सूखा प्रभावित 65 फीसदी भारत की खेती अब वैश्विक एजेंडे में, दिल्ली में तीन दिवसीय ग्लोबल ड्राईलैंड कांग्रेस शुरू

Published on 11 सित॰ 2026

11 सितंबर 2026, नई दिल्ली: सूखा प्रभावित 65 फीसदी भारत की खेती अब वैश्विक एजेंडे में, दिल्ली में तीन दिवसीय ग्लोबल ड्राईलैंड कांग्रेस शुरू – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) के संयुक्त तत्वावधान में 10 से 12 सितंबर तक नई दिल्ली में ग्लोबल ड्राईलैंड कांग्रेस 2026 आयोजित की जा रही है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसमें हिस्सा लेते हुए कहा कि देश के करीब 65 प्रतिशत भूभाग में कम पानी वाली खेती होती है, इसलिए इन क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।

तीन दिन तक चलने वाले इस आयोजन का विषय रखा गया है — “साउथ-साउथ सहयोग से शुष्क क्षेत्रों की खेती का कायाकल्प।” इसमें संयुक्त राष्ट्र भी दक्षिण-दक्षिण सहयोग दिवस के तहत भागीदार बना है। आयोजकों के मुताबिक दुनियाभर में करीब 45 प्रतिशत भूभाग शुष्क क्षेत्र की श्रेणी में आता है, जहां दो अरब से ज्यादा लोग रहते हैं और खेती पानी की भारी कमी के बीच होती है।

चौहान बोले— कम पानी में भी बढ़े पैदावार और आय

कृषि मंत्री ने अपने संबोधन में कहा, “भारत के करीब 65 फीसदी भूभाग में कम पानी वाले क्षेत्र हैं।” उन्होंने इस मौके पर जोर देकर कहा कि सूखे इलाकों में कम पानी के बावजूद अच्छी पैदावार लेना और किसानों की आय बढ़ाना अब सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि दुनिया के कई विकासशील देशों की साझा चुनौती है। उनके मुताबिक भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य में शुष्क क्षेत्रों की कृषि उत्पादकता की अहम भूमिका होगी।

आयोजन में देश-विदेश के कृषि वैज्ञानिक, नीति-निर्माता और शोध संस्थान एक मंच पर आकर सूखा-सहनशील बीज किस्मों, जल-संरक्षण तकनीकों और साझा शोध पर चर्चा कर रहे हैं। हैदराबाद स्थित ICRISAT लंबे समय से अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की किस्मों पर काम करता रहा है, और यह मंच उसी शोध को अन्य विकासशील देशों तक पहुंचाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

राजस्थान से तेलंगाना तक—किन राज्यों के किसानों को होगा फायदा

राजस्थान, गुजरात के कच्छ-सौराष्ट्र क्षेत्र, महाराष्ट्र के विदर्भ-मराठवाड़ा, कर्नाटक और तेलंगाना के बड़े हिस्से पहले से ही कम और अनियमित बारिश वाले शुष्क क्षेत्रों में आते हैं। इन राज्यों में बाजरा, ज्वार, चना, अरहर और तिलहन जैसी फसलें मुख्य रूप से उगाई जाती हैं, जो सीमित पानी में भी टिकी रहती हैं। सम्मेलन में हुई चर्चाओं का सीधा फायदा इन्हीं इलाकों के किसानों को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि नई शोध-आधारित किस्में और जल-प्रबंधन तकनीकें सबसे पहले इन्हीं क्षेत्रों में परखी जाती हैं।

आयोजन के दौरान अफ्रीका और एशिया के कई विकासशील देशों के प्रतिनिधियों ने भी भारत के अनुभवों में दिलचस्पी दिखाई, क्योंकि उनके यहां भी दक्षिण भारत जैसी जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियां पाई जाती हैं। भारत के लिए यह मौका अपने कृषि शोध और तकनीक को दूसरे देशों तक पहुंचाने का भी है, जिसे “साउथ-साउथ सहयोग” के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture