जानें असली हैंडलूम साड़ी की क्या पहचान है, मिनटों में कर लेंगे असली-नकली का फर्क

Published on 18 जुल॰ 2026

लाइफस्टाइल

जानें असली हैंडलूम साड़ी की क्या पहचान है, मिनटों में कर लेंगे असली-नकली का फर्क

  • Authored by: सुनीत सिंह
  • Updated Jul 18, 2026, 03:20 PM IST

बहुत से लोग मानते हैं कि महंगी साड़ी यानी असली साड़ी। लेकिन यह जरूरी नहीं है। कई बार किसी ब्रांड का नाम, शोरूम का खर्च या मार्केटिंग भी कीमत बढ़ा देती है।

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असली और नकली हैंडलूम साड़ी में कैसे करें फर्क

How to identify the authentic handloom saree: भारतीय महिलाओं की अलमारी में अगर कोई परिधान सबसे खास माना जाता है, तो वह है हैंडलूम साड़ी। बनारसी, कांजीवरम, चंदेरी, जामदानी या बालूचरी जैसी साड़ियां भारत की सदियों पुरानी बुनाई परंपरा की पहचान हैं। इन्हें तैयार करने में कई बार हफ्तों या महीनों का समय लगता है, इसलिए इनकी कीमत भी हजारों से लेकर लाखों रुपये तक हो सकती है।

बढ़ती मांग के साथ बाजार में पावरलूम और मशीन से बनी नकली साड़ियों की भरमार भी है। ऐसे में बस ज्यादी कीमत देखकर यह मान लेना कि साड़ी असली है, बड़ी भूल हो सकती है। थोड़ी-सी जानकारी आपको गलत खरीदारी से बचा सकती है।

सबसे पहले इन तीन सर्टिफिकेशन को समझिए

हैंडलूम साड़ी खरीदते समय अक्सर सिल्क मार्क, हैंडलूम मार्क और जीआई टैग जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। लेकिन ये तीनों अलग-अलग चीजों की पुष्टि करते हैं:

सिल्क मार्क बताता है कि साड़ी में इस्तेमाल किया गया रेशम प्राकृतिक है, कृत्रिम नहीं।

हैंडलूम मार्क इस बात की गारंटी देता है कि साड़ी हाथकरघे पर बुनी गई है, मशीन पर नहीं।

जीआई टैग यह प्रमाणित करता है कि साड़ी किसी खास पारंपरिक बुनाई क्षेत्र, जैसे बनारस, कांचीपुरम या चंदेरी से आई है।

ध्यान रखें कि एक ही टैग तीनों बातों की पुष्टि नहीं करता, इसलिए खरीदते समय इन प्रमाणों की जानकारी जरूर लें।

साड़ी को पलटकर देखिए

असली हैंडलूम साड़ी की पहचान का सबसे आसान तरीका है उसे उलटकर देखना। हाथ से बुनी साड़ी में डिजाइन कपड़े का हिस्सा होता है, इसलिए उसका पिछला हिस्सा भी काफी हद तक उतना ही जटिल और सुंदर दिखाई देता है।

वहीं मशीन से बनी साड़ियों में अक्सर पीछे की ओर लंबे, ढीले धागे या एक जैसे पैटर्न दिखाई देते हैं, जो पावरलूम उत्पादन की ओर इशारा करते हैं।

असमानताएं ही असली पहचान हैं

अगर आपको बुनाई में हल्की-सी असमानता या धागों की मामूली अनियमितता दिखे, तो उसे डिफेक्टिव न समझें। ये असमानताएं बताती हैं कि साड़ी किसी मशीन ने नहीं, किसी कारीगर के हाथों से बुनी है। मशीन से बने कपड़ों में हर पैटर्न बिल्कुल एक जैसा होता है, जबकि हैंडलूम में ह्यूमन टच साफ नजर आता है।

दुकानदार से ये चार सवाल जरूर पूछें

सिर्फ साड़ी देखकर फैसला न करें। खरीदने से पहले विक्रेता से कुछ जरूरी सवाल पूछें:

- यह साड़ी किस बुनाई क्षेत्र में तैयार हुई है?

- क्या यह हैंडलूम है या पावरलूम?

- इसमें किस तरह के धागे या फाइबर का इस्तेमाल हुआ है?

- इसे तैयार होने में कितना समय लगा?

अगर दुकानदार इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाता या प्रमाण दिखाने से बचता है, तो सतर्क हो जाना चाहिए।

महंगी है, तो असली होगी... यह सबसे बड़ा भ्रम

बहुत से लोग मानते हैं कि महंगी साड़ी यानी असली साड़ी। लेकिन यह जरूरी नहीं है। कई बार किसी ब्रांड का नाम, शोरूम का खर्च या मार्केटिंग भी कीमत बढ़ा देती है। दूसरी ओर, कुछ नकली साड़ियों को भी ऊंची कीमत पर बेच दिया जाता है। इसलिए कीमत को नहीं, ब प्रमाण और गुणवत्ता को प्राथमिकता दें।

रेशम की साड़ी हमेशा हैंडलूम नहीं होती

एक और आम गलतफहमी यह है कि अगर साड़ी शुद्ध रेशम की है, तो वह हाथकरघे पर ही बनी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, रेशम सिर्फ एक फाइबर है। उसी रेशम से बनी साड़ी मशीन पर भी बुनी जा सकती है। इसलिए सिर्फ सिल्क होने से साड़ी हैंडलूम साबित नहीं होती।

हैंडलूम साड़ी के पीछे उन हजारों बुनकर परिवारों की मेहनत जुड़ी होती है, जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। इसीलिए जब आपअसली हैंडलूम साड़ी खरीदते हैं, तो अपने साथ भारत की पारंपरिक बुनाई, स्थानीय कारीगरों और सांस्कृतिक विरासत को भी समर्थन देते हैं।

Suneet Singh

सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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