
करीब 400 साल पहले सात बीजों ने देश में कॉफी की खेती का रास्ता खोला.
World Coffee Day 2026: एक अक्तूबर को हर साल इंटरनेशनल कॉफी डे के रूप में दुनिया के कॉफी प्रेमी मनाते या रहे हैं. यह सिलसिला साल 2015 में इटली के मिलान शहर से शुरू हुआ. अब यह दुनिया के अनेक देशों में मनाया जाता है. अंतर्राष्ट्रीय कॉफी संगठन ने साल 2014 में इसकी घोषणा की थी. कॉफी उत्पादक किसानों को समर्थन देने के इरादे से इस खास दिन की शुरुआत हुई थी. भारत में भी इस मौके पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि चाय के देश कहलाने वाले भारत में कैसे पहुंची कॉफी? दक्षिण भारत कैसे बन गया उत्पादन का गढ़?
भारत को अक्सर चाय का देश कहा जाता है. दुनिया को सबसे ज्यादा टी एक्सपोर्ट करने के मामले में भारत तीसरे नम्बर पर है.सुबह की शुरुआत हो या शाम की थकान, बहुत से लोगों के लिए चाय रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. फिर भी कॉफी ने यहां अपनी अलग जगह बनाई है. दक्षिण भारत की फिल्टर कॉफी से लेकर शहरों के कैफे तक, यह पेय आज कई रूपों में लोकप्रिय है. इसकी भारतीय कहानी एक छोटी शुरुआत से जुड़ी है. कहा जाता है कि करीब चार सौ साल पहले सात बीजों ने देश में कॉफी की खेती का रास्ता खोला.
यमन से भारत तक का सफर और बाबा बुदन
कॉफी की खेती और व्यापार का पुराना केंद्र यमन था. वहां का मोचा बंदरगाह कॉफी के कारोबार के लिए जाना जाता था. उस समय कॉफी के बीजों को दूसरे देशों तक पहुंचाना आसान नहीं था. व्यापारियों को डर था कि बाहर ले जाए गए बीजों से दूसरे देशों में भी पौधे उगाए जा सकते हैं.

छिपाकर लाए गए सात कच्चे बीज को कर्नाटक की पहाड़ियों में बोया गया था.
एक प्रचलित कथा के अनुसार, सूफी संत बाबा बुदन मक्का की यात्रा से लौटते समय यमन के मोचा इलाके में रुके. वहां उन्होंने कॉफी चखी और उसके स्वाद से प्रभावित हुए. वे कुछ बीज अपने साथ भारत लाना चाहते थे. कहा जाता है कि उन्होंने सात कच्चे बीज छिपाकर यात्रा की और उन्हें कर्नाटक की पहाड़ियों में बो दिया. इस कहानी के अलग-अलग रूप सुनने को मिलते हैं. लेकिन बाबा बुदन और सात बीजों का किस्सा भारत में कॉफी की शुरुआत से लंबे समय से जुड़ा है. माना जाता है कि बीज चिकमंगलूर के पास की पहाड़ियों में लगाए गए. बाद में इन्हीं पहाड़ियों को बाबा बुदन गिरी के नाम से जाना गया.
सात बीजों से आधुनिक खेती तक का सफर
शुरुआत में कॉफी बड़े व्यापार की फसल नहीं थी. पौधे सीमित इलाकों में लगाए जाते थे. समय के साथ खेती आसपास की पहाड़ियों तक फैली. पहाड़ी ढलान, ठंडा मौसम और अच्छी वर्षा कॉफी के पौधों के लिए अनुकूल साबित हुए. बाद के दौर में कॉफी की खेती व्यवस्थित रूप लेने लगी. अठारहवीं सदी में व्यावसायिक बागानों का विकास हुआ. उन्नीसवीं सदी में दक्षिण भारत के कई पहाड़ी इलाकों में कॉफी की खेती बढ़ी. औपनिवेशिक शासन के दौरान बागानों का विस्तार हुआ और कॉफी का उत्पादन व्यापार से जुड़ गया. इस तरह एक छोटे प्रयोग से शुरू हुई खेती धीरे-धीरे बड़े कृषि क्षेत्र में बदल गई.

कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु भारत के पारंपरिक कॉफी उत्पादक राज्य हैं. फोटो: Unsplash
दक्षिण भारत क्यों और कैसे बना कॉफी का गढ़?
कॉफी के पौधों को हर जगह एक जैसा मौसम नहीं मिलता. उन्हें उपयुक्त तापमान, नियमित बारिश और अच्छी जलनिकासी वाली मिट्टी की जरूरत होती है. दक्षिण भारत के पश्चिमी और पूर्वी घाटों में ऐसी परिस्थितियां कई जगह मिलती हैं. यहां पहाड़ी इलाके हैं. वर्षा अच्छी होती है. पेड़ों की छाया भी पौधों को तेज धूप से बचाती है. कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु भारत के पारंपरिक कॉफी उत्पादक राज्य हैं.
कर्नाटक में चिकमंगलूर, कोडागु और हासन प्रमुख क्षेत्र हैं. केरल में वायनाड और तमिलनाडु में नीलगिरी तथा शेवरॉय की पहाड़ियां कॉफी के लिए जानी जाती हैं. इन इलाकों में खेती का अनुभव पीढ़ियों से आगे बढ़ा है. किसानों ने मौसम और मिट्टी के अनुसार खेती के तरीके विकसित किए हैं. कर्नाटक देश का सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक राज्य है. इसके बाद केरल और तमिलनाडु का स्थान आता है. तीनों राज्यों का मिलकर भारत के कुल उत्पादन में बड़ा हिस्सा है.

