8th Pay Commission Update: 8वें वेतन आयोग में लेवल 8 के कर्मचारियों की ग्रॉस सैलरी 1.52 लाख रुपए महीना पहुंचने का दावा किया जा रहा है. हालांकि यह कोई आधिकारिक फैसला नहीं बल्कि एक अनुमान है.
8th Pay Commission Update: 8वें वेतन आयोग में लेवल 8 के कर्मचारियों की ग्रॉस सैलरी 1.52 लाख रुपए महीना पहुंचने का दावा किया जा रहा है. हालांकि यह कोई आधिकारिक फैसला नहीं बल्कि एक अनुमान है.
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8th pay commission Photograph: (File Photo)
8th Pay Commission Update: केंद्रीय कर्मचारियों के बीच इन दिनों 8वें वेतन आयोग को लेकर सुगबुगाहट बहुत तेज हो गई है. हर दफ्तर और हर महकमे में बस एक ही चर्चा चल रही है कि जब नया वेतन आयोग लागू होगा तो किसकी जेब में कितने पैसे आएंगे. इसी बीच सोशल मीडिया और कर्मचारियों के विभिन्न मंचों पर एक नया आंकड़ा तेजी से वायरल हो रहा है. कहा जा रहा है कि लेवल 8 के कर्मचारियों की ग्रॉस सैलरी सीधे 1.52 लाख रुपए प्रति महीना तक पहुंच सकती है. इस आंकड़े ने लाखों कर्मचारियों के चेहरे पर चमक तो ला दी है, लेकिन इसके साथ ही मन में कई बड़े सवाल भी खड़े कर दिए हैं. हर कोई यह जानने के लिए बेताब है कि क्या वाकई खाते में इतना पैसा आने वाला है या फिर यह सिर्फ हवा-हवाई बातें हैं.
1.52 लाख के दावे की असली हकीकत
कर्मचारियों को सबसे पहले यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सरकार या वेतन आयोग की तरफ से ऐसा कोई आधिकारिक ऐलान अभी तक नहीं हुआ है. 1.52 लाख रुपए का जो आंकड़ा सामने आया है, वह पूरी तरह से एक काल्पनिक और गणितीय अनुमान पर आधारित है. इसमें अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर, संभावित महंगाई भत्ता, हाउस रेंट अलाउंस और परिवहन भत्ते को जोड़कर एक मोटा हिसाब लगाया गया है. असल बात यह है कि 8वें वेतन आयोग ने अभी तक न तो अपना कोई फॉर्मूला तय किया है और न ही फिटमेंट फैक्टर को लेकर कोई अंतिम सिफारिश तैयार की है. इसलिए इस आंकड़े को पक्की मुहर मानना जल्दबाजी होगी.
आखिर कहां से निकला 1.52 लाख का आंकड़ा
अब सवाल उठता है कि अगर सरकार ने कुछ तय नहीं किया तो यह 1.52 लाख का आंकड़ा आखिर आया कहां से. जानकारों ने इसके लिए पिछले यानी 7वें वेतन आयोग के फॉर्मूले को आधार बनाया है. माना जा रहा है कि अगर 8वें वेतन आयोग में भी 2.57 का ही फिटमेंट फैक्टर लागू किया जाता है, तो बेसिक सैलरी में उसी अनुपात में बढ़ोतरी होगी. इसके साथ ही यह मान लिया गया है कि जब तक नया वेतन आयोग लागू होगा, तब तक महंगाई भत्ता बढ़कर लगभग 66 प्रतिशत तक पहुंच चुका होगा. जब इस बढ़े हुए बेसिक पे पर 66 प्रतिशत महंगाई भत्ता, बढ़ा हुआ मकान किराया भत्ता और बाकी भत्ते जोड़े जाते हैं, तब जाकर लेवल 8 के कर्मचारी की कुल ग्रॉस सैलरी 1.51 लाख से 1.52 लाख रुपए महीने के आसपास बैठती है.
7वें वेतन आयोग का पुराना तजुर्बा
इस गणित को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर 7वें वेतन आयोग के दिनों को देखना होगा. उस समय सरकार ने कर्मचारियों के पुराने बेसिक पे को नए बेसिक पे में बदलने के लिए 2.57 का फिटमेंट फैक्टर तय किया था. इसका सीधा मतलब यह था कि कर्मचारियों के पुराने मूल वेतन को 2.57 से गुणा करके नया मूल वेतन बनाया गया था. हालांकि उस वक्त भी कर्मचारियों की मांग थी कि फिटमेंट फैक्टर को 3.68 किया जाए, लेकिन सरकार ने उसे नहीं माना था. 8वें वेतन आयोग में यह आंकड़ा क्या रहेगा, यह अभी पूरी तरह भविष्य के गर्त में छिपा है.
बेसिक सैलरी और ग्रॉस सैलरी का भारी अंतर
अक्सर सामान्य कर्मचारियों को यह गलतफहमी हो जाती है कि अगर बेसिक सैलरी में 2.57 गुना की बढ़ोतरी हुई है तो उनकी इन-हैंड या पूरी ग्रॉस सैलरी भी ढाई गुना बढ़ जाएगी. असल जिंदगी में ऐसा बिल्कुल नहीं होता है. ग्रॉस सैलरी सिर्फ बेसिक सैलरी से नहीं बनती, बल्कि उसमें महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता और यात्रा भत्ता जैसे कई बड़े घटक शामिल होते हैं. जब नया वेतन आयोग आता है तो उस वक्त का सारा महंगाई भत्ता बेसिक सैलरी में जोड़ दिया जाता है और नए सिरे से महंगाई भत्ता शून्य से शुरू होता है. यही वजह थी कि पिछली बार 2.57 का फिटमेंट फैक्टर होने के बावजूद कर्मचारियों की कुल ग्रॉस सैलरी में औसतन केवल 14 प्रतिशत के आसपास ही वास्तविक उछाल देखा गया था.
महंगाई भत्ते का बड़ा रोल और आगे की राह
इस पूरे खेल में महंगाई भत्ते की भूमिका सबसे बड़ी और निर्णायक साबित होने वाली है. मौजूदा समय में केंद्रीय कर्मचारियों को करीब 60 प्रतिशत महंगाई भत्ता मिल रहा है. अगर 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें साल 2027 के मध्य या आखिरी महीनों तक लागू होती हैं, तो हर छह महीने में होने वाली बढ़ोतरी के हिसाब से तब तक महंगाई भत्ता आसानी से 66 प्रतिशत या उससे ऊपर पहुंच सकता है. वेतन आयोग की नई गणना इसी बात पर टिकी होगी कि उस वक्त महंगाई भत्ते का स्तर क्या रहता है. साफ है कि जब तक आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं आती और सरकार उस पर अपनी सहमति नहीं देती, तब तक किसी भी आंकड़े को अंतिम मान लेना कर्मचारियों के लिए सिर्फ एक भ्रम की तरह होगा.
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