IBC से रुकी हाउसिंग परियोजनाओं को नई रफ्तार, 1.4 लाख होमबायर्स को मिलेगी राहत

Published on 25 सित॰ 2026

By Oneindia Staff

Time Published: Friday, September 25, 2026, 20:34 [IST]

देश में लंबे समय से अटकी आवासीय परियोजनाओं में फंसे घर खरीदारों के लिए इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) एक अहम रास्ता बनकर उभरा है। आर्थिक रूप से मजबूत डेवलपर्स के संकटग्रस्त प्रोजेक्ट्स का अधिग्रहण करने से कई अधूरी परियोजनाओं में दोबारा निर्माण शुरू हुआ है। अनुमान के मुताबिक, 1.4 लाख से ज्यादा होमबायर्स अब अपने घर का कब्जा मिलने के करीब हैं।

इस प्रक्रिया में खास बात यह है कि अब केवल कंपनी के कर्ज का निपटारा करने के बजाय प्रोजेक्ट पूरा कर घर खरीदारों को फ्लैट सौंपने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। कितने होमबायर्स IBC प्रक्रिया में फंसे? उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, अब तक IBC के तहत 553 रियल एस्टेट मामलों को स्वीकार किया गया है। इनसे करीब 25 लाख घर खरीदार जुड़े हुए हैं। हालांकि, इनमें से अब तक करीब 17% मामलों का ही समाधान हो पाया है। लगभग 221 मामलों में 11 लाख होमबायर्स अभी भी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। जिन परियोजनाओं का समाधान हो चुका है, उनमें करीब 84 हजार करोड़ रुपए का निवेश शामिल है। वहीं लगभग 65 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाएं अभी समाधान की प्रक्रिया में हैं।

IBC Revives Stalled Housing Projects

2018 में बदला था नियम, घर खरीदार बने वित्तीय लेनदार

IBC के तहत रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ा बदलाव 2018 में आया। तब घर खरीदारों को वित्तीय लेनदार यानी Financial Creditors का दर्जा दिया गया। इस बदलाव के बाद डिफॉल्ट करने वाली रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ IBC प्रक्रिया में घर खरीदारों की भूमिका मजबूत हुई। इससे अटकी परियोजनाओं को दिवालिया प्रक्रिया के जरिए पूरा कराने का रास्ता खुला।

अब प्रोजेक्ट बचाने पर ज्यादा जोर

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड यानी IBBI ने हाल में ऐसे सुधारों का प्रस्ताव रखा है, जिनका उद्देश्य कंपनियों को सीधे परिसमापन यानी Liquidation में भेजने के बजाय अटकी परियोजनाओं को पूरा कराना है। प्रस्तावित सुधारों में शामिल हैं...

  • प्रोजेक्ट के हिसाब से अलग दिवालिया प्रक्रिया
  • परियोजना की नकदी का सुरक्षित इस्तेमाल
  • दावों की प्रक्रिया को आसान बनाना
  • RERA और NCLT के बीच बेहतर तालमेल
  • प्रोजेक्ट पूरा करने को प्राथमिकता

विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में मुकदमेबाजी और बार-बार होने वाली अपीलों से प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। NCLT से समाधान योजना को मंजूरी मिलने और जमीन पर निर्माण शुरू होने के बीच भी काफी समय लग सकता है। इस दौरान निर्माण और फाइनेंसिंग की लागत बढ़ती रहती है, जबकि कई मामलों में घर खरीदारों के साथ पुरानी कीमतों पर ही डिलीवरी की प्रतिबद्धता रहती है।

बड़े डेवलपर्स क्यों बन रहे हैं संकटग्रस्त प्रोजेक्ट्स का सहारा?

IBC प्रक्रिया के जरिए अब बड़ी और पूंजी संपन्न रियल एस्टेट कंपनियां अटकी परियोजनाओं को खरीदकर उन्हें पूरा करने की कोशिश कर रही हैं। अदाणी रियल्टी, लोढ़ा समेत कई बड़े डेवलपर्स ने ऐसे प्रोजेक्ट्स में रुचि दिखाई है। इन कंपनियों के आने से उन परियोजनाओं को नई पूंजी, निर्माण क्षमता और मैनेजमेंट सपोर्ट मिल रहा है, जहां मूल डेवलपर आर्थिक संकट में फंस चुका था।

केस स्टडी: BKC का टेक टेन BKC

मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स यानी BKC की टेक टेन BKC परियोजना इसका एक उदाहरण है। यह प्रोजेक्ट 2020 से अटका हुआ था। परियोजना में MHADA के 176 मूल परिवारों के अलावा बड़ी संख्या में अन्य खरीदार भी फंसे हुए थे। NCLT प्रक्रिया के जरिए समाधान के बाद अदाणी रियल्टी ने परियोजना को संभाला। कंपनी ने प्रोजेक्ट में 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया। इसमें 400 करोड़ रुपए से अधिक की नई पूंजी शामिल थी। निर्माण के लिए करीब 1,200 करोड़ रुपए की फाइनेंसिंग की व्यवस्था भी की गई। इसके बाद अब तक 903 खरीदारों को तैयार घर सौंपे जा चुके हैं।

