Updated On: Jul 23, 2026 | 08:41 AM IST
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सार
Lathi Satire Column: 'निशानेबाज' के व्यंग्य में लाठी की महिमा पर तीखा कटाक्ष है। मिसाइलों के दौर में लाठी की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए अंत में डकैत और लठैत के फर्क पर चुटीला संदेश दिया गया।

(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
विस्तार
Lathi Importance Satirical Commentary: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, हमें लाठी का महत्व समझाइए।’ हमने कहा, ‘क्या करेंगे हवा में लाठी भांजकर? कोई ठोस काम कीजिए। जमीनी हकीकत और चुनौतियों का सामना कीजिए। मिसाइल के जमाने में लाठी की बात मत कीजिए।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, आप हमारे सवाल का जवाब टाल रहे हैं और लाठी की महिमा बताने से कतरा रहे महिमा बताने से कतरा रहे हैं। कुछ लोग तो अपने बेटे के बारे में सभी को बड़े भरोसे के साथ बताते हैं कि यही तो हमारे बुढ़ापे की लाठी है।’
हमने कहा, ‘आप जवानी या बुढ़ापे के फेर में मत पड़िए, इतना जान लीजिए कि जो डाका डालता है वह डकैत और लाठी चलाता है वह लठैत!’
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पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, सभी की लाठी एक समान नहीं होती। उसमें कुछ फर्क जरूर रहता होगा।’
हमने कहा, ‘बेशक फर्क रहता है। देश को आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी की लाठी अहिंसक थी। उसने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। बापू का प्रतीकात्मक चित्र सिर्फ गोल लेंस वाले चश्मे के फ्रेम और लाठी की आकृति से बनाया जा सकता है। उस लाठी को आप चाहें तो जादू का डंडा मान लें जिसे देखकर अंग्रेज भाग निकले।
दूसरी तरह की लाठी पुलिस के पास होती है हराम जिससे वह निहत्थे प्रदर्शनकारियों, छात्रों यहां तक कि 15-16 साल के बच्चों पर भी निर्ममता से प्रहार करती है। दिल्ली में चली लाठी के बारे में कहा जाता है कि उसमें स्कू और कांटेदार तार भी लगे थे। प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने और तितर-बितर करने के लिए लाठी चलाने का आदेश दिया जाता है। सरकार की मजबूती लाठी के जोर पर कायम रहती है। आपने कहावत सुनी होगी- जिसकी लाठी, उसकी भैंस ! लाठी को लचीली और मजबूत बनाने के लिए उसे सरसों का तेल पिलाया जाता है।’
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पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, बीजेपी नेतृत्व की सरकार को लाठी से इतना लगाव क्यों है? कोई खास वजह है क्या?’
हमने कहा, ‘जिस प्रकार गंगोत्री से गंगा निकली है वैसे ही संघ से बीजेपी उत्पन्न हुई है। आरएसएस के हर स्वयंसेवक के पास लाठी होती है जिसे वह दंड कहता है। वह शाखा में जाकर उसे घुमाने के पैंतरे सीखता है और जब वर्ग शिक्षक बन जाता है तो नए स्वयंसेवकों को इसकी ट्रेनिंग देता है। उसकी संस्कृति में लाठी की बड़ी अहमियत है। वैसे ही सत्ता के संरक्षण में दमनकारी लाठी की कीमत है। एक बात याद रखिए कि अन्याय की भी एक हद होती है। कहावत है-ऊपरवाले की लाठी में आवाज नहीं होती !’
