
ग्लेशियल झीले पिघलने से 20 फीसदी जीडीपी पर खतरा बढ़ गया है.
हिमालय में तेजी से पिघलते ग्लेशियर और पानी की कमी भारत के लिए एक बड़े खतरे की घंटी बन चुके हैं. रिपोर्ट के अनुसार, गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियों को पानी देने वाली लगभग 200 ग्लेशियर झीलें ‘हाई-रिस्क’ (अत्यधिक खतरनाक) जोन में आ गई हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर पिछले एक दशक की तुलना में 65% अधिक तेजी से पिघल रहे हैं. इससे न केवल पहाड़ों में अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ (GLOF) का खतरा बढ़ गया है, बल्कि आने वाले समय में मैदानी इलाकों में नदियों का पानी सूखने की गंभीर चुनौती खड़ी हो रही है.
यह जल संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की इकोनॉमी के लिए भी एक बड़ा झटका है. हिमालयी नदियों से मिलने वाला पानी भारत की लगभग 20% अर्थव्यवस्था (GDP) का आधार है. इसका मतलब है कि 830 बिलियन डॉलर यानी कररीब 80 लाख करोड़ रुपए की इकोनॉमी को खतरा पैदा हो गया है. उत्तर भारत में कृषि (गेहूं और चावल की खेती), चाय बागान, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स (बिजली उत्पादन) और धार्मिक पर्यटन सीधे तौर पर इन्हीं नदियों पर टिके हुए हैं. यदि हिमालय में पानी का संतुलन बिगड़ता है, तो इससे देश में खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी, बिजली का उत्पादन घटेगा और उद्योगों के साथ-साथ करोड़ों लोगों की आजीविका पर संकट छा जाएगा.
कहां से आई रिपोर्ट?
हिमालय गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहा है. ग्लेशियरों का मास अब एक दशक पहले की तुलना में 65 प्रतिशत तेजी से घट रहा है. ‘समृद्ध और लचीला हिमालय’ (Prosperous and Resilient Himalayas) शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में लगभग 200 ग्लेशियल झीलों (glacial lakes) को हाई रिस्क वाली कैटेगिरी में रखा गया है, जिनमें से 56 अकेले भारत में ‘वेरी हाई रिस्क’ वाली कैटेगिरी में आती हैं.
यह रिपोर्ट Systemiq और इंटीग्रेटिड माउंटेन इनिशिएटिव द्वारा तैयार की गई है, जिसमें जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान नॉलेज पार्टनर था और इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटिड माउंटेन डेवलपमेंट ने तकनीकी शोध में योगदान दिया. इसे Rockefeller Foundation का समर्थन प्राप्त है और यह अक्टूबर में आने वाली पूरी रिपोर्ट से पहले एक संक्षिप्त इमरजेंसी एडिशन के रूप में जारी की गई है.
आंकड़ों से मामले को समझना काफी जरूरी
- देश की 20% GDP पर संकट: हिमालयी नदियों के पानी पर निर्भर कृषि, बिजली उत्पादन और पर्यटन सेक्टर प्रभावित होने से देश के आर्थिक उत्पादन को बड़ा नुकसान हो सकता है.
- 200 ग्लेशियर झीलें बनीं खतरा: गंगा, यमुना और सिंधु बेसिन की 200 से अधिक ग्लेशियर झीलें कभी भी टूटने की कगार पर हैं, जिससे केदारनाथ या सिक्किम जैसी अचानक बाढ़ (GLOF) का जोखिम बढ़ गया है.
- 65% तेजी से पिघल रही बर्फ: रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 सालों में बर्फ पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ी है. चिंता की बात यह है कि हिमालय के 40,000 ग्लेशियरों में से केवल 21 की ही नियमित निगरानी हो पा रही है.
- मध्य सदी तक ‘पीक वॉटर’ का रिस्क: वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि 2050 के आसपास नदियों में ग्लेशियर के पिघलने से पानी का बहाव अपने उच्चतम स्तर (Peak Water) पर पहुंचेगा, और उसके बाद नदियों में पानी का स्तर हमेशा के लिए घटने लगेगा.
खतरे में नदियां
रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां हिमालय से बहने वाले पानी पर बहुत अधिक निर्भर हैं, और इस प्रणाली को पानी देने वाली ग्लेशियल झीलें तेजी से अस्थिर होती जा रही हैं. जैसे-जैसे ग्लेशियर पीछे हटते हैं, वे अपने पीछे ऐसी झीलें छोड़ जाते हैं जो ढीली चट्टानों और बर्फ से बमुश्किल रुकी होती हैं और उन घाटियों के ऊपर स्थित होती हैं जहां लाखों लोग रहते हैं.
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह क्षेत्र ‘पीक वॉटर’ (peak water) की स्थिति के करीब पहुंच रहा है. यह वह बिंदु जहां ग्लेशियर के पिघलने से मिलने वाले पानी की मात्रा बढ़ना बंद हो जाती है और घटने लगती है. उम्मीद है कि हिमालय की अधिकांश नदी घाटियां इस सदी के मध्य तक इस चरण तक पहुंच जाएंगी, और यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो हिंदू कुश हिमालय 2100 तक अपने वर्तमान ग्लेशियर वॉल्यूम का 80 प्रतिशत तक खो सकता है.
भारत की GDP का 20 प्रतिशत हिस्सा दांव पर
रिपोर्ट में पाया गया है कि हिमालयी वॉटर सिस्टम्स भारत की GDP के 20 फीसदी से ज्यादा हिस्से का आधार हैं. जब इनके पानी के बहाव वाले पूरे इलाके को गिना जाता है, तो ये इंडो-गैंगेटिक मैदान में खेती, असम और बंगाल में चाय की खेती, पूर्वोत्तर में पनबिजली और आगे के इलाकों में तीर्थयात्रा से जुड़ी अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देती हैं. इसके बावजूद, इन सिस्टम्स की देखभाल करने वाले हिमालयी राज्यों को इसका केवल 5 प्रतिशत मूल्य ही मिल पाता है. ज्यादातर फायदा उन राज्यों को मिलता है जो बाढ़ या सूखे जैसी आपदा आने तक पहाड़ों को शायद ही कभी अपना मानते हैं.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हिमालय भारत की जमीन का सिर्फ 18 फीसदी हिस्सा है, लेकिन देश की 35 फीसदी आपदाएं यहीं होती हैं. इसमें 2013 की उत्तराखंड बाढ़, 2021 की चमोली आपदा और 2023 में सिक्किम में ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ का उदाहरण दिया गया है, जो ऐसी घटनाओं से होने वाले नुकसान के पैमाने को दिखाते हैं.

