बिगड़ी छात्रों की सूरत, पहचान पाना हुआ नामुमकिन, कैसे हुई सत्य निकेतन हादसे के पीड़ितों की शिनाख्त?

Published on 9 सित॰ 2026

बिगड़ी छात्रों की सूरत, पहचान पाना हुआ नामुमकिन, कैसे हुई सत्य निकेतन हादसे के पीड़ितों की शिनाख्त?

Time Published: Wednesday, September 9, 2026, 9:44 [IST]

Satya Niketan Building Collapse: दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्या निकेतन में पीजी गिरने के हादसे के बाद अस्पताल में अपनों की तलाश कर रहे परिवारों के लिए हर गुजरता घंटा भारी था। मलबे से निकले शवों की हालत ऐसी थी कि कई की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया था। ऐसे में परिवार के लोगों ने उन निशानों का सहारा लिया, जिन्हें शायद कभी किसी ने पहचान का जरिया बनने की कल्पना भी नहीं की होगी।

19 साल के अर्पित की मां ने उसके सीने पर मौजूद बड़े तिल से बेटे को पहचाना। वहीं 18 साल के अक्षत सिंह यादव की पहचान उसके पुराने घुटने की चोट और ऑपरेशन के बाद आए टांकों से हुई। दोनों परिवारों के लिए ये निशान जिंदगी का सबसे दर्दनाक सबूत बन गए।

Satya Niketan Building Collapse

रात से अस्पताल में इंतजार कर रहा था परिवार

अर्पित की मां पुष्पा झज्ज, उनके पति भूपेंद्र और परिवार के दो अन्य सदस्य 7 सितंबर की आधी रात के आसपास एम्स ट्रॉमा सेंटर पहुंच गए थे। उन्हें अपने 19 वर्षीय बेटे अर्पित के बारे में कोई साफ जानकारी नहीं मिल रही थी। परिवार कई घंटों तक अस्पताल में उसके बारे में पता लगाने की कोशिश करता रहा। काफी इंतजार के बाद करीब दोपहर 12 बजे उन्हें एक ऐसे शव को देखने की अनुमति मिली, जिसकी पहचान नहीं हो पाई थी।

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चेहरा देखकर मां भी नहीं पहचान पाईं

शव की हालत देखकर अर्पित को पहचानना परिवार के लिए आसान नहीं था। हादसे में उसके चेहरे पर इतनी गंभीर चोटें आई थीं कि चेहरा काफी बदल गया था। खास तौर पर बायां गाल बुरी तरह घायल था। ऐसे में उसकी मां पुष्पा की नजर उसके सीने पर गई। वहां मौजूद बड़ा तिल वह निशान था, जिसे वह अच्छी तरह पहचानती थीं। इसी निशान के आधार पर परिवार ने पुष्टि की कि शव अर्पित का ही है। एक मां के लिए बेटे को इस तरह पहचानना शायद सबसे मुश्किल पल रहा होगा, लेकिन उस वक्त वही छोटा-सा निशान उनके लिए सबसे बड़ा सहारा बन गया।

अक्षत की पहचान भी चेहरे से नहीं हुई

18 साल के अक्षत सिंह यादव के परिवार के सामने भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। अक्षत के चाचा बीरेन कुमार यादव के मुताबिक, हादसे में उसके चेहरे पर इतनी चोटें आई थीं कि उसे देखकर पहचानना बेहद मुश्किल था। परिवार ने उसके शरीर पर पुराने चोट के निशान तलाशे। आखिरकार बचपन में घुटने पर लगी चोट और उसके इलाज के बाद ऑपरेशन से आए टांकों ने अक्षत की पहचान करने में मदद की।

सुबह 4 बजे से अस्पताल में था परिवार

अक्षत के परिवार वाले सुबह करीब 4 बजे ही अस्पताल पहुंच गए थे। घंटों की बेचैनी और इंतजार के बाद करीब दोपहर 2 बजे उन्हें अक्षत का शव सौंपा गया। परिवार के लिए यह सिर्फ बेटे की पहचान की खबर नहीं थी, बल्कि उस उम्मीद का टूटना भी था कि शायद वह हादसे से बच गया हो।

मां ने रोका था, क्लास के लिए निकल गया था

अक्षत के चाचा बीरेन कुमार ने बताया कि हादसे वाले दिन उसकी मां ने उसे कुछ देर और रुकने के लिए कहा था। लेकिन अक्षत ने कहा कि उसे अपनी क्लास के लिए जाना है। वह घर से निकल गया। परिवार को क्या पता था कि कुछ ही समय बाद वही रास्ता उनके लिए जिंदगी का सबसे दुखद इंतजार बन जाएगा। अक्षत के चाचा ने बताया कि अब वह वापस नहीं आएगा। उसकी मां की वह आखिरी रोक और बेटे का क्लास के लिए निकलना परिवार के जेहन में हमेशा के लिए रह गया है।

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