बिहार में सम्राट सरकार के दावों की खुली पोल, स्वास्थ्य सेवाएं तोड़ रहीं दम
Bihar Health Crisis: बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए जा रहे सरकारी दावों की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है. मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में स्ट्रेचर न मिलने पर पति अपनी घायल पत्नी को पीठ पर उठाकर ले जाने को मजबूर दिखा.
Bihar Health Crisis: बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए जा रहे सरकारी दावों की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है. मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में स्ट्रेचर न मिलने पर पति अपनी घायल पत्नी को पीठ पर उठाकर ले जाने को मजबूर दिखा.
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Bihar Health Crisis Photograph: (NN)
Bihar Health Crisis: बिहार में स्वास्थ्य महकमे को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सामने आ रही तस्वीरें व्यवस्था की पूरी पोल खोल देती हैं. सरकार की तरफ से अस्पतालों के कायाकल्प और हर मरीज को बेहतर इलाज देने के दावे तो बहुत होते हैं, मगर असलियत इससे कोसों दूर नजर आती है. मुजफ्फरपुर से लेकर बगहा और मुंगेर तक सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लाचारी यह बताने के लिए काफी है कि यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी किस कदर बदहाल है. आम जनता को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं और लोग अपनों की जान बचाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं.
दावों के बीच मुजफ्फरपुर में बेबसी की तस्वीर
मंच से स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और रेफरल सिस्टम पर सख्ती बरतने की बातें कही जाती हैं. यह भी कहा जाता है कि अस्पतालों में दर्जनों तरह के आपरेशन होंगे और सामुदायिक केंद्रों को आधुनिक बनाया जाएगा. लेकिन इन तमाम बातों के बीच मुजफ्फरपुर के मशहूर एसकेएमसीएच अस्पताल से जो तस्वीर सामने आई, उसने हर किसी को हिलाकर रख दिया. यहां एक महिला का पैर टूट गया था और वह दर्द से कराह रही थी. अस्पताल पहुंचने के बाद जब काफी देर तक स्ट्रेचर नहीं मिला, तो लाचार पति को अपनी घायल पत्नी को पीठ पर लादना पड़ा. वह अपनी पत्नी को कंधे पर बैठाकर डाक्टरों के कमरों के चक्कर काटता रहा. जिस अस्पताल को जिले का सबसे बड़ा सहारा माना जाता है, वहां इलाज की पहली सीढ़ी यानी स्ट्रेचर तक का न होना बेहद शर्मनाक है.
रास्ते में थमी गर्भवती महिला और बच्चे की सांसें
अस्पतालों की बदहाली का आलम केवल मुजफ्फरपुर तक सीमित नहीं है. बगहा के रामनगर इलाके से आई घटना दिल दहला देने वाली है. यहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही सत्ताईस साल की सुमन देवी को अस्पताल ले जाने के लिए समय पर एंबुलेंस तक नहीं मिल सकी. बदहवास परिजन मरीज को ट्रैक्टर पर लादकर अस्पताल ले जाने लगे. लेकिन रास्ते में हरहा नदी पार करते समय ट्रैक्टर पानी और कीचड़ के बीच फंस गया. घंटों की जद्दोजहद के बाद भी समय पर इलाज नहीं मिल सका और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उस मां और उसके गर्भ में पल रहे मासूम बच्चे की मौत हो गई. यह घटना दिखाती है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी बुनियादी स्वास्थ्य और परिवहन तंत्र किस हाल में है.
मुंगेर के मॉडल अस्पताल में आक्सीजन की कमी का आरोप
लापरवाही की इंतहा मुंगेर के तैंतीस करोड़ रुपये की लागत से बने माडल सदर अस्पताल में भी देखने को मिली. यहां डेंगू से पीड़ित एक मरीज की तबीयत बिगड़ने पर परिजनों का आरोप है कि उसे खाली आक्सीजन सिलेंडर लगा दिया गया. आक्सीजन के अभाव में तड़प-तड़प कर मरीज ने दम तोड़ दिया. आरोप है कि मरीज की हालत बिगड़ते ही अस्पताल का मेडिकल स्टाफ वहां से हट गया. जब विधानसभा की शून्यकाल समिति ने इस अस्पताल का औचक निरीक्षण किया तो वहां केवल एक डाक्टर ड्यूटी पर मिला. बत्तीस स्वीकृत पदों में से चौदह पद खाली पड़े थे और पूरे माडल अस्पताल की सर्जिकल सेवाएं केवल एक सर्जन के भरोसे चल रही थीं.
बजट के बावजूद धरातल पर संकट
बिहार में स्वास्थ्य विभाग का बजट तेईस हजार पांच सौ अस्सी करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, लेकिन आबादी के अनुपात में सुविधाएं अब भी बेहद कम हैं. आंकड़ों के अनुसार प्रति दस हजार की आबादी पर लगभग दो बेड ही उपलब्ध हैं. दस लाख की आबादी के हिसाब से यह आंकड़ा करीब दो सौ पांच बेड का बैठता है. इसके अलावा डाक्टरों, नर्सों और जरूरी तकनीकी स्टाफ की भारी कमी है. जब तक अस्पतालों में स्ट्रेचर, आक्सीजन और समय पर एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधाएं हर नागरिक के लिए सुनिश्चित नहीं की जातीं, तब तक आंकड़ों और दावों की चमक से मरीजों की परेशानी कम नहीं होने वाली है.
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