Explainer: आज की दुनिया में सोशल मीडिया हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. पहले लोग चिट्ठियों, फोन कॉल और SMS के जरिए जुड़े रहते थे, लेकिन अब बातचीत से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ Instagram, Facebook, YouTube और WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म पर हो रहा है. खासकर बच्चे और किशोर सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा समय बिताने लगे हैं. रील्स देखना, वीडियो बनाना, गेम खेलना और ऑनलाइन दोस्तों से जुड़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है.
लेकिन इसके साथ कई नई समस्याएं भी सामने आई हैं. साइबर बुलिंग, फर्जी अकाउंट, ऑनलाइन ठगी, अश्लील कंटेंट, स्क्रीन की लत और वायरल होने की होड़ में जान जोखिम में डालने जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. यही वजह है कि अब भारत सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर नए नियमों पर विचार कर रही है.
सरकार क्या सोच रही है?
केंद्र सरकार फिलहाल सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु (Minimum Age) तय करने की संभावना पर विचार कर रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) इस विषय पर टेक कंपनियों, बाल अधिकार विशेषज्ञों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों से सुझाव ले रहा है.
अभी कोई अंतिम कानून लागू नहीं हुआ है, लेकिन सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कड़े नियम बनाए जाएं. इनमें एज वेरिफिकेशन, पैरेंटल कंसेंट और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े प्रावधान शामिल हो सकते हैं.
इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई?
पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन तेजी से पहुंचे हैं. इंटरनेट सस्ता होने और सोशल मीडिया ऐप्स की आसान उपलब्धता के कारण बच्चे पहले से कहीं अधिक समय ऑनलाइन बिताने लगे हैं.
इसका असर केवल पढ़ाई पर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी देखने को मिल रहा है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों में ध्यान भटकने, चिंता, नींद की समस्या और आत्मविश्वास में कमी जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं. इसके अलावा साइबर बुलिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं.
भारत में बच्चों के पास कितने स्मार्टफोन हैं?
एक सरकारी अध्ययन के अनुसार, भारत में 14 से 16 वर्ष की उम्र के लगभग 90 प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन उपलब्ध है. इनमें से अधिकांश बच्चे किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का नियमित उपयोग करते हैं.
भारत में मोबाइल डेटा भी दुनिया के सबसे सस्ते डेटा प्लान में शामिल है. कम कीमत में इंटरनेट मिलने के कारण बच्चों के लिए लंबे समय तक ऑनलाइन रहना आसान हो गया है. यही वजह है कि स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ रहा है.
अगर उम्र सीमा तय हुई तो क्या बदलेगा?
यदि सरकार न्यूनतम आयु सीमा लागू करती है, तो बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिश की जाएगी.
- कम उम्र के बच्चे हिंसक, अश्लील और भ्रामक कंटेंट से काफी हद तक दूर रह सकेंगे.
- साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और डिजिटल ठगी का खतरा कम हो सकता है.
- अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण होने वाले मानसिक और शारीरिक प्रभावों को सीमित करने में मदद मिल सकती है.
- सोशल मीडिया कंपनियों पर बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित प्लेटफॉर्म विकसित करने का दबाव बढ़ेगा.
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल उम्र सीमा तय कर देना पर्याप्त समाधान नहीं होगा.
उम्र की जांच कैसे होगी?
सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सोशल मीडिया कंपनियां किसी यूजर की सही उम्र कैसे जांचेंगी. सरकार ऐसे मॉडल पर विचार कर रही है जिसमें यूजर की पूरी निजी जानकारी लिए बिना केवल यह सत्यापित किया जाए कि वह तय उम्र से ऊपर है या नहीं. इसे Privacy by Design मॉडल कहा जाता है. इस व्यवस्था में कंपनियों को केवल आवश्यक जानकारी रखने की अनुमति होगी. छोटे बच्चों के मामले में माता-पिता की सहमति (Parental Consent) भी जरूरी की जा सकती है.
सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी क्या होगी?
यदि नया कानून लागू होता है, तो केवल बच्चों और माता-पिता पर ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों पर भी नई जिम्मेदारियां आएंगी. उन्हें ऐसे फीचर्स पर भी काम करना पड़ सकता है जो बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखते हैं. उदाहरण के लिए, इनफिनिट स्क्रॉल, ऑटोप्ले वीडियो और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन जैसे फीचर्स की समीक्षा की जा सकती है. साथ ही कंपनियों को बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन शोषण से जुड़े मामलों पर तेजी से कार्रवाई करनी पड़ सकती है. पैरेंटल कंट्रोल, स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट और कंटेंट फिल्टर जैसे टूल भी अधिक प्रभावी बनाने पड़ सकते हैं.
