नई दिल्ली(उत्तम हिन्दू न्यूज)- अब जमीन की पहचान सिर्फ खाता-खतौनी, खसरा या रजिस्ट्री के कागजों तक सीमित नहीं रहेगी। सरकार देशभर में प्रत्येक भूखंड को 14 अंकों की डिजिटल पहचान देने की तैयारी कर रही है। इसके तहत गांव से लेकर शहर तक हर भूखंड को यूनिवर्सल लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर यानी यूएलपीआइएन दिया जाएगा, जिसे भू-आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।
सरकार ने डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम के तहत इस व्यवस्था के लिए 565.50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी गाइडलाइन जारी करते हुए इसे देश की भूमि प्रबंधन व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव बताया है।
एक जगह दिखेगा जमीन का पूरा रिकॉर्ड
नई डिजिटल व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जमीन से जुड़े अलग-अलग रिकॉर्ड को आपस में जोड़ा जा सकेगा। भूखंड का डिजिटल नक्शा, अधिकार रिकॉर्ड और पंजीकरण संबंधी जानकारी एक साथ उपलब्ध होगी। इससे यह पता लगाना आसान होगा कि जमीन वास्तव में कहां स्थित है, उसकी सीमा क्या है, कब और किसके नाम रजिस्ट्री हुई तथा उस पर किसी तरह का कर्ज या विवाद तो नहीं है।
अभी कई जगहों पर बिखरी रहती है जानकारी
वर्तमान में जमीन की पूरी जानकारी हासिल करने के लिए अलग-अलग कार्यालयों और रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती है। खाता, खसरा या प्लाट नंबर राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज होता है, जबकि जमीन का नक्शा अलग रिकॉर्ड में हो सकता है। खरीद-बिक्री की जानकारी रजिस्ट्री कार्यालय में मिलती है। वहीं बैंक कर्ज या अदालत में चल रहे मामले की जानकारी अलग-अलग स्रोतों से हासिल करनी पड़ती है। इससे जमीन खरीदने वालों के लिए संपत्ति की पूरी स्थिति की जांच करना मुश्किल हो जाता है।
नक्शे से होगा जमीन का मिलान
सरकार कागजों पर मौजूद जमीन के नक्शों को उनकी वास्तविक भौगोलिक स्थिति से जोड़ रही है। भू-आधार मिलने के बाद खरीदार दस्तावेजों में दर्ज जमीन का डिजिटल नक्शे से मिलान कर सकेगा। इससे गलत भूखंड दिखाने, जमीन की गलत पहचान और सीमा विवाद जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिलेगी।
पुराने लेन-देन की जांच भी आसान
नई व्यवस्था के तहत जमीन के पुराने लेन-देन और पंजीकरण रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। पुराने दस्तावेजों को स्कैन कर सुरक्षित रखने से पुश्तैनी जमीन के कागजों के खोने या खराब होने का खतरा कम होगा। जमीन खरीदने से पहले उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच भी आसान हो सकेगी।
राजस्व और अदालतों के रिकॉर्ड भी जुड़ेंगे
जमीन से जुड़े राजस्व और अदालती मामलों को भी भू-आधार से जोड़ने की तैयारी है। इससे भूमि विवादों की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सकेगी और राजस्व अदालतों को पेपरलेस बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही किसानों के लिए संस्थागत ऋण लेना भी आसान होने की उम्मीद है, क्योंकि जमीन से संबंधित जरूरी रिकॉर्ड डिजिटल रूप से उपलब्ध हो सकेंगे।
भू-आधार मालिकाना हक का प्रमाण नहीं
सरकार ने स्पष्ट किया है कि भू-आधार को जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र नहीं माना जाएगा। किसी भूखंड का स्वामित्व संबंधित राज्य के वैध भूमि रिकॉर्ड और वहां लागू कानूनों के आधार पर ही तय होगा। भू-आधार मुख्य रूप से जमीन की डिजिटल पहचान और उससे जुड़े रिकॉर्ड को एक-दूसरे से जोड़ने का माध्यम होगा।
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