दीपांकर भट्टाचार्य ने आरएसएस की ‘जेन-जेड’ से संवाद की योजना पर सवाल उठाए

Published on 4 अग॰ 2026

नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की युवाओं से संवाद की योजना पर मंगलवार को सवाल उठाए और कहा कि ‘संघ परिवार’ को युवाओं से जुड़ने की कोशिश करने से पहले किशोरों को ‘बलात्कार और जान से मारने की धमकियां’ देना बंद करना चाहिए।

भट्टाचार्य ने यह प्रतिक्रिया आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा छह अगस्त को मुंबई के नीता मुकेश अंबानी सेंटर में 100 शहरों के 15-19 साल के लगभग 2,000 छात्रों को संबोधित करने के कार्यक्रम पर दिये। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम का पैमाना ‘प्रभावशाली’ है, लेकिन इसका उद्देश्य क्या है।

भाकपा (माले) लिबरेशन महासचिव ने कहा, ‘‘कहा जा रहा है कि आरएसएस ‘जेन जेड’ तक पहुंचने के लिए बहुत बेताब है। मोहन भागवत 100 शहरों से लाए गए 15 से 19 साल की उम्र के 2,000 छात्रों को संबोधित करने वाले हैं। संख्या तो प्रभावशाली है, लेकिन इस संवाद का उद्देश्य क्या होगा?’’

सत्तारूढ़ व्यवस्था पर युवा प्रदर्शनकारियों के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘ मोदी पहले ही ‘सांस्कृतिक झटके’ की बात कर चुके हैं, ऐसा करते हुए उन्होंने भारत की ‘भटकी हुई बेटियों’ को लेकर पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों का सहारा लिया है। सुनियोजित तरीके से ऑनलाइन और ऑफलाइन हो रही प्रतिक्रिया के कारण 15 वर्ष के बच्चों तक को माफी मांगते हुए वीडियो जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।’

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उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता रमेश बिधूड़ी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वालों को ‘पंचर बनाने वाले’ कहा, भाजपा सांसद कंगना रनौत ने ‘जेन जेड’ को ‘जेनरेशन गटर’ कहा, पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रदर्शनकारियों को आतंकवादी बताया और आरएसएस के संयुक्त महासचिव अतुल लिमये ने इन प्रदर्शनों को ‘संविधान-विरोधी’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दिया।

भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘आरएसएस वास्तव में भारत की ‘जेन-जेड’ की बात सुनना चाहता है, तो उसे सबसे पहले संघ परिवार से कहना चाहिए कि वे 15 साल के बच्चों को दुष्कर्म और जान से मारने की धमकियां देना बंद करें।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसके बजाय, उन्हें मतादन करने की उम्र घटाकर 16 साल कर देनी चाहिए। आज के डिजिटल युग और सूचना क्रांति के दौर में, 16 साल के किशोर इतने जागरुक होते हैं कि वे अपनी राजनीतिक पसंद तय कर सकें।’’

भाषा धीरज शोभना

शोभना