क्या बच्चे दूसरे ऐप्स का इस्तेमाल नहीं करेंगे?
यह चिंता भी विशेषज्ञों के सामने है. यदि बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सख्ती होती है, तो कुछ बच्चे दूसरे कम निगरानी वाले ऐप्स का इस्तेमाल शुरू कर सकते हैं. कुछ लोग गलत जन्मतिथि दर्ज कर सकते हैं, किसी और के अकाउंट का उपयोग कर सकते हैं या VPN जैसी तकनीकों का सहारा ले सकते हैं. इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय मजबूत एज वेरिफिकेशन और डिजिटल जागरूकता पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है.
भारत में अभी कौन-कौन से डिजिटल कानून लागू हैं?
बच्चों और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों को नियंत्रित करने के लिए भारत में पहले से कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 डिजिटल लेनदेन और साइबर गतिविधियों का मुख्य कानून है. इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता तय करते हैं. वहीं डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 नागरिकों के डिजिटल डेटा और निजता की सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण कानून है.
दूसरे देशों ने क्या किया है?
दुनिया के कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर अलग-अलग नियम बनाए हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया है. फ्रांस, मलेशिया, डेनमार्क, स्पेन, ग्रीस और नॉर्वे जैसे देशों में भी आयु सीमा या पैरेंटल कंसेंट से जुड़े मॉडल पर काम किया जा रहा है.
अमेरिका के कुछ राज्यों, जैसे फ्लोरिडा, में भी कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किए गए हैं. हालांकि हर देश का कानूनी ढांचा अलग है और नियम भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बनाए गए हैं.
क्या सिर्फ कानून बना देने से समस्या खत्म हो जाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका जवाब नहीं है. केवल कानून बना देने से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं की जा सकती.इसमें परिवार, स्कूल, सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी होगी, उनसे ऑनलाइन सुरक्षा और साइबर बुलिंग जैसे विषयों पर खुलकर बात करनी होगी और उन्हें खेल, पढ़ाई तथा अन्य ऑफलाइन गतिविधियों के लिए भी प्रोत्साहित करना होगा.
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल सरकार विभिन्न पक्षों से सुझाव ले रही है और दूसरे देशों के मॉडल का अध्ययन कर रही है. अभी किसी अंतिम कानून की घोषणा नहीं हुई है.
यदि नया कानून आता है, तो उसका उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना नहीं होगा, बल्कि उनके लिए सुरक्षित डिजिटल माहौल तैयार करना होगा. इसमें आयु सत्यापन, सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही, पैरेंटल कंट्रोल और डिजिटल साक्षरता जैसे कई उपाय एक साथ शामिल हो सकते हैं.
भारत में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर चर्चा तेज हो गई है. बढ़ते स्क्रीन टाइम, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ठगी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं ने सरकार को नए नियमों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है.
हालांकि, अभी कोई अंतिम कानून लागू नहीं हुआ है, लेकिन आने वाले समय में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए नया कानूनी ढांचा सामने आ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावी समाधान केवल आयु सीमा तय करने में नहीं, बल्कि मजबूत नियमों, तकनीकी सुरक्षा, डिजिटल जागरूकता और माता-पिता की सक्रिय भागीदारी में छिपा है.
FAQ
Q.
सोशल मीडिया पर उम्र की पाबंदी क्यों होनी चाहिए?
A.
सोशल मीडिया पर उम्र की सीमा इसलिए जरूरी मानी जा रही है क्योंकि बच्चे ऑनलाइन उत्पीड़न, शोषण और हानिकारक कंटेंट के संपर्क में आ रहे हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य और विकास पर बुरा असर पड़ता है.
Q.
सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश कौन सा है?
A.
ऑस्ट्रेलिया सोशल मीडिया पर ऐसा व्यापक प्रतिबंध लागू करने वाला पहला देश है. हालांकि, कई नाबालिगों का कहना है कि कानून लागू होने के बाद भी वे आयु सत्यापन प्रणाली को आसानी से चकमा देकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं.
Q.
क्या बच्चों को सोशल मीडिया पर होना चाहिए?
A.
आमतौर पर विशेषज्ञ 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की सलाह देते हैं. 13 साल के बाद भी माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए. सही सुरक्षा उपाय और निगरानी के साथ ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल सुरक्षित माना जाता है.
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