Chamraua Assembly Caste Equations: चमरौआ विधानसभा के जातिगत समीकरण 2027

Published on 31 जुल॰ 2026

रामपुर जिले की चमरौआ विधानसभा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन सीटों में शामिल है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की मजबूत मौजूदगी के साथ लोधी, सैनी, दलित, सिख, पाल और दूसरे पिछड़े वर्ग चुनावी नतीजे की दिशा तय करते हैं। Chamraua Assembly Caste Equations को देखें तो पुराने चुनावी आकलनों में मुस्लिम मतदाता इस सीट का सबसे बड़ा सामाजिक समूह रहे हैं, जबकि लोधी समाज सबसे महत्वपूर्ण गैर-मुस्लिम समूहों में गिना जाता है। 2026 की अंतिम SIR मतदाता सूची के मुताबिक चमरौआ विधानसभा में कुल 2,79,590 मतदाता हैं। इनमें 1,53,739 पुरुष, 1,25,838 महिला और 13 अन्य मतदाता शामिल हैं।

जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 प्रदेश की राजनीति की अगली तस्वीर तय करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

चमरौआ का हालिया राजनीतिक इतिहास समाजवादी पार्टी की मजबूती दिखाता है। 2012 में बसपा ने बेहद करीबी मुकाबले में सीट जीती थी, लेकिन 2017 और 2022 में सपा के नसीर अहमद खान लगातार विजयी हुए। 2022 में सपा ने भाजपा को 34,290 वोट से हराया था। इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में भी चमरौआ विधानसभा सेगमेंट में सपा को भाजपा पर 39,248 वोट की बढ़त मिली।

चमरौआ विधानसभा एक नजर में

विवरणजानकारी
विधानसभाचमरौआ
विधानसभा संख्या35
जिलारामपुर
लोकसभा क्षेत्ररामपुर
आरक्षणसामान्य
वर्तमान विधायकनसीर अहमद खान
पार्टीसमाजवादी पार्टी
2022 जीत का अंतर34,290 वोट
2026 कुल मतदाता2,79,590
पुरुष मतदाता1,53,739
महिला मतदाता1,25,838
अन्य13
प्रमुख सामाजिक समूहमुस्लिम, लोधी, सैनी, दलित, सिख, पाल व अन्य OBC
प्रमुख चुनावी मुद्देकृषि, रोजगार, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास

चमरौआ विधानसभा का मौजूदा स्वरूप 2008 के परिसीमन के बाद बना और 2012 में यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ। उस चुनाव में बसपा के अली यूसुफ अली ने सपा के नसीर अहमद खान को सिर्फ 1,846 वोटों से हराया था। इसके बाद 2017 और 2022 में नसीर अहमद खान ने सपा के टिकट पर लगातार दो जीत दर्ज कीं।

Chamraua Assembly Caste Equations में मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ा चुनावी समूह माने जाते हैं। पुराने सीटवार सामाजिक आकलन में करीब 1.70 लाख मुस्लिम, 50 हजार लोधी, 20 हजार सैनी, 10 हजार सिख और करीब 5 हजार पाल मतदाताओं का अनुमान दिया गया था। उस समय कुल मतदाता आधार करीब तीन लाख के आसपास था।

एक अन्य पुराने चुनावी आकलन में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 53 प्रतिशत बताई गई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि चमरौआ को लंबे समय से मुस्लिम प्रभाव वाली विधानसभा के रूप में देखा जाता रहा है।

हालांकि इन संख्याओं को 2026 की मौजूदा जातिवार मतदाता संख्या नहीं माना जाना चाहिए। SIR के बाद कुल मतदाताओं की संख्या ही घटकर 2,79,590 हो चुकी है और वर्तमान जाति या धर्म के आधार पर आधिकारिक मतदाता संख्या अलग से उपलब्ध नहीं है।

चमरौआ का पुराना अनुमानित जातीय समीकरण

सामाजिक समूहपुराने चुनावी आकलन में संख्या
मुस्लिमलगभग 1,70,000
लोधीलगभग 50,000
सैनीलगभग 20,000
सिखलगभग 10,000
पाललगभग 5,000
दलित व अन्य समुदायअलग-अलग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण

इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि मुस्लिम वोट चमरौआ में मजबूत आधार बनाता है, जबकि लोधी, सैनी, दलित और दूसरे गैर-मुस्लिम समुदाय मिलकर ऐसा चुनावी ब्लॉक बना सकते हैं जो मुकाबले को सीधे प्रभावित करे।

2026 में चमरौआ विधानसभा में 2,79,590 मतदाता

10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम SIR मतदाता सूची में चमरौआ विधानसभा के कुल 2,79,590 मतदाता दर्ज हैं। इनमें 1,53,739 पुरुष और 1,25,838 महिला मतदाता हैं। 13 मतदाता अन्य श्रेणी में दर्ज किए गए हैं।

मतदाता वर्गमतदाता संख्या
पुरुष1,53,739
महिला1,25,838
अन्य13
कुल2,79,590

27 अक्टूबर 2025 की मतदाता सूची में चमरौआ में 3,18,720 मतदाता थे। SIR की अंतिम सूची आने तक संख्या घटकर 2,79,590 हो गई। यानी पुरानी सूची के मुकाबले 39,130 मतदाताओं की शुद्ध कमी हुई।

चरणकुल मतदाता
27 अक्टूबर 20253,18,720
6 जनवरी 2026 ड्राफ्ट सूची2,58,673
10 अप्रैल 2026 अंतिम सूची2,79,590
प्री-SIR से शुद्ध कमी39,130

ड्राफ्ट सूची प्रकाशित होने के बाद दावे-आपत्तियों और पात्र मतदाताओं को शामिल करने की प्रक्रिया में 20,917 मतदाता और जुड़े। इसके बावजूद अंतिम सूची पुरानी आधार सूची से लगभग 39 हजार छोटी रही।

यही बदलाव 2027 के चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण होगा। 2022 या उससे पहले के जातीय आंकड़ों को मौजूदा 2.80 लाख के आसपास के मतदाता आधार पर सीधे लागू करना सही नहीं होगा।

मुस्लिम मतदाता चमरौआ में क्यों हैं निर्णायक?

चमरौआ की गिनती लंबे समय से रामपुर जिले की मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों में होती रही है। पुराने राजनीतिक आकलनों में यहां आधे से अधिक मतदाता मुस्लिम बताए गए थे। तुर्क मुस्लिम समुदाय की मौजूदगी को भी क्षेत्र की राजनीति में खास तौर पर महत्वपूर्ण माना गया है।

पिछले तीन विधानसभा चुनावों के परिणाम भी मुस्लिम मतों की ताकत दिखाते हैं।

2012 में बसपा के अली यूसुफ अली और सपा के नसीर अहमद खान के बीच सीधा मुकाबला हुआ। दोनों मुस्लिम प्रत्याशी थे और बसपा केवल 1,846 वोट से जीत सकी।

2017 में सपा और बसपा ने फिर मुस्लिम प्रत्याशी उतारे। इस बार सपा ने बड़ी बढ़त बनाई, जबकि भाजपा भी लगभग 51 हजार वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रही।

2022 में सपा के नसीर अहमद खान ने पहली बार एक लाख से अधिक वोट हासिल किए और भाजपा को सीधे मुकाबले में 34 हजार से ज्यादा वोटों से हराया।

इससे संकेत मिलता है कि मुस्लिम मतदाताओं में पार्टी और प्रत्याशी के आधार पर विभाजन संभव है, लेकिन बड़ा हिस्सा एक प्रत्याशी के पीछे एकजुट हो जाए तो परिणाम पर उसका स्पष्ट असर पड़ता है।

तुर्क मुस्लिम समाज की भूमिका

चमरौआ के सामाजिक समीकरण में मुस्लिम समुदाय के भीतर तुर्क समाज की मौजूदगी लंबे समय से चर्चा में रही है। पुराने चुनावी विवरणों में तुर्क मतदाताओं की संख्या को खास तौर पर प्रभावशाली बताया गया है।

2012 में विजेता अली यूसुफ अली भी तुर्क समुदाय से आते हैं। चुनावी राजनीति में इस सामाजिक समूह की भूमिका केवल अपनी संख्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्थानीय नेतृत्व और गांवों में राजनीतिक नेटवर्क भी इसका प्रभाव बढ़ाते हैं।

