मुन्ना, मछली, माया, मटकासुुर... बाघों को कैसे मिले ये नाम? दिलचस्प है इनकी कहानी

Published on 29 जुल॰ 2026

मुन्ना, मछली, माया, मटकासुुर... बाघों को कैसे मिले ये नाम? दिलचस्प है इनकी कहानी

देश में बाघाें को माया, मुन्ना, मटकासुर, छोटा मुन्ना, एरोहेड और मछली जैसे नाम दिए गए.

देश में बाघों को तकनीकी तौर पर T15, T84, T12 जैसे कोड देने का चलन रहा है, लेकिन इनकी खूबियों के नाम इन्हें इंसानी नाम भी दिए गए. कभी वन रक्षकों ने तो कभी आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने. कभी इनके शरीर पर मौजूद धारियों के कारण नाम रखा गया तो कभी नामों को तय करने के पीछे इनकी कोई खास आदत को आधार बनाया गया. इन्हें माया, मुन्ना, मटकासुर, छोटा मुन्ना, एरोहेड और मछली समेत कई नाम दिए गए. वर्ल्ड टाइगर डे के मौके पर जानिए देश में बाघों को कैसे-कैसे नाम मिले और उसके पीछे की वजह क्या थी.

बाघों के सबसे दिलचस्प नामों की लिस्ट में सबसे खास नाम है मछली. यह राजस्थान के रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान की बाघिन रही है. इसकी अगली पीढ़ियों ने भी खूब चर्चा बटोरी.

मछली बाघिन को कैसे मिला नाम?

राजस्थान के रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान की बाघिन मछलियों का शिकार करती थी, लेकिन इसे यह नाम सिर्फ मछलियों का शिकार करने के कारण नहीं मिला. इसकी वजह थी चेहरे पर मौजूद मछलियों के आकार के निशान. मछली को दुनिया की सबसे फोटो खिंचवाने वाली बाघिन कहा जाता है. इसकी बेटी को टी-16 नाम दिया गया था, ने रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान में जल निकायों के पास के क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था और उसी नाम से अपना अस्तित्व बनाए रखा.

Machli Tigress

मछली बाघिन.

रानी मां, झील की देवी और एरोहेड

बाघिन को रानी मां और झील की देवी जैसे नाम भी मिले. इसकी भी एक कहानी है. एक कहानी जो अक्सर दोहराई जाती है, बात जून 2003 की है. रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान सूखे की चपेट में था और एक मगरमच्छ एक झील के पास मंडरा रहा था. मछली अपने शावकों के साथ थी, जिन्हें उसने सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और फिर 14 फुट के उस मगरमच्छ से लड़ने के लिए वापस लौटी. लड़ाई डेढ़ घंटे तक चली और बाघिन जीती.

मछली का निधन अगस्त 2018 में हुआ तब वह लगभग 20 वर्ष की थी. बाघों की औसत आयु आठ से दस वर्ष होती है, मछली की उम्र उससे कहीं अधिक थी. उसने राजस्थान के पर्यटन क्षेत्र में लगभग 10 मिलियन डॉलर का राजस्व अर्जित किया. वह न तो पर्यटकों से डरती थी और न ही सफारी वाहनों के पार्क में आने पर भागती थी. कैमरे के सामने सहजता से खड़ी रहती थी.

Arrowhead Tigress

एरोहेड बाघिन.

नर बाघों का सामना करती थी और यहां तक कि दर्शकों के सामने मगरमच्छ को भी मार गिराती थी, रणथंबोर की सबसे प्रसिद्ध बाघिनों में से एक रही एरोहेड, जो मछली की पोती है. अगर ध्यान से देखें तो पाएंगे कि बाघिन के माथे पर तीर जैसा निशान है और इसी से उसका नाम पड़ा.

मछली की बेटी कृष्णा की संतान एरोहेड अपनी दादी की तरह ही दिखती है. रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान की वेबसाइट पर एक ब्लॉग में उसे ‘मछली जूनियर’ कहा गया है. उसने अभी तक मगरमच्छ का सामना नहीं किया है, लेकिन फिर भी वह बहुत साहसी है. उसने अपनी मां कृष्णा को चुनौती दी और झील के प्रमुख क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, जिस पर मछली का भी दबदबा था और जिसे बाद में “झीलों की रानी” कहा गया.

Maya Tigress (1)

महाराष्ट्र का ताडोबा माया के नाम से मशहूर हो हुआ.

माया की कहानी

हर बाघ अभ्यारण्य में कोई न कोई खास बाघिन होती है. महाराष्ट्र का ताडोबा माया के नाम से मशहूर हो हुआ. रिकॉर्ड में उसका नंबर T-12 है, लेकिन वन्यजीव जगत में उसे माया के नाम से जाना जाता है. उसके कंधे पर M अक्षर जैसा निशान है, इसीलिए उसका नाम माया पड़ा.