नेपाल में आपदाओं की एक के बाद एक घटनाएं
यह रिपोर्ट मुख्य रूप से 26 अगस्त, 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई आपदा पर आधारित है. वहां ग्लेशियर के टूटने से जमीन खिसकने (लैंडस्लाइड) की घटना हुई, जिससे एक बांध जैसा बन गया और फिर वह टूटकर बाढ़ में बदल गया—और यह सब सिर्फ दो घंटों के भीतर हुआ. रिपोर्ट में इसे चार आपदाओं का एक मिला-जुला रूप बताया गया है. बाद में मलबे और शव भारत तक बहकर पहुंच गए, जिससे पता चलता है कि ग्लेशियर से जुड़ी एक घटना कितनी तेजी से सीमाओं के पार असर डाल सकती है.
प्रदूषण से तेजी से पिघल रही बर्फ
ग्लोबल वार्मिंग के अलावा, रिपोर्ट में मैदानी इलाकों से आने वाले ब्लैक कार्बन प्रदूषण को ग्लेशियर के नुकसान का एक बड़ा कारण बताया गया है. इसमें हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की लगभग एक-तिहाई वजह मुख्य रूप से ईंट-भट्टों से निकलने वाली कालिख (सूट) को माना गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के उलट, यह एक ऐसी समस्या है जिस पर यह क्षेत्र सीधे तौर पर कदम उठा सकता है. साथ ही, दस प्राथमिकता वाले कामों में से एक के तौर पर, भट्टों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए एक खास फंड बनाने का सुझाव भी दिया गया है.

ये 10 सुधार हैं बेहद जरूरी
इस रिपोर्ट में हिमालयी क्षेत्र को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए दस जरूरी बदलावों का जिक्र किया गया है. इनमें सूखे झरनों को फिर से जिंदा करने से लेकर ग्लेशियर से जुड़े खतरों के लिए पहले से चेतावनी देने वाले सिस्टम लगाना शामिल है. रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर इन बदलावों से मिलने वाले आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक फायदों को एक साथ जोड़ा जाए, तो हर निवेश किए गए रुपए पर औसतन लगभग 8 गुना रिटर्न मिल सकता है.
इन बदलावों से इकोनॉमी मिलेगा मोटा रिटर्न

यह बात क्यों अहम है?
रिपोर्ट का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में अभी उतनी धनराशि नहीं पहुंच रही है जितनी कि आवश्यकता है, जबकि इस क्षेत्र में किसी भी निर्माण कार्य की लागत मैदानी इलाकों की तुलना में लगभग 2.5 गुना अधिक होती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय औसत की तुलना में यहां पब्लिक खर्च का बोझ पहले से ही अधिक है, जबकि प्राइवेट इंवेस्टमेंट कम बना हुआ है. साथ ही, इस अंतर को पाटने के लिए सरकारी फंडिंग, प्राइवेट कैपिटल और नागरिकों के योगदान के मिले-जुले प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया गया है.
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में ‘ग्रैंथम रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑन क्लाइमेट चेंज एंड द एनवायरनमेंट’ के अध्यक्ष लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने रिपोर्ट में कहा कि हिमालय ‘थर्ड पोल’ के रूप में कार्य करता है और आर्कटिक या अंटार्कटिक के विपरीत, यह करोड़ों लोगों की आबादी के ऊपर स्थित है, जिससे इस क्षेत्र की भविष्य की समृद्धि के लिए इसका बचाव या संरक्षण काफी जरूरी है.
ICIMOD के महानिदेशक डॉ. पेमा ग्यामतशो ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, जहां ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और पहाड़ों की ढलानें अस्थिर हो रही हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अब इसके जोखिम केवल ‘ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़’ (GLOF) तक ही सीमित नहीं हैं और ये जोखिम राष्ट्रीय सीमाओं की परवाह नहीं करते हैं.

सौरभ शर्मा
2008 से शेयर मार्केट, इकोनॉमी और कमोडिटी कवर कर रहे हैं. टीवी9 के साथ जुड़ने से पहले डीएनए, एशियानेट, जनसत्ता, दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका जैसे कई बड़े संस्थानों के साथ भी जुड़े रहे.
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