Hybrid Family: क्या भारत में बदल रही है परिवार की परिभाषा? एक्सपर्ट्स से जानें खुशहाल रिश्तों का नया फॉर्मूला

Published on 14 जुल॰ 2026

लाइफस्टाइल

  • Authored by: गुलशन कुमार
  • Updated Jul 14, 2026, 07:48 PM IST

Hybrid Family: भारत में परिवार की परिभाषा तेजी से बदल रही है। संयुक्त और न्यूक्लियर फैमिली की बहस के बीच अब 'हाइब्रिड फैमिली' मॉडल उभर रहा है। एक्सपर्ट्स के नजरिए से जानते हैं खुशहाल परिवार का असली फॉर्मूला क्या है।

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नए दौर में परिवार की नई परिभाषा

Hybrid Family: रविवार की सुबह है और बेंगलुरु में रहने वाला आईटी इंजीनियर रोहन (बदला हुआ नाम) अपनी छह साल की बेटी के साथ वीडियो कॉल पर दादी से बात कर रहा है। दादी लखनऊ में हैं, चाचा जयपुर में और बड़ी बुआ भोपाल में हैं। त्योहारों पर पूरा परिवार एक छत के नीचे जुटता है, लेकिन बाकी साल सब अपने-अपने शहरों में रहते हैं। हालांकि किसी की तबीयत खराब हो जाए या कोई बड़ा फैसला लेना हो, पूरा परिवार एक साथ खड़ा नजर आता है।

यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस नए भारत की है जहां परिवार का मतलब अब सिर्फ एक ही घर में रहना नहीं, बल्कि दूरी के बावजूद जुड़े रहना है। कई सालों तक यह सवाल पूछा जाता रहा कि संयुक्त परिवार बेहतर है या न्यूक्लियर फैमिली? लेकिन समाजशास्त्रियों का मानना है कि अब यह बहस धीरे-धीरे पुरानी पड़ रही है। आज भारतीय परिवार एक तीसरे मॉडल (Indian Family System) की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे 'हाइब्रिड फैमिली मॉडल' कहा जाता है। तो चलिए एक्सपर्ट्स के नजरिए से जानते हैं क्या है फैमिली का ये नया फॉर्मूला....

बदल रही परिवार की परिभाषा

एक समय था जब खेती-किसानी और पारिवारिक कारोबार के कारण संयुक्त परिवार भारतीय समाज की सबसे मजबूत इकाई माने जाते थे। लेकिन शिक्षा, नौकरी, शहरीकरण और वैश्विक अवसरों ने परिवारों की संरचना बदल दी।

समाजशास्त्र की प्रोफेसर डॉ. पूनम सिंह के अनुसार, आज लाखों युवा नौकरी के लिए अपने शहर से दूर रहते हैं। ऐसे में न्यूक्लियर फैमिली उनकी जरूरत बन गई है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि लोगों के दिल से संयुक्त परिवार की भावना खत्म हो गई है। भले ही अब परिवार साथ कम रहता है, लेकिन पहले से कहीं ज्यादा जुड़े रहने की कोशिश लगातार रहती है।

क्या है 'हाइब्रिड फैमिली मॉडल'?

एक्स्पर्ट्स के अनुसार यह ऐसा पारिवारिक मॉडल है जिसमें सदस्य अलग-अलग शहरों या घरों में रहते हैं, लेकिन भावनात्मक, आर्थिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। इस मॉडल की कुछ खास बातें हैं-

क्या सचमुच संयुक्त परिवार ही सबसे बेहतर है?

यह सवाल जितना आसान लगता है, जवाब उतना नहीं है। अगर संयुक्त परिवार में हर दिन तनाव, हस्तक्षेप और विवाद हो तो वही व्यवस्था मानसिक दबाव का कारण बन सकती है। दूसरी ओर अगर न्यूक्लियर फैमिली में पति-पत्नी जिम्मेदारियां साझा करते हैं, बच्चों को समय देते हैं और बुजुर्गों से जुड़े रहते हैं, तो वह भी खुशहाल परिवार हो सकता है। यानी परिवार की सफलता उसके आकार से नहीं, उसके रिश्तों की गुणवत्ता से तय होती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर क्या है विज्ञान का नजरिया

यथार्थ अस्पताल, नोएडा के मनोचिकित्सक डॉ. सामंत दर्शी के अनुसार, बच्चों और वयस्कों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे जरूरी चीज भावनात्मक सुरक्षा और खुला संवाद है। ऐसे में बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी बात सुनी जाती है। बुजुर्गों को सम्मान और सामाजिक जुड़ाव की जरूरत होती है।पति-पत्नी के बीच सहयोग मानसिक तनाव कम करता है। परिवार में आलोचना से ज्यादा संवाद होना चाहिए। यदि ये बातें मौजूद हैं तो संयुक्त और न्यूक्लियर दोनों तरह के परिवार स्वस्थ वातावरण दे सकते हैं।

बदल चुकी है परिवार की बहस

आज का भारत Either-Or यानी 'या तो संयुक्त, या न्यूक्लियर' वाली सोच से आगे बढ़ चुका है। नई पीढ़ी स्वतंत्रता चाहती है, लेकिन अपने रिश्ते भी नहीं खोना चाहती। यही कारण है कि अब ऐसे परिवार तेजी से बढ़ रहे हैं जहां- माता-पिता अलग शहर में हैं, बच्चे नौकरी के कारण दूसरे महानगर में, लेकिन परिवार का हर बड़ा फैसला मिलकर लिया जाता है। डिजिटल तकनीक ने इस बदलाव को और आसान बना दिया है।

दो परिवार, दो तस्वीरें

पहली तस्वीर

दिल्ली में रहने वाला एक कामकाजी दंपती सुबह बच्चे को डे-केयर छोड़कर ऑफिस जाता है। शाम को वीडियो कॉल पर बच्चा दादा-दादी से कहानी सुनता है। गर्मियों की छुट्टियां उनके साथ बिताता है। तकनीकी रूप से यह न्यूक्लियर फैमिली है, लेकिन भावनात्मक रूप से यह संयुक्त परिवार जैसा ही है।

दूसरी तस्वीर

एक बड़े संयुक्त परिवार में रोज घरेलू विवाद, निर्णयों को लेकर टकराव और निजी जीवन में लगातार हस्तक्षेप होता है। बच्चे तनावपूर्ण माहौल में बड़े होते हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि सिर्फ साथ रहना ही खुशहाल परिवार की गारंटी नहीं है।

किसके लिए कौन-सा मॉडल ज्यादा उपयुक्त है?

हर परिवार की जरूरत अलग होती है। बार-बार ट्रांसफर वाली नौकरी करने वालों के लिए न्यूक्लियर मॉडल अधिक व्यावहारिक हो सकता है। छोटे बच्चों वाले परिवारों को दादा-दादी का सहयोग राहत दे सकता है। बुजुर्ग माता-पिता वाले परिवारों में हाइब्रिड मॉडल संतुलित विकल्प बन सकता है। कामकाजी दंपतियों के लिए जिम्मेदारियों का साझा होना मानसिक दबाव कम कर सकता है। यानी कोई एक मॉडल सभी पर लागू नहीं होता।

कैसा होगा भविष्य का भारतीय परिवार

एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय परिवार पूरी तरह संयुक्त या पूरी तरह न्यूक्लियर नहीं होंगे, बल्कि दोनों का संतुलित रूप अधिक दिखाई देगा। जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता होगी, वहीं जरूरत पड़ने पर परिवार एक मजबूत सुरक्षा कवच की तरह मौजूद रहेगा।

gulshan kumar

गुलशन कुमार author

गुलशन कुमार टाइम्स नाउ हिंदी डिजिटल के हेल्थ सेक्शन से जुड़े हैं। फिटनेस और योग के प्रति उनकी रुचि उन्हें हेल्थ जर्नलिज्म की ओर लेकर आई, जहां वे आम लो... और देखें

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