Akriti Chaudhary कौन हैं? DU की छात्रा पर NSA लगाने के मामले में नोएडा DM मेधा रूपम को SC से राहत

Published on 23 सित॰ 2026

Time Updated: Wednesday, September 23, 2026, 22:17 [IST]

Akriti Chaudhary NSA Case: दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार को अंतरिम राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के संचालन पर रोक लगा दी, जिसमें आकृति चौधरी की निवारक हिरासत रद्द की गई थी और अधिकारियों से 5 लाख रुपये का मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब NSA के तहत हिरासत की प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरती है, तो सिर्फ जिलाधिकारी को अलग करके जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? कोर्ट ने अंतरिम आदेश पर फैसला सुरक्षित रखा और आकृति चौधरी के वकील को राज्य सरकार व मेधा रूपम की याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने को कहा।

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पहले समझिए, पूरा मामला क्या है?

मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़ा है। मजदूर वेतन और कामकाजी परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान 13 अप्रैल को हिंसा की घटना हुई।

आकृति चौधरी को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया। राज्य का आरोप था कि आकृति ने प्रदर्शन के दौरान लोगों को उकसाया और बाद में हुई हिंसा में उनकी भूमिका थी। दूसरी ओर, आकृति की ओर से इस आरोप को चुनौती दी गई। उनका कहना है कि हिंसा शुरू होने से पहले ही वह पुलिस हिरासत में थीं।

कौन हैं आकृति चौधरी?

आकृति चौधरी 25 वर्षीय दिल्ली यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्रा और छात्र कार्यकर्ता हैं। उनका नाम अप्रैल में नोएडा के मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में सामने आया था। बाद में उनके खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत की कार्रवाई की गई। आकृति के खिलाफ NSA की कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को उनकी हिरासत रद्द करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया था, बशर्ते किसी दूसरे मामले में उनकी जरूरत न हो।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा था?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर के फैसले में आकृति की NSA हिरासत को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने हिरासत के आधार में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध सामग्री की जांच की थी।

हाई कोर्ट के मुताबिक, राज्य ऐसी सामग्री पेश नहीं कर सका जिससे यह स्पष्ट हो कि आकृति ने लोगों को हिंसा, आगजनी या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाया था। कोर्ट ने हिरासत के आधार को लेकर भी कड़ी टिप्पणियां की थीं। हाई कोर्ट ने इसके साथ आकृति को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। इस रकम की वसूली गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम और मामले में जिम्मेदार अन्य अधिकारियों से करने को कहा गया था। अदालत ने संबंधित अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में अपनी नाराजगी दर्ज करने का निर्देश भी दिया था।

अब सुप्रीम कोर्ट ने मेधा रूपम को क्या राहत दी?

मेधा रूपम ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अलग से अपील दाखिल की। 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के उन हिस्सों पर रोक लगा दी, जिनके तहत आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द की गई थी। 5 लाख रुपये का मुआवजा अधिकारियों से वसूलने का निर्देश दिया गया था। मेधा रूपम की सैलरी से व्यक्तिगत रूप से रकम वसूलने का आदेश दिया गया था। इसका मतलब यह है कि फिलहाल हाई कोर्ट के इन निर्देशों का संचालन रुका हुआ है। यह अंतिम फैसला नहीं है कि हाई कोर्ट का आदेश सही था या गलत। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आगे सुनवाई के लिए प्रक्रिया जारी रखी है।

सुप्रीम कोर्ट ने DM पर 5 लाख रुपये को लेकर क्या सवाल उठाया?

सुनवाई के दौरान कोर्ट का मुख्य सवाल था कि अगर NSA के तहत हिरासत का फैसला कई अधिकारियों और संस्थागत स्तरों से होकर गुजरा, तो केवल जिलाधिकारी को अलग करके मुआवजे की जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बताया कि प्रस्ताव पुलिस स्तर से शुरू होकर कई अधिकारियों के माध्यम से जिलाधिकारी तक पहुंचा था। उन्होंने दलील दी कि जिलाधिकारी इस पूरी प्रक्रिया की सिर्फ एक कड़ी थीं। उनके मुताबिक, मामले को सलाहकार बोर्ड और सरकार के स्तर पर भी देखा गया था। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरी, तो मेधा रूपम को अलग करके 5 लाख रुपये की जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है।

NSA की कार्रवाई की प्रक्रिया क्या होती है?

सुनवाई में सरकार की ओर से बताया गया कि निवारक हिरासत का प्रस्ताव सीधे जिलाधिकारी के पास नहीं पहुंचता। पुलिस से शुरू होने वाली प्रक्रिया में कई प्रशासनिक और वैधानिक स्तर शामिल होते हैं। सरकार के अनुसार, इस मामले में प्रस्ताव पुलिस स्तर से आगे बढ़कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के जरिए जिलाधिकारी तक पहुंचा। इसके बाद हिरासत से जुड़े मामले को सलाहकार बोर्ड और सरकार के स्तर पर भी देखा गया। यूपी सरकार का तर्क है कि इसलिए पूरे फैसले की जिम्मेदारी केवल डीएम पर डालना उचित नहीं है।

आकृति चौधरी के वकील ने क्या दलील दी?

आकृति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने हाई कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उनका तर्क था कि NSA जैसी कड़ी निवारक हिरासत के लिए मजबूत और ठोस सामग्री जरूरी है।

उन्होंने कहा कि राज्य यह दिखाने में नाकाम रहा कि आकृति ने 13 अप्रैल की हिंसा को भड़काया था। उनका मुख्य तर्क यह था कि हिंसा शुरू होने से पहले आकृति पुलिस हिरासत में थीं, इसलिए उन्हें बाद की हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराने का आधार कमजोर है। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग FIR एक ही 13 अप्रैल की घटना से जुड़ी हैं।

सरकार और DM की दलील क्या है?

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि अदालत ने निवारक हिरासत के आदेश की समीक्षा के दायरे से आगे जाकर मामले के तथ्यों और आरोपों का मूल्यांकन किया।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि मेधा रूपम ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से मिली सामग्री के आधार पर अपनी संतुष्टि दर्ज की थी। उनके वकीलों के मुताबिक, प्रक्रिया में कई स्तरों पर जांच और वैधानिक सुरक्षा उपाय मौजूद थे। मेधा रूपम की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी हाई कोर्ट की टिप्पणियों को चुनौती दी। उनका तर्क था कि डीएम को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है, जबकि फैसला एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद लिया गया था।

क्या आकृति अभी जेल में हैं?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि आकृति अन्य मामलों में भी आरोपी हैं और उन्हीं मामलों के कारण उनकी हिरासत जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हैं और इन मामलों में उन्हें अभी जमानत नहीं मिली है। इसलिए NSA हिरासत रद्द होने का मतलब यह जरूरी नहीं था कि वह तत्काल जेल से बाहर आ जातीं, क्योंकि दूसरे मामलों में हिरासत जारी रह सकती है।