Halshashthi 2026 Date Tithi Puja Vidhi Katha: भादौं का महीना 29 अगस्त शनिवार से शुरू हो गया है। इसी के साथ भाद्रपद के त्योहार शुरू हो जाएंगे। इस महीने के त्योहारों में हल षष्ठी (Halshashthi Vrat 2026) , जन्माष्टमी (Janamashtmi 2026) आएंगे। ऐसे में यदि आप भी हलषष्ठी का व्रत रखती हैं और आप इसे लेकर कंफ्यूज हैं कि ये व्रत कब रखा जाएगा तो जानते हैं ज्योतिषाचार्य से।
कब आ रही है भादौ के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि
हिन्दू पंचांग (Hindu Panchang) के अनुसार भादो के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हल षष्ठी व्रत रखा जाता है। इस बार षष्ठी तिथि (Harchhat kab hai) 1 सितंबर को सुबह 8:42 पर शुरू हो जाएगी। जो 2 सितंबर की 06:55 मिनट तक रहेगी।
कब है हलषष्ठी व्रत (Halshashthi)
ज्योतिषाचार्य पंडित रामगोविंद शास्त्री के अनुसार चातुर्मास (Chaturmass 2026) के जो भी व्रत होते हैं वे मध्यान्ह व्यापनी कहलाते हैं। यानी ये सभी व्रत दोपहर में किए जाते हैं। चूंकि षष्ठी तिथि सूर्योदय के हिसाब से 2 सितंबर को आएगी। इसलिए उदया तिथि के अनुसार ये व्रत 2 सितंबर को ही रखा जाएगा। ऐसे में यदि आप भी इस व्रत को करने वाले हैं तो इसे 2 सितंबर दिन बुधवार को रखा जाएगा।
षष्ठी तिथि (Halshashthi Tithi 2026)
षष्ठी तिथि का प्रारंभ: 1 सितंबर को सुबह दोपहर 8:42 बजे से
षष्ठी तिथि की समाप्ति: 1 सितंबर को सुबह 06:55 मिनट तक
क्यों रखा जाता है हल षष्ठी का व्रत
हिन्दू धर्म में जिन दंपतियों के जीवन में संतान सुख नहीं होता है उनके लिए ये व्रत मनोकमना पूर्ति वाला व्रत माना जाता है। हिन्दू धर्म ग्रंथ (Hindu Dharam Granth) के अनुसार इस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
हल षष्ठी व्रत का महत्व (Hal Shashti 2026 significance)
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि हल षष्ठी व्रत (Halshashthi 2027 Date in Hindi) रखने से जीवन की सभी दुख-बाधाएं दूर होती हैं और बलराम जी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
हलषष्ठी व्रत कथा (Hal Shashthi Vrat Katha)
प्राचीनकाल में एक छोटे से गाँव में एक ग्वालिन रहती थी। उसका प्रसव काल (बच्चे के जन्म का समय) निकट था। प्रसव पीड़ा से व्याकुल होने के बावजूद उसका मन दूध और दही बेचने में लगा रहा। उसने सोचा कि यदि बच्चा पहले हो गया, तो उसका दूध-दही ऐसे ही रखा रह जाएगा। यह लालच मन में रखकर वह सिर पर दूध-दही का घड़ा रखकर बेचने निकल पड़ी। रास्ते में उसे असहनीय पीड़ा हुई और उसने पास की एक झरबेरी (झाड़ी) की ओट में एक पुत्र को जन्म दिया। लालच में अंधी होकर वह नवजात शिशु को वहीं छोड़कर गाँव-गाँव दूध बेचने चली गई।संयोग से उस दिन हलषष्ठी थी।
उस ग्वालिन ने गाय और भैंस के मिले-जुले दूध को केवल भैंस का दूध बताकर भोले-भाले ग्रामीणों को बेच दिया। हलषष्ठी के दिन दूध में मिलावट करना, छल करना या असत्य बोलना गौमाता और भगवान बलराम का सीधा अपमान माना जाता है। उसी समय पास के खेत में एक किसान हल चला रहा था। अचानक उसके बैल बिदक गए और हल का फल जाकर उस नवजात बालक के पेट में लग गया, जिससे बालक वहीं अचेत होकर गिर गया और उसकी मृत्यु जैसी स्थिति हो गई। किसान ने दुखी होकर झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के शरीर को ठीक किया और वहीं छोड़कर चला गया।
जब ग्वालिन अपना दूध बेचकर वापस लौटी और बच्चे को मरा हुआ देखा, तो वह बुरी तरह चौंक उठी। उसे तुरंत समझ आ गया कि यह उसके झूठ और पाप का फल है। उसने रोते-बिलखते हुए गाँव की स्त्रियों के सामने अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा माँगी। गाँव की महिलाओं ने जब उसका प्रायश्चित देखा, तो उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।जब ग्वालिन दौड़कर झरबेरी के पास पहुँची, तो उसने देखा कि उसका पुत्र पूरी तरह जीवित और स्वस्थ था। तभी से यह मान्यता बन गई कि हलषष्ठी के दिन सच्चाई, पवित्रता और गौसेवा का पालन करना चाहिए तथा कभी छल या मिलावट नहीं करनी चाहिए।
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