( अलीना कॉस्मा, ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन )
डबलिन (आयरलैंड), 23 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, पढ़ाई के दबाव, महंगे मकानों और रोजगार की अनिश्चितता के बीच आज के युवाओं को अपना भविष्य लगातार अनिश्चित नजर आ रहा है।
वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे ‘जेनरेशन जी’ के युवा कई तरह के सामाजिक और आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं। यूरोप में जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शनों के जरिए वे अपनी नाराजगी जाहिर करने के साथ-साथ भविष्य से जुड़े फैसलों में अपनी भागीदारी भी चाहते हैं।
हर पीढ़ी को किशोरावस्था में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आज के युवाओं की परेशानियों को समझने के लिए केवल उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को भी समझना होगा, जो उनके जीवन को प्रभावित करती हैं।
किशोरावस्था को लंबे समय तक भावनात्मक उथल-पुथल, व्यवहार संबंधी टकराव और पहचान के संकट का दौर माना जाता रहा है। हालांकि, अब इसे केवल कठिनाइयों के समय के रूप में देखने के बजाय संभावनाओं, अवसरों और विकास के महत्वपूर्ण चरण के रूप में भी समझा जा रहा है। इस दौरान युवाओं का स्वास्थ्य और भविष्य की खुशहाली काफी हद तक उस सामाजिक माहौल पर निर्भर करती है, जिसमें वे बड़े होते हैं। किशोरावस्था का यह दौर बीस वर्ष की उम्र पार करने तक भी जारी रह सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के ‘स्कूल जाने की उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य व्यवहार’ संबंधी अध्ययन के अनुसार, 2002 से 2022 के बीच कई देशों में पढ़ाई से जुड़ा दबाव बढ़ा है। वर्ष 2022 में 15 वर्ष की करीब दो-तिहाई लड़कियों ने पढ़ाई के दबाव से परेशान होने की बात कही। इसके मुकाबले लड़कों में यह अनुपात आधे से कम था। अध्ययन में परिवार और साथियों से मिलने वाले सहयोग में भी गिरावट दर्ज की गई।
इसका मतलब है कि युवाओं पर अपेक्षाओं का दबाव बढ़ रहा है, जबकि उनसे निपटने में मदद करने वाले सामाजिक सहारे कमजोर पड़ रहे हैं।
कई जगहों पर माता-पिता की अपेक्षाएं और आलोचना बढ़ी हैं। सफलता को व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है और शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तेज हुई है। सोशल मीडिया भी दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति बढ़ा सकता है। युवाओं की उपलब्धियों, रूप-रंग और जीवनशैली पर लगातार सार्वजनिक नजर रहने से उन पर बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव बना रहता है।
आर्थिक चिंताएं भी उनकी मुश्किलें बढ़ाती हैं। जीवनयापन की बढ़ती लागत, उच्च शिक्षा का खर्च और भविष्य में रोजगार को लेकर अनिश्चितता युवाओं की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं।
यूरोपीय संघ में 40 प्रतिशत युवा बढ़ती कीमतों और जीवनयापन की लागत को लेकर काफी चिंतित हैं। वर्ष 2026 के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, आयरलैंड के करीब 70 प्रतिशत किशोर बेहतर जीवन परिस्थितियों के लिए देश छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। नीदरलैंड में माध्यमिक विद्यालयों के 20 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों को चिंता है कि वे कभी अपना घर खरीद भी पाएंगे या नहीं।
आज के युवा जलवायु संकट के बढ़ते प्रभावों के बीच बड़े हो रहे हैं। उन्हें जलवायु परिवर्तन के अल्पकालिक और दीर्घकालिक परिणामों को लेकर लगातार चेतावनियां मिलती हैं। वे जानते हैं कि उनकी पीढ़ी पर इसका अधिक असर पड़ेगा। इससे कुछ युवाओं में पर्यावरण के बिगड़ते हालात और भविष्य को लेकर चिंता, उदासी, गुस्सा और बेबसी की भावना पैदा होती है।
युवाओं की परेशानी तब और बढ़ती है, जब उन्हें लगता है कि उनके भविष्य को प्रभावित करने वाले फैसले उनकी भागीदारी या जरूरतों पर ध्यान दिए बिना लिए जा रहे हैं। जब लोगों को लगता है कि वे अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर बहुत कम असर डाल सकते हैं, तो उनमें निराशा पैदा हो सकती है।
कई देशों के शोध बताते हैं कि जेनरेशन जी का मानसिक स्वास्थ्य पिछली पीढ़ियों की तुलना में खराब हो रहा है। बड़े पैमाने पर किए गए अध्ययनों में युवाओं के बीच भावनात्मक परेशानी और मनोवैज्ञानिक कठिनाइयां बढ़ने के संकेत मिले हैं।
इस समस्या के लिए अक्सर अधिक स्क्रीन टाइम, मुश्किलों से जुझने की क्षमता में कमी और रोजमर्रा की चुनौतियों से निपटने में परेशानी जैसे व्यक्तिगत कारणों को जिम्मेदार माना जाता है।
हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य पर व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक माहौल का भी असर पड़ता है। इसलिए युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को केवल व्यक्तिगत कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे वयस्क जीवन की ओर बढ़ते समय सामने आने वाले व्यापक सामाजिक दबावों की प्रतिक्रिया भी हो सकती हैं।
इन चुनौतियों के बावजूद जेनरेशन जी को केवल चिंता और निराशा से घिरी पीढ़ी मानना गलत होगा। आवास, शिक्षा, जलवायु नीति और आर्थिक असमानता से जुड़े विरोध प्रदर्शन उनकी नाराजगी के साथ-साथ भविष्य से जुड़े फैसलों को प्रभावित करने की इच्छा भी दिखाते हैं।
यूरोप के 6,703 युवाओं के बीच 2025 में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि जर्मनी के 80 प्रतिशत युवा यूरोपीय संघ की सदस्यता को अच्छी बात मानते हैं। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 65 प्रतिशत था। फ्रांस में भी यह अनुपात 53 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया।
अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि युवा चाहते हैं कि जीवनयापन की लागत वहनीय हो।
ये नतीजे इस धारणा को चुनौती देते हैं कि आज की युवा पीढ़ी समाज से कट गई है। युवा केवल सामाजिक दबावों को सहन नहीं कर रहे, बल्कि संगठित हो रहे हैं, मौजूदा व्यवस्थाओं पर सवाल उठा रहे हैं और विकल्प तलाश रहे हैं।
जेनरेशन जी की चुनौतियां नयी नहीं हैं। हालांकि, एक साथ कई तरह के दबावों का सामना करना और वयस्क जीवन में प्रवेश के दौरान अनिश्चितता उनके अनुभव को अलग बनाती है।
इसलिए यह पूछने के बजाय कि क्या आज के युवाओं का जीवन पिछली पीढ़ियों से अधिक कठिन है, यह समझना जरूरी है कि उनसे किस तरह के समाज में अपना भविष्य बनाने की अपेक्षा की जा रही है। साथ ही, ऐसा समाज बनाने के उपाय तलाशने होंगे जो अधिक स्वस्थ, न्यायसंगत और उम्मीदों से भरा हो।
द कन्वरसेशन मनीषा रंजन
रंजन
Web Title: यूरोप में युवाओं के विरोध प्रदर्शन: जेन जी किन संकटों का सामना कर रही है