Radha Ashtami Vrat Katha: राधाष्टमी के दिन राधा जी की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ने का भी खास महत्व होता है. आइए जानते हैं श्री राधा जी के प्राकट्य की पौराणिक कथा पढ़ें.
Published byNamrata Mohanty
Radha Ashtami Vrat Katha: राधाष्टमी के दिन राधा जी की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ने का भी खास महत्व होता है. आइए जानते हैं श्री राधा जी के प्राकट्य की पौराणिक कथा पढ़ें.
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Radha Ashtami Vrat Katha Photograph: (ai-generated)
Radha Ashtami Vrat Katha: राधाष्टमी का पावन पर्व आज मनाया जाता है. इस दिन श्री राधा रानी के प्रकटोत्सव मनाया जाता है. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाला यह पर्व ब्रज समेत देशभर में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. इस दिन राधा रानी और कृष्ण जी की पूजा करने का खास महत्व होता है. राधाष्टमी के दिन व्रत कथा का पाठ करना या सुनने से भक्तों को राधा रानी की कृपा मिलती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कथा का पाठ करने से मन में भक्ति भाव बढ़ता है.
राधाष्टमी व्रत कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, राधा रानी मूल रूप से गोलोक धाम में श्रीकृष्ण की प्रिय शक्ति और महालक्ष्मी का स्वरूप मानी जाती हैं. एक बार गोलोक में श्रीदामा और राधा रानी के बीच किसी बात के लिए विवाद हो गया. इसके बाद श्रीदामा ने राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दिया और राधा जी ने भी प्रतिउत्तर में श्रीदामा को शंखचूड़ राक्षस बनने का श्राप दे दिया.
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जब भगवान विष्णु ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया, तब महालक्ष्मी ने भी पृथ्वी लोक पर राधा रानी के रूप में प्रकट होने का निर्णय लिया. धरती पर ब्रज के राजा वृषभानु एक बार यज्ञ के लिए भूमि साफ कर रहे थे. तभी उन्हें यमुना नदी के किनारे एक स्वर्ण कमल के फूल पर एक अत्यंत सुंदर दिव्य कन्या प्रकट हुई मिली. राजा वृषभानु उस कन्या को अपने घर ले आए और अपनी पुत्री मानकर उनका पालन-पोषण करने लगे. माता कीर्ति ने जब उस कन्या को देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुईं. कथा में यह भी वर्णित है कि जन्म के समय श्री राधा रानी की आंखें बंद थीं. जब भगवान श्रीकृष्ण बाल रूप में उनके पालने के पास पहुंचे और उन्होंने राधा रानी के चरण स्पर्श किए तो श्रीजी ने अपनी आंखें खोलीं और सर्वप्रथम अपने आराध्य श्रीकृष्ण के दर्शन किए थे.
राधा स्वरूप का वर्णन
देवी राधा श्वेत वर्ण वाली हैं और उनके रूप-सौन्दर्य के समक्ष कोटि-कोटि सूर्यों की आभा भी निम्न प्रतीत होती है. श्री जी को द्विभुजा रूप में कमल लिये हुये स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान दर्शाया जाता है. उनका एक हाथ वरदमुद्रा तथा दूसरा अभय मुद्रा में स्थित रहता है.
देवी राधा के मंत्रों का जाप करें
सामान्य मंत्र- श्री राधायै स्वाहा
बीज मन्त्र- ऊं ह्रीं श्रीराधिकायै नमः
श्री राधा गायत्री मन्त्र- ऊं वृषभानुजाय विद्महे कृष्णप्रियाय धीमहि।
तन्नो राधा प्रचोदयात्॥
भगवान नारायण द्वारा श्रीराधा रानी की स्तुति
नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनी।
रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये॥
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)