हालांकि पूरे मुस्लिम वोट को किसी एक बिरादरी या दल के साथ जोड़ना सही नहीं होगा। प्रत्याशी, पार्टी, स्थानीय समीकरण और चुनावी माहौल मुस्लिम समाज के भीतर वोट वितरण को प्रभावित करते हैं।

लोधी वोट भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में

चमरौआ के गैर-मुस्लिम चुनावी गणित में लोधी मतदाताओं की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। पुराने सीटवार आकलन में लगभग 50 हजार लोधी मतदाता बताए गए थे।

भाजपा ने 2017 और 2022 दोनों चुनावों में मोहन कुमार लोधी को प्रत्याशी बनाया।

2017 में उन्हें 50,954 वोट मिले थे। 2022 में उनका वोट बढ़कर 66,686 पहुंच गया। यानी पांच साल में भाजपा प्रत्याशी ने करीब 15,700 अतिरिक्त वोट हासिल किए।

इसके बावजूद सपा ने दोनों चुनाव बड़े अंतर से जीते।

यही कारण है कि भाजपा के लिए केवल लोधी मतदाताओं की मजबूत एकजुटता पर्याप्त नहीं है। पार्टी को सैनी, दलित, सिख, पाल, ठाकुर, ब्राह्मण और दूसरे गैर-मुस्लिम OBC समूहों को भी अपने साथ जोड़ने की जरूरत होगी।

सैनी वोट भी कर सकते हैं मुकाबले में अंतर

पुराने सामाजिक आकलन में चमरौआ में करीब 20 हजार सैनी मतदाता बताए गए थे। रामपुर जिले की व्यापक सामाजिक संरचना में भी सैनी समाज एक प्रमुख गैर-मुस्लिम OBC समूह माना जाता है।

करीब 20 हजार के पुराने अनुमान वाला वोट बैंक उस सीट पर बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है जहां 2012 में जीत का अंतर केवल 1,846 वोट रहा हो।

भाजपा के लिए लोधी-सैनी समीकरण मजबूत आधार बना सकता है। वहीं सपा अगर मुस्लिम वोटों के साथ सैनी और दूसरे OBC मतदाताओं में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाती है तो उसका सामाजिक गठबंधन और व्यापक हो सकता है।

2027 में टिकट चयन भी इस वोट बैंक के रुख पर असर डाल सकता है।

दलित वोट पर भाजपा, सपा और बसपा की नजर

चमरौआ में अनुसूचित जाति मतदाताओं की वर्तमान सीटवार आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन रामपुर जिले के राजनीतिक समीकरण में दलित मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।

बसपा के लिए यह उसका पारंपरिक आधार रहा है। 2017 में बसपा को चमरौआ में 53,024 वोट मिले थे और वह दूसरे स्थान पर रही। 2022 में पार्टी का वोट घटकर केवल 10,366 रह गया।

चुनावबसपा वोट
201237,083
201753,024
202210,366

2017 से 2022 के बीच बसपा के वोट में लगभग 43 हजार की गिरावट हुई। इसी अवधि में सपा और भाजपा दोनों के वोट बढ़े।

यह बदलाव चमरौआ के चुनावी विश्लेषण में बेहद महत्वपूर्ण है। यदि 2027 में बसपा अपना दलित आधार फिर मजबूत करती है तो सपा और भाजपा दोनों के मौजूदा वोट शेयर पर असर पड़ सकता है।

सिख और किसान वोट भी महत्वपूर्ण

पुराने जातीय आकलन में चमरौआ में करीब 10 हजार सिख मतदाता बताए गए थे। रामपुर और तराई से जुड़े क्षेत्रों में सिख परिवारों की खेती-किसानी में मजबूत मौजूदगी रही है।

चमरौआ की राजनीति मुख्य रूप से ग्रामीण सामाजिक संरचना से प्रभावित होती है। इस कारण जातीय पहचान के साथ कृषि संबंधी मुद्दे भी चुनावी व्यवहार में भूमिका निभाते हैं।

गन्ना भुगतान, फसल मूल्य, सिंचाई, बिजली, खाद-बीज, ग्रामीण सड़क, पशुओं की समस्या और खेती की लागत जैसे मुद्दे मुस्लिम, लोधी, सैनी, सिख और दूसरे किसान समुदायों को एक साथ प्रभावित कर सकते हैं।

2027 में अगर किसान मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में आते हैं तो सामाजिक गठबंधन में कुछ बदलाव संभव है।

