धनुष बाण किसका? सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की चुनाव आयोग को सीधी चुनौती
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Written By:
अनिल सिंह
Updated On: Aug 06, 2026 | 04:58 PM IST
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सार
Shiv Sena Symbol Case Kapil Sibal in Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना सिंबल विवाद पर दूसरे दिन सुनवाई। कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले को कटघरे में खड़ा किया।

सुप्रीम कोर्ट और कपिल सिब्बल (सोर्स-सोशल मीडिया)
विस्तार
Shiv Sena Symbol Supreme Court: देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में असली शिवसेना पार्टी और उसके धनुष-बाण चुनाव चिन्ह के आवंटन को लेकर दायर याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई चल रही है। सुनवाई के दूसरे दिन उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना UBT) की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के फैसले को सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सिब्बल ने दलील दी कि आयोग ने विधायकों की केवल संख्या बल के आधार पर एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानकर चुनाव चिन्ह सौंपने में बड़ी जल्दबाजी की थी।
अयोग्यता का फैसला होने से पहले ही हाथ से निकल गई बाजी
सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखते हुए कपिल सिब्बल ने कहा, “मैं यह मुद्दा अदालत के सामने ला रहा हूं क्योंकि यही सबसे बड़ी समस्या है। जब चुनाव आयोग विधायकों की अयोग्यता याचिकाएं लंबित रहने के दौरान ही यह तय कर देता है कि मूल राजनीतिक दल कौन सा है, तो पूरी प्रक्रिया ही प्रभावहीन हो जाती है। एक बार आयोग किसी गुट को पार्टी का चुनाव चिन्ह सौंप देता है, तो बाद में अयोग्यता पर आने वाले फैसले का कोई व्यावहारिक लाभ नहीं रह जाता।”
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सिब्बल ने पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष दी गई अपनी पुरानी दलीलों का हवाला देते हुए कहा कि अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने तक आयोग को इंतजार करना चाहिए था।
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“विधायी दल में फूट का मतलब राजनीतिक दल में टूट नहीं”
कपिल सिब्बल ने अदालत के समक्ष बेहद महत्वपूर्ण कानूनी तर्क रखते हुए स्पष्ट किया कि किसी राजनीतिक दल के ‘विधायी दल’ (Legislative Wing) में असंतोष या फूट पड़ने का तात्पर्य यह नहीं होता कि मूल ‘राजनीतिक दल’ (Political Party) भी विभाजित हो गया है।
उन्होंने पीठ का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि संकट के समय भी उद्धव ठाकरे के पास पार्टी के संगठनात्मक ढांचे (Organizational Wing) में स्पष्ट बहुमत हासिल था। अपनी दलीलों के समर्थन में सिब्बल ने केरल उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले और ‘इंदिरा गांधी बनाम ब्रह्मानंद रेड्डी’ मामले का विशेष रूप से उल्लेख किया।
2023 में जवाब दाखिल होने से पहले ही हो चुका था फैसला
ठाकरे गुट के वकील ने चुनाव आयोग के ढर्रे पर सवाल उठाते हुए कहा कि अयोग्यता याचिकाओं पर औपचारिक जवाब वर्ष 2023 में दाखिल किए गए थे, लेकिन उससे बहुत पहले ही चुनाव आयोग ने पार्टी नाम और निशान पर अपना फैसला सुना दिया था।
इसी वजह से आज ठाकरे गुट को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल राजनीतिक और कानूनी लड़ाई पर पूरे महाराष्ट्र की नजरें टिकी हुई हैं।
