IGIMS में बच्चों के आंखों के कैंसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी: रेटिनोब्लास्टोमा की समय पर पहचान पर जोर, 100 से अधिक विशेषज्ञ हुए शामिल; 'हैसल-फ्री' चिकित्सा का संकल्प - Patna News

Published on 26 जुल॰ 2026

पटना4 घंटे पहले

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पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में बच्चों के आंखों के कैंसर रेटिनोब्लास्टोमा पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और वैज्ञानिक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य रेटिनोब्लास्टोमा की समय पर पहचान, बेहतर इलाज और मरीजों को घर के पास गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराना है।

यह कार्यक्रम क्षेत्रीय चक्षु संस्थान (RIO), स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) और बच्चों के कैंसर के क्षेत्र में कार्यरत संस्था CANKID द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया।

संगोष्ठी में IGIMS, एम्स पटना सहित विभिन्न चिकित्सा संस्थानों के 100 से अधिक चिकित्सकों, विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्यकर्मियों ने भाग लिया। CANKID की पूरी टीम भी इसमें मौजूद रही।

कार्यक्रम का उद्घाटन राज्यसभा सांसद धर्मशीला गुप्ता ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, ‘बच्चों के कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे परिवारों के लिए कार्य कर रही संस्थाओं का योगदान अत्यंत सराहनीय है।’ उन्होंने ऐसे बच्चों और इस दिशा में कार्यरत संस्थाओं को हरसंभव सहयोग देने का संकल्प व्यक्त किया।

राज्यसभा सांसद धर्मशीला गुप्ता ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

राज्यसभा सांसद धर्मशीला गुप्ता ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

रेटिनोब्लास्टोमा कैंसर की जल्द पहचान बड़ी चुनौती- पूनम बगाई

CANKID की चेयरपर्सन पूनम बगाई ने बिहार में बच्चों के कैंसर उपचार की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया, ‘राज्य में उपचार सुविधाओं में सुधार हुआ है, लेकिन रेटिनोब्लास्टोमा जैसे कैंसर की जल्द पहचान अब भी एक बड़ी चुनौती है। समय पर पहचान से बच्चों का इलाज शुरू हो सकेगा और उन्हें अपने घर के आसपास बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकेंगी।’

बगाई ने यह भी बताया, 'CANKID केवल आर्थिक सहायता ही नहीं देता, बल्कि इलाज के दौरान बच्चों और उनके परिवारों को मानसिक और सामाजिक सहयोग भी प्रदान करता है। संस्था दवाओं, जांच, रहने की व्यवस्था और उपचार के दौरान आने वाली अन्य कठिनाइयों में भी परिवारों की लगातार मदद करती है।

इस अवसर पर CANKID की ओर से डॉ. शोभा और डॉ. हरीश ने भी बच्चों के कैंसर से जुड़े अनुभव और संस्था की कार्यप्रणाली साझा की।

बच्चों के कैंसर उपचार के पर IGIMS में काम जारी

IGIMS के निदेशक प्रो. (डॉ.) बिंदे कुमार ने अपने संबोधन में संस्थान में बच्चों के कैंसर उपचार के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों और भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्थान लगातार आधुनिक सुविधाओं का विस्तार कर रहा है, ताकि मरीजों को राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता न पड़े। डीन अकादमिक डॉ. ओम कुमार, स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के प्रमुख डॉ. राजेश कुमार सहित अन्य विशेषज्ञों ने भी बच्चों के कैंसर की रोकथाम, समय पर पहचान और समन्वित उपचार व्यवस्था पर अपने विचार रखे।

सेमिनार में IGIMS, AIIMS पटना सहित कई चिकित्सा संस्थानों के 100 से अधिक चिकित्सक, विशेषज्ञ, शोधकर्ता और स्वास्थ्यकर्मी शामिल हुए।

सेमिनार में IGIMS, AIIMS पटना सहित कई चिकित्सा संस्थानों के 100 से अधिक चिकित्सक, विशेषज्ञ, शोधकर्ता और स्वास्थ्यकर्मी शामिल हुए।

मरीज को 'हैसल-फ्री' इलाज देने का संकल्प

IGIMS के उपनिदेशक एवं क्षेत्रीय चक्षु संस्थान के प्रमुख डॉ. विभूति प्रसन्ना सिन्हा ने किया। उन्होंने राज्य सरकार को आधुनिक क्षेत्रीय चक्षु संस्थान की स्थापना के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि संस्थान का लक्ष्य है कि यहां आने वाले मरीजों को वे सभी अत्याधुनिक सुविधाएं मिलें, जिनके लिए पहले उन्हें राज्य से बाहर जाना पड़ता था।

उन्होंने चिकित्सकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के दौरान होने वाली छोटी-छोटी परेशानियों को दूर करने तथा पूरी उपचार प्रक्रिया को "हैसल-फ्री" बनाने की दिशा में सभी को मिलकर कार्य करना होगा।

बिहार में हर साल सामने आते हैं 50 से 60 नए मरीज

विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया भर में हर वर्ष रेटिनोब्लास्टोमा के लगभग 7,000 से 8,000 नए मामले सामने आते हैं। इनमें भारत में लगभग 1,500 से 2,000 मामले दर्ज होते हैं, जो वैश्विक मामलों का लगभग 25 प्रतिशत हैं।

हालांकि, बिहार में इस बीमारी के स्पष्ट सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय नेत्र विज्ञान संस्थान (RIO), IGIMS, पटना में प्रतिवर्ष लगभग 50 से 60 नए मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। इन सभी बच्चों का इलाज संस्थान में पूरी तरह निःशुल्क किया जाता है।

कुछ वर्ष पहले यहां प्रतिवर्ष लगभग 30 मरीज ही आते थे, जबकि अब संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह लोगों में बढ़ी जागरूकता और बेहतर पहचान का परिणाम है।

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