2022 में सपा को मिले एक लाख से ज्यादा वोट

2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के नसीर अहमद खान ने 1,00,976 वोट, यानी 50.34 प्रतिशत मत हासिल किए।

भाजपा के मोहन कुमार लोधी को 66,686 वोट और 33.24 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस के अली यूसुफ अली 18,213 वोट लेकर तीसरे और बसपा के अब्दुल मुस्तफा हुसैन 10,366 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहे।

सपा ने चुनाव 34,290 वोटों के अंतर से जीता।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
नसीर अहमद खानसपा1,00,97650.34%
मोहन कुमार लोधीभाजपा66,68633.24%
अली यूसुफ अलीकांग्रेस18,2139.08%
अब्दुल मुस्तफा हुसैनबसपा10,3665.17%
NOTA9810.49%
जीत का अंतर34,29017.1%

2022 में सपा का 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना बताता है कि पार्टी ने केवल किसी सीमित सामाजिक आधार पर जीत दर्ज नहीं की, बल्कि व्यापक समर्थन जुटाया।

2017 में सपा, बसपा और भाजपा के बीच था त्रिकोणीय मुकाबला

2017 विधानसभा चुनाव में नसीर अहमद खान ने सपा के टिकट पर 87,400 वोट हासिल किए। बसपा के तत्कालीन विधायक अली यूसुफ अली को 53,024 वोट और भाजपा के मोहन कुमार लोधी को 50,954 वोट मिले।

सपा ने बसपा को 34,376 वोटों से हराया।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
नसीर अहमद खानसपा87,40044.99%
अली यूसुफ अलीबसपा53,02427.29%
मोहन कुमार लोधीभाजपा50,95426.23%
जीत का अंतर34,376

बसपा और भाजपा के बीच सिर्फ 2,070 वोट का अंतर था। इससे स्पष्ट है कि उस चुनाव में विपक्षी वोट दो बड़े दलों के बीच बंटे थे।

2022 में बसपा का वोट कमजोर हुआ और मुख्य मुकाबला सीधे सपा-भाजपा में बदल गया।

2012 में सिर्फ 1,846 वोट से जीती थी बसपा

चमरौआ विधानसभा के मौजूदा स्वरूप में पहला चुनाव 2012 में हुआ।

बसपा के अली यूसुफ अली को 37,083 वोट मिले, जबकि सपा के नसीर अहमद खान ने 35,237 वोट हासिल किए।

बसपा सिर्फ 1,846 वोट से जीत सकी।

चुनावविजेतापार्टीविजेता के वोटजीत का अंतर
2012अली यूसुफ अलीबसपा37,0831,846
2017नसीर अहमद खानसपा87,40034,376
2022नसीर अहमद खानसपा1,00,97634,290

2012 से 2022 के बीच सबसे बड़ा बदलाव सपा के वोटों में हुआ। 2012 में उसके करीब 35 हजार वोट थे, जो दस साल बाद बढ़कर एक लाख से अधिक हो गए।

बसपा से सपा की तरफ कैसे बदला चमरौआ का चुनावी रुख?

2012 में चमरौआ सीट बसपा ने जीती थी और सपा सिर्फ 1,846 वोट पीछे थी।

2017 आते-आते सपा का वोट 35 हजार से बढ़कर 87 हजार से अधिक हो गया और बसपा को 34 हजार से ज्यादा वोट से हार मिली।

2022 में सपा का वोट फिर बढ़कर एक लाख के पार पहुंच गया, जबकि बसपा 10 हजार के आसपास सिमट गई।

यही बदलाव चमरौआ में पिछले एक दशक की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानी है।

बसपा के कमजोर होने से मुस्लिम और दलित वोटों के पुराने समीकरण में बदलाव आया। भाजपा ने लोधी और दूसरे गैर-मुस्लिम समूहों के आधार पर अपनी ताकत बढ़ाई, लेकिन सपा का वोट विस्तार उससे ज्यादा रहा।

2024 लोकसभा चुनाव में भी सपा को 39,248 वोट की बढ़त

2024 लोकसभा चुनाव में चमरौआ विधानसभा क्षेत्र ने फिर समाजवादी पार्टी के पक्ष में बड़ी बढ़त दी।

सपा उम्मीदवार को यहां से 1,04,528 वोट, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 65,280 वोट मिले।

