बिहार के संजय सर: संघर्ष से निकली सफलता की कहानी, डिजिटल शिक्षा से बदल रहे विद्यार्थियों की दुनिया

Published on 26 अक्टू॰ 2026

बिहार के संजय सर: संघर्ष से निकली सफलता की कहानी, डिजिटल शिक्षा से बदल रहे विद्यार्थियों की दुनिया

By Oneindia Staff

Time Updated: Monday, October 26, 2026, 18:35 [IST]

Sanjay Sir Bihar s Digital Education Pioneer Transforms Lives Inspiring Success From Struggle

कटिहार के नवाबगंज गांव से शुरू हुआ संजय कुमार का सफर आज डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा का उदाहरण बन रहा है। आर्थिक तंगी, प्राकृतिक आपदा और सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े संजय सर ने शिक्षा को अपनी ताकत बनाया और इसी के माध्यम से दूसरे विद्यार्थियों के लिए अवसर तैयार करने का संकल्प लिया।

सफलता की कहानियां अक्सर बड़े शहरों और बेहतर संसाधनों से शुरू होती दिखाई देती हैं, लेकिन संजय कुमार की यात्रा इस सोच से अलग है। वर्ष 1999 में बिहार के कटिहार जिले के मनिहारी प्रखंड स्थित नवाबगंज गांव में जन्मे संजय का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। उनके पिता दिल्ली में मजदूरी करते थे और परिवार में आठ भाई-बहन थे। आर्थिक परेशानियों के बीच गंगा नदी के कटाव में उनका घर बह गया, जिसके बाद परिवार को सड़क किनारे झोपड़ी बनाकर रहना पड़ा।

अभावों के बीच भी संजय ने पढ़ाई जारी रखी। पुराने कपड़ों के कारण उपहास और किताब-कॉपी खरीदने में कठिनाइयों जैसी परिस्थितियों ने उन्हें निराश करने के बजाय आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने समझा कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन में नए अवसर हासिल करने का रास्ता भी है।

चार विद्यार्थियों से शुरू हुई शिक्षण यात्रा

संजय ने नवाबगंज के कन्या मध्य विद्यालय और मैट्रिक लहुरू स्मारक उच्च विद्यालय से पढ़ाई की, जहां वे स्कूल टॉपर बने। इसके बाद उन्होंने दर्शन शाह महाविद्यालय, कटिहार से इंटरमीडिएट और स्नातक की शिक्षा प्राप्त की।

शिक्षक बनने की शुरुआत में उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा। एक मित्र के घर ट्यूशन पढ़ाने के बाद महज 15 दिनों में उन्हें पढ़ाना बंद करने के लिए कहा गया। आर्थिक जरूरतों के बावजूद उन्होंने स्वाभिमान को प्राथमिकता दी और मेहनताना लेने से इनकार कर दिया।

वर्ष 2015 में उन्होंने घर के पास सड़क किनारे केवल चार बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। सूरज नाम के एक विद्यार्थी से मिली 150 रुपये की पहली फीस उनके लिए विशेष महत्व रखती थी। वर्ष 2016 में उन्होंने दिशा टीचिंग सेंटर की स्थापना की। समय के साथ यही प्रयास Disha Online Classes के रूप में विकसित हुआ।

कोरोना महामारी ने दिखाई डिजिटल शिक्षा की राह

वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के कारण शैक्षणिक संस्थान बंद हुए, तो विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखना बड़ी चुनौती बन गया। संजय सर ने Facebook और YouTube के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कीं। सीमित इंटरनेट और साधारण उपकरणों के साथ शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय होने लगी।

कक्षा 10 के हिंदी पाठ दही वाली मंगम्मा पर बनाया गया उनका वीडियो विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उन्होंने ऑनलाइन शिक्षण को व्यवस्थित रूप देने पर ध्यान दिया।

वर्ष 2022 में उन्होंने लगभग चार लाख रुपये के डिजिटल सेटअप में निवेश करने का निर्णय लिया। विद्यार्थियों से सहयोग मांगा और शेष राशि के लिए ब्याज पर कर्ज लिया। गांव में इंटरनेट की समस्या दूर करने के लिए टावर की व्यवस्था की गई। वर्ष 2023 में डिजिटल बोर्ड के माध्यम से पढ़ाई शुरू हुई।

विद्यार्थियों की तैयारी बेहतर बनाने के लिए उन्होंने Learn, Write, Revise, Test और Repeat पर आधारित अध्ययन पद्धति अपनाई, जिसमें समझने, लिखने, दोहराने और नियमित अभ्यास पर जोर दिया जाता है।

बिहार बोर्ड के परिणामों से मिली पहचान

Disha Online Classes के अनुसार, वर्ष 2023 में संस्थान के 20 से अधिक विद्यार्थी बिहार बोर्ड की टॉप-10 सूची में शामिल हुए। वर्ष 2024 में शिवांकर कुमार ने मैट्रिक परीक्षा में राज्य स्तर पर प्रथम स्थान हासिल किया।

वर्ष 2025 में मैट्रिक परीक्षा में साक्षी कुमारी और अंशु कुमारी तथा इंटरमीडिएट परीक्षा में शाकिब शाह ने राज्य स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया। संस्थान के अनुसार, वर्ष 2026 में मैट्रिक के टॉप-10 में 40 विद्यार्थी और इंटरमीडिएट के टॉप-5 में तीन विद्यार्थी शामिल हुए।

व्यक्तिगत संघर्ष से सामाजिक बदलाव तक

वर्तमान में संजय कुमार Sanjay Kumar’s Educational Classes Private Limited के निदेशक हैं। संस्थान के मुताबिक, यहां 25 से अधिक शिक्षक और 100 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं तथा इसकी पहुंच 30 लाख से अधिक विद्यार्थियों तक बनी है। संस्थान ने इंटरमीडिएट, साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी अपनी शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार किया है।

संजय सर का लक्ष्य बिहार में 100 से अधिक योग्य शिक्षक तैयार करना है, जो ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उचित मार्गदर्शन दे सकें।

उनकी कहानी इस बात को रेखांकित करती है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता हासिल करना नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी संभावनाओं के नए द्वार खोलना है। सड़क किनारे चार बच्चों को पढ़ाने से शुरू हुआ उनका सफर आज डिजिटल माध्यमों से अधिक विद्यार्थियों तक पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। संजय कुमार की यात्रा उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने प्रयासों से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं।