बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी डॉक्टर नहीं कर सकेंगे प्राइवेट प्रैक्टिस, राज्य सरकार को राहत| Navbharat Live

Published on 3 अग॰ 2026

बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी डॉक्टर नहीं कर सकेंगे प्राइवेट प्रैक्टिस, राज्य सरकार को राहत

  • Written By:

    रूपम सिंह

Updated On: Aug 03, 2026 | 04:58 PM IST

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सार

Bombay High Court: बॉम्बे हाई कोर्ट की संभाजीनगर खंडपीठ ने फैसला दिया है कि सरकारी मेडिकल अधिकारी निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते। अदालत ने इस संबंध में सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं।

Bombay High Court's Sambhajinagar bench rules that government medical officers cannot engage in private practice, dismissing all pending petitions

बॉम्बे हाई कोर्ट (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)

विस्तार

Bombay High Court Doctors Verdict: बॉम्बे हाई कोर्ट की छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ ने सरकारी मेडिकल अधिकारियों की निजी प्रैक्टिस को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा में कार्यरत मेडिकल अधिकारी निजी चिकित्सा प्रैक्टिस नहीं कर सकते। इसके साथ ही इस विषय से संबंधित लंबे समय से लंबित सभी याचिकाओं को भी खारिज कर दिया गया।

पूर्णकालिक सरकारी सेवा देना होगी प्राथमिक जिम्मेदारी

राज्य सरकार के अनुसार अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी मेडिकल अधिकारी महाराष्ट्र सिविल सर्विस नियमों और राज्य सरकार की नीतियों के अधीन कार्य करते हैं। ऐसे अधिकारियों से पूर्णकालिक सरकारी सेवा देने की अपेक्षा की जाती है। इसलिए सरकारी सेवा में रहते हुए उन्हें निजी चिकित्सा प्रैक्टिस की अनुमति नहीं दी जा सकती।

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मिलेगा लाभ

कानूनी और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता बेहतर होगी। विशेष रूप से ग्रामीण और शहरी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को अधिक प्रभावी और नियमित चिकित्सा सेवाएं मिलने की संभावना है। यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने, अनुशासन बनाए रखने और मरीजों के हितों को प्राथमिकता देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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सरकार की ओर से प्रभावी पैरवी

इस मामले में राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील अतुल काले ने अदालत में पक्ष रखा। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के विधिक सलाहकार एडवोकेट सतीश भेडेकर ने आवश्यक दस्तावेज तैयार कराने, कानूनी समन्वय और मामले की पैरवी में सहयोग किया। अदालत के फैसले के बाद सरकार ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण निर्णय बताया है।

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