सपा की बढ़त 39,248 वोट रही।

2024 लोकसभा: चमरौआ सेगमेंटवोट
सपा1,04,528
भाजपा65,280
सपा की बढ़त39,248

2019 लोकसभा चुनाव में भी सपा को चमरौआ से करीब 39,840 वोट की बढ़त मिली थी। यानी पिछले दो लोकसभा चुनावों में चमरौआ सेगमेंट का चुनावी झुकाव लगभग समान स्तर पर सपा के पक्ष में रहा।

2022 और 2024 का वोट लगभग एक जैसा संकेत देता है

2022 विधानसभा चुनाव में सपा को 1,00,976 और भाजपा को 66,686 वोट मिले थे।

2024 लोकसभा चुनाव में सपा को 1,04,528 और भाजपा को 65,280 वोट मिले।

चुनावसपाभाजपासपा की बढ़त
विधानसभा 20221,00,97666,68634,290
लोकसभा 20241,04,52865,28039,248

दोनों चुनावों का आंकड़ा बताता है कि 2022 से 2024 के बीच चमरौआ में दोनों प्रमुख दलों का मूल वोट आधार अपेक्षाकृत स्थिर रहा, जबकि सपा की बढ़त कुछ और बढ़ी।

लेकिन 2026 SIR के बाद 39 हजार से ज्यादा मतदाताओं की शुद्ध कमी ने 2027 के लिए इस पुराने गणित को दोबारा जांचने की जरूरत पैदा कर दी है।

सपा का चुनावी गणित: मुस्लिम वोट के साथ OBC-दलित समर्थन

सपा के लिए चमरौआ में सबसे बड़ा आधार मुस्लिम मतदाता हैं। लेकिन 2022 में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल करने का मतलब है कि पार्टी को केवल एक सामाजिक समूह तक सीमित समर्थन नहीं मिला।

नसीर अहमद खान की लगातार दो विधानसभा जीत उनके व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क को भी मजबूत करती है।

2027 में सपा की पहली चुनौती अपने मुस्लिम वोट आधार को बनाए रखने की होगी। इसके साथ लोधी, सैनी, पाल, दलित और दूसरे ग्रामीण समुदायों से मिलने वाला अतिरिक्त समर्थन जीत का अंतर तय करेगा।

बसपा या कांग्रेस यदि मजबूत मुस्लिम या दलित उम्मीदवार उतारती हैं तो सपा के वोट बैंक पर दबाव बन सकता है।

भाजपा का रास्ता: लोधी के साथ गैर-मुस्लिम वोटों का व्यापक गठजोड़

भाजपा ने चमरौआ में पिछले दो विधानसभा चुनावों में मोहन कुमार लोधी पर भरोसा किया और पार्टी का वोट 2017 के करीब 51 हजार से बढ़कर 2022 में 66 हजार से अधिक पहुंच गया।

यह सीट पर भाजपा के बढ़ते सामाजिक आधार को दिखाता है, लेकिन जीत के लिए अब भी बड़ा अंतर भरना बाकी है।

भाजपा के लिए लोधी मतदाताओं के साथ सैनी, दलित, सिख, पाल और अन्य गैर-मुस्लिम OBC तथा सवर्ण मतों का अधिकतम एकीकरण जरूरी होगा।

इसके अलावा मुस्लिम वोटों में बड़ा विभाजन भाजपा की संभावना बढ़ा सकता है।

2017 में मुस्लिम प्रत्याशियों के बीच वोटों का विभाजन होने के बावजूद भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी। इसलिए पार्टी को केवल विपक्षी विभाजन पर निर्भर रहने के बजाय अपने सामाजिक आधार में विस्तार करना होगा।

बसपा की वापसी हुई तो किसे नुकसान?