छाया में उगने वाली कॉफी
भारतीय कॉफी की एक खास बात यह है कि इसे अक्सर पेड़ों की छाया में उगाया जाता है. कॉफी के पौधों के ऊपर ऊंचे पेड़ रहते हैं. उनके नीचे छोटे पौधे और मसाले भी उगाए जा सकते हैं. इससे बागान में अलग-अलग तरह की वनस्पति बनी रहती है. ऐसे बागानों में काली मिर्च, इलायची और फलदार पेड़ भी मिल सकते हैं. पेड़ों की छाया मिट्टी को बचाने और नमी बनाए रखने में मदद करती है.
यह तरीका बागानों को केवल कॉफी के खेत नहीं रहने देता. वे कई तरह के पौधों और जीवों का घर भी बनते हैं. भारत में मुख्य रूप से अरेबिका और रोबस्टा कॉफी उगाई जाती है. अरेबिका को आम तौर पर ऊंचे और अपेक्षाकृत ठंडे इलाकों में उगाया जाता है. रोबस्टा गर्म और नम क्षेत्रों में अच्छी तरह बढ़ती है. दोनों के स्वाद और उपयोग अलग होते हैं. किसान अपने इलाके की जलवायु के अनुसार किस्म चुनते हैं.

समय के साथ कॉफी स्थानीय स्वाद और रोजमर्रा की मेहमाननवाजी का हिस्सा बन गई. फोटो: Unsplash
चाय के साथ कॉफी ने बनाई जगह
भारत में चाय का चलन बहुत व्यापक रहा है. खासकर औपनिवेशिक दौर में चाय के प्रचार और उत्पादन में तेजी आई. इससे कॉफी को देश भर में चाय जैसी लोकप्रियता नहीं मिली. फिर भी दक्षिण भारत में कॉफी का अपना मजबूत स्थान बना रहा. घरों और भोजनालयों में फिल्टर कॉफी की परंपरा विकसित हुई. इसमें पीसी हुई कॉफी को धातु के फिल्टर में धीरे-धीरे छाना जाता है. उससे निकले गाढ़े अर्क में दूध और चीनी मिलाई जाती है. कई जगह इसे स्टील के गिलास और कटोरी में परोसा जाता है. कॉफी को ऊंचाई से उडेलने की शैली भी इसकी पहचान बन गई.
इस तरह कॉफी सिर्फ खेतों की फसल नहीं रही. वह स्थानीय स्वाद और रोजमर्रा की मेहमाननवाजी का हिस्सा बन गई. दक्षिण भारत से बाहर भी लोग फिल्टर कॉफी और अन्य कॉफी पेय से परिचित हुए. शहरों में कैफे संस्कृति बढ़ने के साथ कॉफी के नए रूप सामने आए.
छोटे किसानों का बड़ा योगदान
कॉफी की खेती में छोटे किसानों की भूमिका अहम है. कई परिवार पीढ़ियों से बागानों में काम करते आए हैं. खेती के साथ बीज चुनना, फल तोड़ना, सुखाना और प्रसंस्करण करना भी इस काम का हिस्सा है. एक कप कॉफी के पीछे कई चरण और अनेक लोगों का श्रम होता है. कॉफी के खेत स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं. बागानों में काम करने वाले मजदूरों से लेकर प्रसंस्करण और व्यापार से जुड़े लोगों तक, कई लोगों की आजीविका इस क्षेत्र से जुड़ी है. भारतीय कॉफी का बड़ा हिस्सा विदेशों में भी भेजा जाता है. इससे देश के कॉफी उत्पादकों को वैश्विक बाजार से जुड़ने का अवसर मिलता है.
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दिनेश पाठक
मूलतः पाठक. पेशे से लेखक. कबीर की धरती पर जन्म. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धरती अयोध्या में लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई. करियर की शुरुआत आदि गंगा के तट लखनऊ से. संगम तीरे प्रयागराज, मोहब्बत की निशानी ताजमहल के साये से लेकर देवभूमि उत्तराखंड, उद्योगनगरी के रूप में मशहूर रहे कानपुर और बाबा गोरखनाथ की धरती पर काम करते हुए विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा, करंट अफ़ेयर्स, यूथ, पैरेंटिंग, राजनीति, प्रशासन, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 1992 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुई इस पाठक की लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है. हिंदुस्तान अखबार में पांच केंद्रों पर एडिटर रहे. यूथ, पैरेंटिंग पर पाँच किताबें. एक किताब 'बस थोड़ा सा' पर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया.
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