Bhopal News: पीएम मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण पर आरिफ मसूद की आपत्ति, बोले- मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का भी हो जिक्र - Haribhoomi

Published on 17 अग॰ 2026

भोपाल के कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने पीएम मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र नहीं होने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम सेनानियों के योगदान को भी प्रमुखता से सामने रखने की मांग की।

PM Modi

पीएम मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण पर आरिफ मसूद की आपत्ति

  • Published: 17 Aug 2026, 12:00 PM IST
  • Last Updated: 17 Aug 2026, 12:00 PM IST

भोपाल: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए भाषण को लेकर भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने आपत्ति जताई है। मसूद ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बताते समय मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को भी प्रमुखता से सामने रखा जाए।

आरिफ मसूद का कहना है कि भारत की आजादी किसी एक धर्म या समुदाय के लोगों के संघर्ष का परिणाम नहीं थी। अंग्रेजों के खिलाफ चले लंबे आंदोलन में हिंदू, मुस्लिम और दूसरे समुदायों के लोगों ने मिलकर हिस्सा लिया था। ऐसे में स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते समय सभी वर्गों के सेनानियों का योगदान सामने आना चाहिए।

कई मुस्लिम सेनानियों के नाम गिनाए
विधायक ने अपने ज्ञापन में स्वतंत्रता आंदोलन के अलग-अलग दौर का उल्लेख किया है। उन्होंने 18वीं सदी के फकीर-संन्यासी आंदोलन से जुड़े मजनू शाह फकीर, मूसा शाह, चिराग अली और नूरुल मोहम्मद जैसे नामों का जिक्र किया।

मसूद ने 1857 के विद्रोह का भी उल्लेख करते हुए अहमदुल्ला शाह मदरासी के योगदान की बात कही। उनका दावा है कि अहमदुल्ला शाह ने अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को एकजुट करने में भूमिका निभाई थी और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए इनाम घोषित किया था।

इतिहास सिर्फ बड़े नामों तक सीमित नहीं होना चाहिए
आरिफ मसूद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल कुछ चर्चित नेताओं और घटनाओं तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय स्तर पर आंदोलन करने वाले लोगों ने भी आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन की पूरी तस्वीर सामने लाने के लिए पुराने दस्तावेजों, स्मारकों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड का अध्ययन जरूरी है। उनके मुताबिक, इतिहास में सभी समुदायों के योगदान को उचित स्थान मिलना चाहिए।

1857 और ब्रिटिश कार्रवाई का भी जिक्र
ज्ञापन में मसूद ने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि विद्रोह को दबाने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को सजा दी गई थी, जिनमें मुस्लिम उलेमा और अन्य स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे।
हालांकि, ज्ञापन में दिए गए कुछ ऐतिहासिक आंकड़ों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है।

इंडिया गेट और सेलुलर जेल का दिया उदाहरण
आरिफ मसूद ने नेशनल वॉर मेमोरियल और अंडमान-निकोबार की सेलुलर जेल का उदाहरण देते हुए कहा कि देश के इतिहास और स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े अनेक लोगों के नाम वहां दर्ज हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की कि स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा में सभी समुदायों के योगदान को समान रूप से जगह दी जाए।