चमरौआ में बसपा कभी कमजोर पार्टी नहीं थी। 2012 में उसने सीट जीती और 2017 में 53 हजार से अधिक वोट हासिल किए।

लेकिन 2022 में उसका वोट घटकर सिर्फ 10,366 रह गया।

अगर बसपा 2027 में अपने दलित आधार को दोबारा संगठित करती है और मुस्लिम वोटों का हिस्सा हासिल करती है तो मुकाबला फिर त्रिकोणीय बन सकता है।

मुस्लिम वोटों में बसपा की सेंध सपा को प्रभावित करेगी, जबकि दलित मतदाता भाजपा से बसपा की ओर लौटते हैं तो भाजपा का गठजोड़ कमजोर हो सकता है।

इसलिए बसपा का प्रत्याशी चमरौआ के चुनावी परिणाम में केवल तीसरे स्थान का उम्मीदवार नहीं, बल्कि मुख्य मुकाबले का संतुलन बदलने वाला फैक्टर हो सकता है।

2026 SIR ने कैसे बदला चमरौआ का पुराना गणित?

चमरौआ में 2026 SIR से पहले मतदाता संख्या 3,18,720 थी। अंतिम सूची में सिर्फ 2,79,590 मतदाता रह गए।

इस तरह 39,130 मतदाताओं की शुद्ध कमी हुई।

2017 में कुल मतदाता करीब 2.99 लाख, 2022 में करीब 3.08 लाख और 2024 में करीब 3.14 लाख तक पहुंच गए थे। 2026 में संख्या फिर घटकर करीब 2.80 लाख हो गई है।

वर्षमतदाता आधार
20122,68,465
20172,99,126
20223,07,984
20243,13,588
20262,79,590

इस बदलाव का मतलब है कि पिछले चुनावों में तैयार जातीय और बूथवार गणित को 2027 में दोबारा बनाना होगा।

पुराने लगभग 1.70 लाख मुस्लिम, 50 हजार लोधी या 20 हजार सैनी जैसे आंकड़े अब केवल ऐतिहासिक चुनावी अनुमान हैं। नई सूची के बाद वास्तविक बूथवार स्थिति अलग हो सकती है।

2027 में इन छह जातीय समीकरणों पर रहेगी नजर

2027 विधानसभा चुनाव में चमरौआ की लड़ाई छह प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक सवालों के आसपास घूम सकती है।

पहला सवाल मुस्लिम वोट का होगा। आधे से अधिक पुराने प्रभाव वाला यह वोट यदि सपा के पक्ष में बड़े स्तर पर एकजुट रहता है तो पार्टी मजबूत स्थिति में रहेगी।

दूसरा फैक्टर लोधी वोट होगा। भाजपा के लिए यह उसका सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में से एक है। पार्टी को इस वोट के साथ दूसरे OBC और दलित समूहों को भी जोड़ना होगा।

तीसरा सैनी और दूसरे गैर-यादव OBC मतदाताओं का रुख रहेगा। इन समूहों में कुछ हजार वोटों का बदलाव मुख्य मुकाबले के अंतर को काफी प्रभावित कर सकता है।

चौथा दलित वोट है। बसपा की ताकत बढ़ती है या दलित मतदाता भाजपा-सपा में बंटते हैं, इसका प्रभाव सीट पर सीधा पड़ेगा।

पांचवां प्रत्याशी चयन होगा। नसीर अहमद खान की लगातार दो जीत और भाजपा के मोहन कुमार लोधी की पिछली दो चुनावी मौजूदगी बताती है कि स्थानीय चेहरा सामाजिक वोट ट्रांसफर में महत्वपूर्ण है।

छठा और सबसे नया फैक्टर 2026 की 2,79,590 मतदाताओं वाली नई सूची है। 2025 की आधार सूची से लगभग 39 हजार मतदाताओं की शुद्ध कमी किसी भी पुराने चुनावी अनुमान को बदलने के लिए पर्याप्त है।

2017 और 2022 विधानसभा चुनावों के साथ 2019 और 2024 लोकसभा चुनावों में भी चमरौआ से सपा को लगातार बढ़त मिली है। इसलिए मौजूदा चुनावी रिकॉर्ड सपा को मजबूत स्थिति में दिखाता है। लेकिन बदली मतदाता सूची, लोधी-OBC समीकरण, बसपा की संभावित वापसी और मुस्लिम वोटों के वितरण से 2027 की वास्तविक तस्वीर तय होगी।

उत्तर प्रदेश की सभी सीटों की सामाजिक संरचना और चुनावी गणित जानने के लिए उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा के जातिगत समीकरण की विस्तृत कवरेज पढ़ी जा सकती है।

प्रत्याशियों, टिकट वितरण, गठबंधन, सीटवार रणनीति और राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव की विस्तृत कवरेज पढ़ें।

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