आरबीआई ने निवेशकों और बैंकों से ₹50,000 करोड़ की बोलियां (Bids) स्वीकार कीं, जिससे बैंकिंग सिस्टम से इतनी बड़ी रकम सीधे आरबीआई के पास जमा हो गई है।
आरबीआई द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस नीलामी में अलग-अलग मैच्योरिटी वाले सरकारी बॉन्ड बेचे गए। 8.28% ब्याज दर वाले 2032 के बॉन्ड में सबसे ज्यादा ₹18,840 करोड़ की बोली स्वीकार की गई, जिसका कट-ऑफ यील्ड 7.0090% रहा। 5.77% ब्याज दर वाले 2030 के ₹12,645 करोड़ और 7.61% ब्याज दर वाले 2030 के ₹1,005 करोड़ के बॉन्ड बेचे गए। 7.59% ब्याज दर वाले 2029 के ₹7,005 करोड़, 6.79% ब्याज दर वाले 2029 के ₹7,255 करोड़ और 6.68% ब्याज दर वाले 2031 के ₹3,250 करोड़ के बॉन्ड स्वीकार किए गए।
आरबीआई को क्यों वापस खींचना पड़ा बाजार से पैसा?
16 सितंबर तक देश के बैंकिंग सिस्टम में अनुमानित ₹7.38 लाख करोड़ की अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी सरप्लस) जमा हो चुकी थी। बैंकिंग सिस्टम में पैसे का यह बड़ा ओवरफ्लो मुख्य रूप से दो वजहों से हुआ था:
- एफसीएनआर (FCNR-B) डिपॉजिट्स: विदेशी मुद्रा जमा में भारी बढ़ोतरी हुई, जिसे बैंकों ने आरबीआई के साथ स्वैप करके भारी मात्रा में रुपये प्राप्त किए।
- सरकारी खर्च: महीने के अंत में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान से भी सिस्टम में भारी नकदी पहुंच गई।
ज्यादा लिक्विडिटी के कारण बाजार में महंगाई का जोखिम बढ़ जाता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक को OMO सेल का सहारा लेना पड़ा।
आगे का क्या है प्लान?
रिजर्व बैंक ने बैंकिंग लिक्विडिटी को संतुलित करने के लिए कुल ₹1 लाख करोड़ की ओएमओ बिक्री का ऐलान किया है, जिसे तीन किस्तों में पूरा किया जाना है।पहली किस्त में ₹50,000 करोड़ जुटाने के बाद अब बाकी बची ₹25,000-₹25,000 करोड़ की दो किस्तें क्रमशः 21 सितंबर और 28 सितंबर को आयोजित की जाएंगी। इस कदम से आने वाले दिनों में बैंकिंग सिस्टम में नकदी का प्रवाह सामान्य स्तर पर आने की उम्मीद है।
यह भी पढ़ें- 1 लाख रुपये के निवेश पर मिलेंगे 3.33 लाख रुपये, RBI Gold Bond ने दिया 233% का भारी-भरकम रिटर्न