जब भी इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) और पर्यावरण की बात आती है, तो एक सवाल बार-बार सामने आता है कि क्या 1 लीटर इथेनॉल बनाने में हजारों लीटर पानी बह जाता है? सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में यह दावा किया जाता है कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में लगभग 10000 लीटर पानी बर्बाद होता है. लेकिन क्या इस बात में वाकई कोई सच्चाई है?
भारत इंडिपेंडेंट इथेनॉल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (BIEPA) के अध्यक्ष पुष्पिंदर सिंह (Pushpinder Singh) ने इस दावे की पूरी सच्चाई सामने रखी है. आइए समझते हैं कि इथेनॉल बनाने का असली गणित क्या है.
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1 लीटर इथेनॉल में कितना पानी लगता है?
पुष्पिंदर सिंह ने News24 को बताया कि उद्योग (Industry) में 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए वास्तविक रूप से केवल 4 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. इतना ही नहीं, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के इथेनॉल प्लांट्स को पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) देते समय भी इसी 4 लीटर वाले मानक (Standard) को आधिकारिक माना जाता है.
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फिर 10,000 लीटर पानी का भ्रम कहां से आया?
10,000 लीटर पानी खर्च होने का आंकड़ा दरअसल एक बड़ा भ्रम (Misinterpretation) है. यह आंकड़ा चावल या गन्ने जैसी फसलों को उगाने में लगने वाले उनके पूरे जीवनचक्र (Lifecycle) के पानी का है. किसान चावल या गन्ना सिर्फ इथेनॉल बनाने के लिए नहीं उगाते, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य भोजन की आपूर्ति है.
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इथेनॉल बनाने के लिए मुख्य रूप से गन्ने के शीरे (Molasses), टूटे हुए चावल, बचे हुए अनाज या मक्के का इस्तेमाल होता है. इथेनॉल के लिए जिस मक्के का इस्तेमाल होता है, उसे गर्मियों में उन जमीनों पर उगाया जाता है जो खाली पड़ी रहती हैं.
क्या इथेनॉल प्लांट भूजल (Groundwater) खत्म करते हैं?
अक्सर यह डर जताया जाता है कि इथेनॉल फैक्ट्रियों से जमीन का पानी (Groundwater) खत्म हो जाएगा. लेकिन वास्तविकता इससे अलग है. ज्यादातर इथेनॉल डिस्टिलरीज जमीन के नीचे के पानी का इस्तेमाल नहीं करती हैं. वे नदियों, जलाशयों या बांधों से मिलने वाले सतही जल (Surface Water) का उपयोग सरकारी आवंटन के तहत करती हैं.
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इस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पानी का एक बड़ा हिस्सा कूलिंग टावरों (Cooling Towers) में जाता है और भाप बनकर वापस पर्यावरण (प्रकृति) में लौट जाता है. पुष्पिंदर सिंह ने बताया कि 1 लीटर इथेनॉल बनाने में 10000 लीटर पानी लगने की बात पूरी तरह एक गलतफहमी है. फैक्ट्री में इथेनॉल बनाने के लिए सिर्फ 4 लीटर पानी की जरूरत होती है. इथेनॉल न सिर्फ भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए जरूरी है, बल्कि यह संसाधनों का सही इस्तेमाल करके बनाया जाने वाला एक स्वच्छ ईंधन (Clean Fuel) है.