Bhai Tera Star Hai Movie Review: राघव जुयाल की फिल्म 'भाई तेरा स्टार है' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इसे देखने से पहले, रिव्यू पढ़ें। ...और पढ़ें

'भाई तेरा स्टार है' का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- एक्स

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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। 'भाई तेरा स्टार है' शीर्षक सुनकर लगता है यह मजेदार कॉमेडी फिल्म होगी, लेकिन कहानी के साथ यह शीर्षक बिल्कुल फिट नहीं बैठता है। वर्तमान में कंटेंट को ही किंग कहा जा रहा है। ऐसे में यह कहानी उसके साथ भद्दा मजाक लगती है।
एक रात की कहानी को देखते हुए शुरुआत से लेकर अंत तक यही सवाल मन में बना रहता है कि आखिर यह कहानी किस मकसद से लिखी गई है। फिल्म में ढेर सारे किरदार है। उनके बारे में स्क्रीन पर लिखकर आता है किस पात्र का किससे क्या संबंध है। या फिर उन पात्रों के दिमाग में क्या चल रहा है? यह पूरी तरह ध्यान भटकाता है। उस पर लगभग सभी कलाकार ओवरएक्टिंग से बाहर ही नहीं निकल पाते।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी यह है कि लंदन में बार चलाने वाला फैटी (संजय कपूर) अपने दस हजार पौंड वापस देने को लेकर संघर्षरत कलाकार अजय (राघव जुयाल) को चेतावनी देता है। उसके पीछे अपने तीन आदमी लगा देता है। पैसों के लिए अजय ने अपनी गर्लफ्रेंड रौशनी (निहारिका एन एम) और बहन नताशा (पार्वती ओमानाकुट्टन) से झूठ बोला होता है।
वहीं रौशनी के भाई सिड (विवान भटेना) ने भी बहुत लोगों को कर्ज दे रखा होता है। रौशनी ने उससे भी झूठ बोलकर पैसे मांगे हैं। अब इन पैसों को जमा करने के फेर में गलतफहमियां, उटपटांग हरकतें और तर्कहीन प्रसंग सामने आते हैं। यानी कॉमेडी के नाम पर सिर्फ फूहड़ता ही नजर आती है। कहानी और स्क्रीन प्ले इतना कमजोर है कि कोई भी पात्र लुभा नहीं पाता है।
ओवरएक्टिंग से राघव जुयाल ने किया निराश
राघव जुयाल अपनी अभिनय क्षमता वेब सीरीज 'बैड्स आफ बॉलीवुड' और 'किल' जैसी फिल्मों में दिखा चुके हैं। यहां पर वह पहली बार केंद्रीय भूमिका में हैं। बेहतर होता कि वह खलनायक या सहायक भूमिका में रहते लेकिन दर्शक उनके काम को याद तो रखते। ऐसे बेसिर-पैर की फिल्में उनके चयन पर भी सवाल खड़े करती हैं। वह स्क्रीन पर हर दृश्य में ओवरएक्टिंग करते दिखे हैं।
लेखनी और निर्देशन में भी नहीं है जान
बाकी कलाकारों का भी यही हाल है। एक दृश्य में विकल्प मेहता के किरदार जेडी को गोली लगती है। पहले तो लगता है कि यह भी मजाक होगा, लेकिन बाद में पता चलता है कि मामला सचमुच गोली लगने का है। यह फिल्म की कमजोर लेखनी और लचर निर्देशन की एक और मिसाल बनकर रह जाता है।
सही मायने में पटकथा में लगातार आने वाले बेवजह के घटनाक्रम फिल्म को मनोरंजक बनाने के बजाय बिखरा हुआ बना देते हैं। फिल्म में लंदन पुलिस का चित्रण इतना बचकाना और अविश्वसनीय है कि शायद ही किसी फिल्म में पहले इस तरह दिखाया गया हो।
कलाकारों की परफॉर्मेंस में नहीं दम
निकी अनेजा वालिया और चंदन राय सान्याल जैसे मंझे हुए कलाकारों की प्रतिभा का फिल्म में घोर दुरुपयोग हुआ है। कमजोर लेखन और सतही किरदारों के कारण उनकी अभिनय क्षमता पूरी तरह जाया हो जाती है। फिल्म के अंत में राघव जुयाल की डांसिंग प्रतिभा को दर्शाने के लिए प्रमोशनल गाने डाले गए हैं, लेकिन यह दांव बिल्कुल भी असर नहीं छोड़ता।