ICAR वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि, रोग प्रतिरोधी और जलवायु अनुकूल अरहर की किस्में विकसित करने में मिलेगी मदद

Published on 17 अग॰ 2026

ICAR वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि, रोग प्रतिरोधी और जलवायु अनुकूल अरहर की किस्में विकसित करने में मिलेगी मदद

17 अगस्त 2026, नई दिल्ली: ICAR वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि, रोग प्रतिरोधी और जलवायु अनुकूल अरहर की किस्में विकसित करने में मिलेगी मदद – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने अरहर यानी तूर का देश का पहला T2T (Telomere-to-Telomere) जीनोम तैयार करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। कृषि वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि दलहन क्षेत्र में नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस जीनोम की मदद से भविष्य में अधिक उत्पादन देने वाली, रोग प्रतिरोधी और बदलती जलवायु परिस्थितियों को सहन करने वाली अरहर की नई किस्में विकसित करना आसान होगा।

क्या है T2T जीनोम?

T2T जीनोम का अर्थ Telomere-to-Telomere है। इसमें किसी जीव के जीनोम को उसके एक सिरे से दूसरे सिरे तक अधिक संपूर्ण और विस्तृत रूप में समझने का प्रयास किया जाता है। इससे वैज्ञानिकों को फसल के उन आनुवंशिक हिस्सों की भी जानकारी मिल सकती है, जिन्हें पुराने जीनोम अनुक्रमण में पूरी तरह समझना मुश्किल था।

अरहर के T2T जीनोम के तैयार होने से वैज्ञानिकों को फसल के विभिन्न गुणों से जुड़े जीन की पहचान और उनके अध्ययन में मदद मिलेगी। इससे बेहतर किस्मों के विकास की प्रक्रिया को अधिक सटीक बनाया जा सकेगा।

उत्पादन बढ़ाने में मिलेगी मदद

अरहर भारत की प्रमुख दलहन फसलों में शामिल है। देश में इसकी मांग लगातार बनी रहती है। ऐसे में नई वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग ऐसी किस्में विकसित करने में किया जा सकता है, जिनमें अधिक उत्पादन क्षमता के साथ रोगों और प्रतिकूल मौसम का सामना करने की क्षमता हो।

विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान, वर्षा और सूखे की परिस्थितियों में बदलाव हो रहा है। ऐसे समय में जलवायु के अनुरूप फसल किस्मों का विकास कृषि की बड़ी जरूरत है। अरहर का T2T जीनोम इस दिशा में वैज्ञानिकों को नया आधार उपलब्ध करा सकता है।

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में अहम कदम

नई किस्मों के विकास से यदि प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ता है और फसल को रोग या मौसम से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके, तो इसका सीधा लाभ किसानों को मिल सकता है। साथ ही देश में दलहन उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।

यह उपलब्धि आत्मनिर्भर दलहन उत्पादन की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वैज्ञानिक इस आनुवंशिक जानकारी का उपयोग भविष्य में बेहतर अरहर किस्मों के विकास, प्रजनन कार्यक्रमों और फसल सुधार में कर सकेंगे।

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