BKC की भारत नगर SRA परियोजना भी दोबारा शुरू

BKC में ही HDIL के दिवालिया होने के बाद भारत नगर स्लम रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट भी लंबे समय तक अटका रहा था। अदाणी रियल्टी ने बाद में इस परियोजना की जिम्मेदारी संभाली। अब निर्माण दोबारा शुरू हो गया है और करीब 1,000 परिवारों के लिए पुनर्वास आवास तैयार किए जा रहे हैं।

गुरुग्राम में भी अटकी परियोजनाओं को मिली रफ्तार

NCR में भी IBC के जरिए कई परियोजनाओं को दोबारा शुरू किया गया है। Hills-77 परियोजना के समाधान के बाद 724 घर खरीदारों को उनके घरों का कब्जा मिल सका। वहीं Center Court परियोजना में करीब 1,250 करोड़ रुपए के दावे थे। मूल डेवलपर के डिफॉल्ट के बाद समाधान प्रक्रिया से गुजरने पर परियोजना को ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट मिला और 300 से ज्यादा खरीदारों को फायदा हुआ।

एक्सपर्ट बोले- रियल एस्टेट का मामला दूसरे सेक्टर से ज्यादा जटिल

CBRE India के लैंड एंड कैपिटल मार्केट्स के MD निखिल भाटिया के मुताबिक, रियल एस्टेट से जुड़े IBC मामलों का समाधान दूसरे सेक्टरों की तुलना में धीमा रहता है। इसकी वजह परियोजनाओं की लंबी अवधि और कई पक्षों का शामिल होना है। एक ही प्रोजेक्ट में घर खरीदार, बैंक-लेंडर, जमीन के मालिक और डेवलपर जैसे कई हितधारक होते हैं। उनके मुताबिक, हाल के वर्षों में अंतिम खरीदारों की मांग और प्रॉपर्टी की कीमतों में मजबूती से कुछ अटकी परियोजनाओं को दोबारा पूरा करना आर्थिक रूप से व्यवहार्य हुआ है।

IBC मामलों में रियल एस्टेट की बड़ी हिस्सेदारी

नाइट फ्रैंक के इंटरनेशनल पार्टनर और सीनियर एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर गुलाम जिया के अनुसार, सभी CIRP आवेदनों में रियल एस्टेट की हिस्सेदारी करीब 22% है। सेक्टर के लिहाज से यह दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। उनके मुताबिक, समाधान योजनाओं से औसतन संपत्ति के आकलित उचित मूल्य का करीब 95% हासिल हुआ है। उन्होंने कहा कि अदाणी, रिलायंस, JSW और प्रेस्टीज जैसे बड़े डेवलपर्स IBC के जरिए संकटग्रस्त प्लेटफॉर्म और परियोजनाओं का अधिग्रहण कर रहे हैं। इससे उन्हें जमीन और विकास क्षमता मिलती है, जबकि परियोजना को पूरा करने के लिए जरूरी पूंजी और विशेषज्ञता भी उपलब्ध होती है।

घर खरीदारों के लिए इसका क्या मतलब?

IBC की प्रक्रिया हर अटकी परियोजना को तुरंत पूरा करने की गारंटी नहीं देती। कानूनी विवाद, फंडिंग, जमीन से जुड़े मुद्दे और निर्माण लागत जैसी चुनौतियां अब भी बनी रहती हैं। लेकिन जहां किसी मजबूत डेवलपर को परियोजना संभालने का मौका मिलता है, वहां नई पूंजी और निर्माण क्षमता के कारण वर्षों से अटके प्रोजेक्ट को पूरा करने की संभावना बढ़ सकती है।

रियल एस्टेट विशेषज्ञ विशाल भार्गव के मुताबिक, NCLT प्रक्रिया ने अटकी परियोजनाओं में फंसे खरीदारों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता बनाया है। उनका कहना है कि कोई भी समाधान योजना पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं होती, लेकिन बड़े डेवलपर्स के किसी प्रोजेक्ट को संभालने से निर्माण और डिलीवरी को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

IBC का दायरा सिर्फ घरों तक सीमित नहीं

IBC के जरिए संकटग्रस्त संपत्तियों का अधिग्रहण केवल आवासीय परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। कमर्शियल रियल एस्टेट में भी इसका इस्तेमाल हुआ है। मुंबई में ओबेरॉय रियल्टी और एक कंसोर्टियम ने होटल होराइजन का अधिग्रहण किया है। वहीं मैक्रोटेक डेवलपर्स ने वी होटल्स को हासिल करने के लिए IBC प्रक्रिया का इस्तेमाल किया।