ODOP और GI Tag ने बदली किस्मत, गोरखपुर का टेराकोटा पहुंचा देश-विदेश

Published on 17 अग॰ 2026

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की मिट्टी से बने हाथी, घोड़े, दीये और सजावटी सामान अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं. टेराकोटा के इन उत्पादों की मांग देश के बड़े शहरों से लेकर विदेशों तक पहुंच चुकी है. कभी पुश्तैनी हुनर के सहारे घर चलाने वाले कई कारीगर आज इसी काम से लाखों रुपये का कारोबार कर रहे हैं. इसमें एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना, GI Tag, प्रशिक्षण और सरकारी मदद ने बड़ी भूमिका निभाई है.

गोरखपुर का टेराकोटा यहां के कुम्हार परिवारों की पुरानी कला है. तालाबों से मिलने वाली खास चिकनी मिट्टी को आकार देकर पहले खिलौने बनाए जाते हैं. फिर उन्हें भट्ठी में पकाया जाता है. इसी प्रक्रिया से हाथी, घोड़े, दीये, मूर्तियां समेत कई तरह के सजावटी सामान तैयार होते हैं.

गोरखपुर के खुटहन खास, लंगड़ी गुलरिया, पादरी बाजार सहित कई इलाकों में बड़ी संख्या में परिवार इस काम से जुड़े हैं. महिलाओं को भी घर से ही इस कारोबार में काम मिलता है. इससे पुश्तैनी कला आगे बढ़ी, परिवारों की कमाई का रास्ता भी मजबूत हुआ.

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Terracotta Business
तालाब की चिकनी मिट्टी से बनाए जा रहे सजावटी खिलौने. (Photo: ITG)

ODOP और GI Tag से मिली नई पहचान

उत्तर प्रदेश की एक जिला एक उत्पाद योजना में गोरखपुर के टेराकोटा को शामिल किया गया. इसके बाद इस पारंपरिक कला को बाजार तक पहुंचाने पर जोर बढ़ा. टेराकोटा को GI Tag मिलने से इसकी पहचान और मजबूत हुई. 

सरकारी योजनाओं के तहत कारीगरों को प्रशिक्षण, टूलकिट जैसी मदद दी गई. प्रशिक्षित लोगों को कारोबार बढ़ाने के लिए सब्सिडी भी उपलब्ध कराई जाती है. इसका असर यह हुआ कि कई कारीगरों ने घर के छोटे काम को बड़े कारोबार में बदल दिया.

मिट्टी के घर से डेढ़ करोड़ के कारोबार तक

गुलरिया इलाके के राजन प्रजापति इसका एक उदाहरण हैं. राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित राजन आज टेराकोटा का बड़ा कारोबार चला रहे हैं. उनकी फैक्ट्री में करीब 25 मजदूर काम करते हैं.

यहां से एक बार में दो ट्रक तक माल बाहर भेजा जाता है. एक ट्रक में करीब 4 से 5 लाख रुपये का सामान जाता है. राजन के मुताबिक साल में करीब 24 ट्रक माल बाहर भेजा जाता है. इससे सालाना कारोबार करीब डेढ़ करोड़ रुपये तक पहुंचता है. कभी मिट्टी के घर में रहने वाले राजन आज पक्के मकान में रहते हैं. उनके कारोबार से दूसरे परिवारों को भी रोजगार मिल रहा है.

Gorakhpur Terracotta
एक साथ काम करते स्थानीय कारीगर. (Photo: ITG)

मुफ्त टूलकिट ने आसान किया काम

गुलरिया के औरंगाबाद गांव के पन्नेलाल प्रजापति का पुश्तैनी काम अब तेजी से बढ़ रहा है. उनके साथ 5 से 7 कारीगर मूर्तियां गढ़ने और पकाने का काम संभालते हैं. पन्नेलाल बताते हैं कि पहले जरूरी औजार नहीं थे. सरकार से मुफ्त टूलकिट मिलने के बाद काम की रफ्तार बढ़ गई. अब वह हर महीने एक ट्रक माल बाहर भेजते हैं, जिससे सालभर में 60 से 70 लाख रुपये का कारोबार हो जाता है. टिन शेड में रहने वाले पन्नेलाल अब पक्के मकान में रहकर अपना बिजनेस चला रहे हैं.

पहले उनका परिवार टिन शेड के मकान में रहता था. अब पक्का घर है. छोटे कारोबार से शुरुआत करने के बाद वह इसे और बड़ा करना चाहते हैं.

छोटे कारीगरों को भी मिला सहारा

औरंगाबाद में हीरालाल प्रजापति करीब 18 साल से टेराकोटा का काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि पहले काम के लिए घर का ही सहारा लेना पड़ता था. अब कारीगरों के लिए अलग कमरे बनाए गए हैं, जहां वे अपना काम कर सकते हैं. उनके मुताबिक, इस काम से महीने में करीब 15 से 16 हजार रुपये तक कमाई हो जाती है. सालाना आमदनी करीब 4 लाख रुपये तक पहुंचती है. गांव में करीब 12 दुकानें हैं, जहां 60 से 70 लोग काम कर रहे हैं. यहां तैयार सामान ट्रकों के जरिए दूसरे शहरों में भेजा जाता है. 

सरकार का फोकस बाजार से जोड़ने पर

उद्योग आयुक्त उज्जवल सिंह के मुताबिक गोरखपुर के टेराकोटा को ODOP के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है. उनका कहना है कि यह पुरानी कला है, इसलिए इससे जुड़े कारीगरों को आगे बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके तहत प्रशिक्षण लेने वालों को मुफ्त टूलकिट दी जाती है. इसके अलावा, जरूरत के मुताबिक सब्सिडी भी उपलब्ध कराई जाती है. सरकार का लक्ष्य कारीगरों को सिर्फ प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि उनके सामान को बड़े बाजार तक पहुंचाना है.

Gorakhpur Handicraft
तालाब की चिकनी मिट्टी से बनाए गए सजावटी खिलौने. (Photo: ITG)

गांव की मिट्टी अब बाहर की दुनिया तक

गोरखपुर के टेराकोटा की कहानी सिर्फ मिट्टी से सामान बनाने की नहीं है. यह उस हुनर की कहानी है, जो पीढ़ियों से परिवारों में चला आ रहा था. ODOP, GI Tag, सरकारी मदद और बाजार से जुड़ाव ने इस कला को नई दिशा दी.

आज जिस मिट्टी को कभी गांव की रोजमर्रा की चीजों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, उसी से बने उत्पाद बड़े शहरों तक पहुंच रहे हैं. कई कारीगरों के लिए यह काम अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि रोजगार और कारोबार का मजबूत जरिया बन चुका है.

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