वन्यजीव फिल्म निर्माता ऐश्वर्या श्रीधर ने छह साल में बनी फिल्म “टाइगर क्वीन ऑफ तारू” में इस बाघिन के जीवन को दर्शाया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उन्होंने कहा, जब मैंने माया को पहली बार देखा था तब ये 15 साल की थी. वह एक शावक थी जिसने अपनी मां को खो दिया था और अपने दो भाई-बहनों से अलग हो गई थी. समय के साथ, मैंने उसे जंगल में बढ़ते और खुद का ख्याल रखते हुए देखा है. वह निडर, आकर्षक और पर्यटकों के प्रति मित्रतापूर्ण व्यवहार करती है. मछली के बाद, वह सबसे लोकप्रिय बाघिन है.

Matkasur Of Tadoba National Park Maharashtra

मटकासुर.

शराब की कहानी से नाम मिला नाम मटकासुर

ताडोबा में मटकासुर नाम का एक प्रसिद्ध बाघ भी है, इसे मदकासुर भी कहते है. इसका नाम जंगल के उस इलाके के नाम पर रखा गया है जहां उसे पहली बार देखा गया था. जंगल में नियमित रूप से आने वाले लोग दावा करते हैं कि आदिवासी शराब बनाते थे और उसे मटकों में भरकर रखते थे. यह मिथक फैलाते थे कि उस जगह पर एक आत्मा आती है जो उनसे शराब पीती है. यह लोगों को डराने और अधिकारियों को उनके द्वारा बनाई जा रही अवैध शराब से दूर रखने के लिए किया जाता था. उस आत्मा को मटकासुर कहा जाता था और उस क्षेत्र के प्रमुख बाघ का नाम उसी के नाम पर रखा गया था.

Munna Tiger

मुन्ना जो टी-17 नाम से भी जाना गया.

मध्य प्रदेश का मुन्ना

मध्य प्रदेश के कान्हा में टी-17 नाम के एक बाघ को देखने के लिए भीड़ जुटती थी, जिसकी धारियां बहुत मशहूर थीं. उसके माथे पर बनी अनोखी धारियों से ‘CAT’ शब्द बनता था. पार्क के किसली क्षेत्र में राज करने वाले इस बाघ को प्यार से मुन्ना कहा जाता था. उसके नामकरण की कहानी भी दिल को छू लेने वाली है.

मुन्ना दूसरे बाघ के साथ क्षेत्रीय संघर्ष में घायल हो गया था और गाइड्स ने उसे ठीक से न चल पाते हुए हुए देखा था. इससे उन्हें अपने एक साथी की याद आ गई, जिसे पोलियो हो गया था और वह भी वैसे चलता था. इसके बाद टी-17 का नाम बदलकर मुन्ना रख दिया गया, जो नाम उसके साथ हमेशा के लिए जुड़ गया. वह लगभग 21 साल तक जीवित रहा, लेकिन उसके हाथ-पैर लकवाग्रस्त होने के बाद वह चल-फिर नहीं सकता था। अक्टूबर 2019 में उसे वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में स्थानांतरित कर दिया गया और एक साल बाद पशु चिकित्सा कर्मचारियों की देखरेख में उसकी मृत्यु हो गई. उसके बेटे का नाम छोटा मुन्ना है.

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अंकित गुप्ता

अंकित गुप्ता

नवाबों के शहर लखनऊ में जन्‍मा. डीएवी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से MBA. लिखने की चाहत और खबरों से आगे की कहानी जानने का जुनून पत्रकारिता में लाया. 2008 में लखनऊ के पहले हिन्‍दी टेबलॉयड ‘लखनऊ लीड’ से करियर से शुरुआत की. फीचर सेक्‍शन में हाथ आजमाया. फ‍िर बाबा गोरखनाथ के नगरी गोरखपुर से दैनिक जागरण के आइनेक्‍स्‍ट से जुड़ा. शहर की खबरों और हेल्‍थ मैगजीन में रिपोर्टिंग के लिए 2013 में राजस्‍थान पत्र‍िका के जयपुर हेडऑफ‍िस से जुड़ा. यहां करीब 5 साल बिताने के बाद डिजिटल की दुनिया में नई शुरुआत के लिए 2018 में दैनिक भास्‍कर के भोपाल हेड ऑफ‍िस पहुंचा. रिसर्च, एक्‍सप्‍लेनर, डाटा स्‍टोरी और इंफोग्राफ‍िक पर पकड़ बनाई. हेल्‍थ और साइंस की जटिल से जटिल खबरों को आसान शब्‍दों में समझाया. 2021 में दैनिक भास्‍कर को अलविदा कहकर TV9 ग्रुप के डिजिटल विंग से जुड़ा. फ‍िलहाल TV9 में रहते हुए बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर ‘नॉलेज’ सेक्‍शन की कमान संभाल रहा हूं. एक्‍सप्‍लेनर, डाटा और रिसर्च स्‍टोरीज पर फोकस भी है और दिलचस्‍पी भी.

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