आज के समय में डिजिटल अकाउंट्स की सुरक्षा केवल पासवर्ड के भरोसे छोड़ना बहुत भारी पड़ सकता है। पासवर्ड में ...और पढ़ें

मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन से सुरक्षित करें अपने डिजिटल अकाउंट्स। Photo- Gemini AI.
ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। मोबाइल बैंकिंग से लेकर ई-कामर्स, UPI, ऑनलाइन इन्वेस्टमेंट तक तेजी और सहजता तो बढ़ी है, लेकिन इससे हर भारतीय के डिजिटल फुटप्रिंट्स का भी विस्तार हुआ है। यही साइबर अपराधों के बढ़ते जोखिम और आए दिन चर्चा में रहने वाली डिजिटल ठगी का कारण भी है। गृह मंत्रालय की मानें तो 2025 में साइबर अपराधों में 24 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जिससे 22,495 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। खास बात है कि देश का कामकाजी, शिक्षित और जागरूक माना जाने वाला वर्ग भी जिस तरह इन स्कैमर्स का शिकार बन रहा है, वह अधिक चिंता पैदा करता है। कल्पना कीजिए कि आप एक सुबह उठते हैं और पता चलता है कि किसी ने आपके ईमेल, इंटरनेट मीडिया या बैंक अकाउंट को एक्सेस कर लिया है। आप इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि आपने एक मजबूत पासवर्ड बनाया हुआ है, उसे कभी किसी के साथ आपने शेयर नहीं किया था। फिर भी, कोई साइबर अपराधी कैसे फिशिंग ईमेल या डाटा सेंधमारी करके आपका पासवर्ड चुराने में कामयाब हो गया, असल सवाल यही है। यह साइबर सुरक्षा की आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। कुल मिलाकर कहें, तो डिजिटल अकाउंट्स को सुरक्षित रखने के लिए अब सिर्फ एक पासवर्ड काफी नहीं है। इसके लिए आपको जागरूकता और सतर्कता के साथ आधुनिक तकनीकी सुरक्षा उपायों पर भी गौर करना होगा।
नए दौर के साइबर सुरक्षा उपाय:
आजकल धोखाधड़ी रियल टाइम में होती है या कहें स्कैम का तरीका हर समय बदलता रहता है। यह इतना तेजी से होता है कि आम लोगों की जागरूकता इसके साथ कदम नहीं मिला पाती। हालांकि, अपनी सुरक्षा की कुछ आदतों को लेकर आपको आश्वस्त होना होगा। इससे आप ऐसा ट्रैप बिछा सकते हैं, जिससे निकलना स्कैमर्स के लिए आसान नहीं होगा। यह उपाय है- मल्टी फैक्टर आथेंटिकेशन। यहां आपकी सुरक्षा केवल एक पासवर्ड तक ही सीमित नहीं रहती। अगर पासवर्ड स्कैमर के पास पहुंच भी जाए, तो अकाउंट में लागइन के लिए उसे पहचान का सत्यापन कराना होगा, जोकि लगभग असंभव चीज है। पुख्ता सुरक्षा सुनिश्चित करने के ऐसे उपायों के चलते ऑनलाइन बैंकिंग से लेकर कारपोरेट नेटवर्क तरह मल्टीफैक्टर आथेंटिकेशन (एमएफए) तकनीक डिजिटल सुरक्षा का एक जरूरी हिस्सा बनती जा रही है। मौजूदा वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ आरबीआइ ने डिजिटल पेमेंट में कम से कम दो इंडिपेंडेंट फैक्टर्स के आथेंटिकेशन को अनिवार्य कर दिया है, यानी कार्ड, वालेट और यूपीआइ पेमेंट के दौरान पिन या ओटीपी के अलावा भी अतिरिक्त आथेंटिकेशन करना होता है।
कैसे काम करता है मल्टी-फैक्टर आथेंटिकेशन?
यह सुरक्षा का तकनीकी तरीका है, जिसमें किसी अकाउंट, सिस्टम या एप्लिकेशन को एक्सेस करने से पहले, यूजर को अपनी पहचान साबित करने के लिए दो या उससे अधिक अलग-अलग तरह के प्रमाण देने होते हैं। पासवर्ड या पिन के साथ-साथ फिंगरप्रिंट या चेहरे की पहचान का सत्यापन करना होता है।
कैसे सुरक्षा देती है यह तकनीक?
मान लें, साइबर क्रिमिनल ने फिशिंग, मालवेयर या डाटाबेस में सेंध के जरिये आपका पासवर्ड चोरी कर लेता है, इससे जब वह आपके अकाउंट में लॉगइन करता है तो पासवर्ड के साथ सिक्योरिटी या बायोमीट्रिक आथेंटिकेशन करना होता है, ऐसा नहीं कर पाने पर एक्सेस स्वतः रद्द हो जाता है। हालांकि, यह सुरक्षा का कोई पूर्ण समाधान नहीं है। यह मजबूत पासवर्ड, साफ्टवेयर अपडेट, एक्सेस कंट्रोल, निगरानी और यूजर की जागरूकता के साथ मिलकर सबसे बेहतर काम करती है।
आथेंटिकेशन और आथराइजेशन को समझें
आथेंटिकेशन यह सत्यापित करता है कि आप कौन हैं। आथराइजेशन यह तय करता है कि आपकी पहचान सत्यापित होने के बाद आपको किन चीजों तक पहुंचने की अनुमति है, जैसे लॉगइन करना आपकी पहचान की पुष्टि करता है, पेरोल रिकार्ड देखने की अनुमति मिलना ऑथराइजेशन है।
मल्टीफैक्टर ऑथेंटिकेशन के आम तरीके
SMS और ईमेल कोडः सिस्टम आपके फोन पर टेक्स्ट मैसेज के जरिये या ईमेल पर एक वन-टाइम कोड भेजता है। लॉगइन पूरा करने के लिए आप अपने पासवर्ड के साथ इस कोड को दर्ज करते हैं। यह एमएफए का सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला तरीका है, लेकिन यह सबसे कम सुरक्षित है, क्योंकि सिम-स्वैपिंग के जरिये एसएमएस संदेशों को बीच में ही रोका जा सकता है और ईमेल अकाउंट्स को भी हैक किया जा सकता है।
आथेंटिकेटर एप्सः माइक्रोसाफ्ट, गूगल आथेंटिकेशन जैसे एप्स समय-आधारित वन-टाइम पासवर्ड जनरेट करते हैं, जो हर 30 से 60 सेकंड में बदलते रहते हैं। चूंकि यह कोड आपके डिवाइस पर ही जनरेट होता है और कभी भी नेटवर्क पर नहीं भेजा जाता, इसलिए एसएमएस कोड की तुलना में आथेंटिकेटर एप्स को हैक करना या बीच में रोकना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।
पुश नोटिफिकेशनः जब आप लागइन करते हैं, तो आपके फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है, जिसमें आपसे एक टैप करके उस अनुरोध को अप्रूव या डिनाई करने के लिए कहा जाता है। यह सुविधाजनक और सुरक्षित उपाय है। आधुनिक सिस्टम में इससे बचने के लिए यूजर को लागइन स्क्रीन पर दिख रहे एक नंबर को नोटिफिकेशन में दर्ज करने के लिए कहा जाता है, ताकि दोनों का मिलान हो सके।
पासकी: यह आथेंटिकेशन के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव है। पासकी, पब्लिक-की क्रिप्टोग्राफी का इस्तेमाल करके पासवर्ड की जगह ले लेती है। आपका डिवाइस एक 'प्राइवेट की' को स्टोर करता है (जो बायोमेट्रिक्स या इसी तरह के किसी सिस्टम के जरिये पिन से सुरक्षित होती है) और वेबसाइट केवल 'पब्लिक की' को स्टोर करती है। इसमें न तो कोई पासवर्ड होता है जिसे फिशिंग के जरिये चुराया जा सके, न ही कोई ऐसा कोड जिसे बीच में रोका जा सके और न ही कोई ऐसा क्रेडेंशियल होता है जिसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।
ऐसे मजबूत करें अकाउंट की सुरक्षा
- महत्वपूर्ण अकाउंट्स, खासकर ईमेल और एडमिनिस्ट्रेटर अकाउंट्स पर मल्टी-फैक्टर आथेंटिकेशन इनेबल करना चाहिए।
- जहां तक संभव हो, फिशिंग रोकने वाले आथेंटिकेशन (जैसे पासकी आदि) का इस्तेमाल करना चाहिए।
- कभी भी किसी अनजान लॉगइन प्रांप्ट को अप्रूव नहीं करना चाहिए और न ही किसी के साथ वेरिफिकेशन कोड को साझा करना चाहिए।
- हर अकाउंट के लिए अलग पासवर्ड रखना और पासवर्ड मैनेजर का इस्तेमाल करना बेहतर उपाय है।
- अपने अकाउंट सेशन की जांच करते रहना चाहिए। खोए हुए या अनजान डिवाइस से अकाउंट का एक्सेस हटा देना चाहिए।
- रिकवरी के वैकल्पिक तरीके भी रखना चाहिए, ताकि डिवाइस खो जाने पर आपका अकाउंट हमेशा के लिए लॉक न हो जाए।