राजपरिवार के निमंत्रण पर मां दंतेश्वरी-मां मावली की डोली-छत्र रवाना: बस्तर-दशहरा में शामिल होंगी देवी,एक दिन बाद मावली परघाव की रस्म, 618 साल पुरानी परंपरा - Jagdalpur News

Published on 18 अक्टू॰ 2026

बस्तर दशहरे में शामिल होने के लिए आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और मां मावली की डोली और छत्र रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हो गया है। डोली और छत्र की रवानगी से पहले परंपरानुसार विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान पुलिस जवानों ने हर्ष

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माता की डोली और छत्र को लेकर टेंपल कमेटी के सदस्य देर रात तक जगदलपुर पहुंच जाएंगे। वहीं रविवार को माता की डोली और छत्र के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। रवानगी के दौरान आंवराभाटा, कारली, हारम पारा और गीदम में जगह-जगह स्वागत किया गया।

डोली और छत्र के साथ मंदिर के पुजारी, सेवादार और जिला प्रशासन की टीम भी जगदलपुर रवाना हुई है।

मंगलवार को होगी मावली परघाव की रस्म

माता की डोली और छत्र देर रात जगदलपुर पहुंचने के बाद गीदम रोड स्थित जिया डेरा में ठहराए जाएंगे। इसके बाद मंगलवार की शाम को मावली परघाव की रस्म अदा की जाएगी। इस दौरान बस्तर राज परिवार के सदस्य माता की डोली और छत्र का स्वागत करने पहुंचेंगे।

माता की डोली और छत्र को जिस रास्ते से लाया जाएगा, वहां दोनों ओर पुलिस ने बैरिकेडिंग की है। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करना और व्यवस्था बनाए रखना है।

माता के स्वागत के लिए जगह-जगह फूल बिछाए गए थे।

माता के स्वागत के लिए जगह-जगह फूल बिछाए गए थे।

राज परिवार के सदस्य खुद डोली उठाकर लाएंगे राजमहल

बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार, मावली परघाव की रस्म के दौरान सबसे पहले माता को सलामी दी जाएगी। इसके बाद माता को विराजमान कराया जाएगा। जिया बाबा की ओर से डोली के पहुंचने की सूचना मिलने पर वे वहां पहुंचेंगे।

इसी दिन जोगी उठाई की रस्म भी होती है। बस्तर के सभी देवी-देवताओं के देव विग्रहों के साथ वे वहां पहुंचकर माता का सम्मानपूर्वक स्वागत करेंगे। इसके बाद वे खुद माता की डोली उठाकर राजमहल लेकर आएंगे।

गीदम में भव्य स्वागत किया गया।

गीदम में भव्य स्वागत किया गया।

मावली परघाव की रस्म बस्तर दशहरे की प्रमुख परंपराओं में से एक है। डोली को दोबारा उठाए जाने के साथ ही बस्तर दशहरे का समापन होता है। इस आयोजन में दंतेवाड़ा से पुजारी, सेवादार और अन्य लोग शामिल होते हैं।

पंचमी के दिन माता को दिया जाता है न्योता

बस्तर दशहरे की परंपरा के अनुसार, पंचमी के दिन माता को राजमहल आने का निमंत्रण दिया जाता है। मान्यता है कि माता ने महाराजा से कहा था कि वे पंचमी के दिन ही न्योता स्वीकार करेंगी। इसी वजह से पंचमी का विशेष महत्व है।

दर्शन करने लोगों की भीड़ उमड़ी।

दर्शन करने लोगों की भीड़ उमड़ी।

इस दिन राज परिवार के सदस्य मां दंतेश्वरी के दरबार पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं और माता को अपने साथ राजमहल चलने का निमंत्रण देते हैं। कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार, मां दंतेश्वरी राज परिवार की कुलदेवी हैं।

कुमकुम से लिखा जाता है निमंत्रण पत्र

माता को दिए जाने वाले निमंत्रण पत्र की भी विशेष परंपरा है। पहले निमंत्रण चांदी के पत्रक पर लिखा जाता था, लेकिन अब एक चमकीले और बेहद पतले कपड़े पर निमंत्रण लिखा जाता है। इस पर स्याही या किसी पेन का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि कुमकुम से निमंत्रण लिखा जाता है।

जगह-जगह लोगों ने पूजा अर्चना भी की।

जगह-जगह लोगों ने पूजा अर्चना भी की।

बस्तर दशहरे की इन पारंपरिक रस्मों में माता की डोली और छत्र का स्वागत, पूजा-अर्चना और राज परिवार की सहभागिता का विशेष महत्व है। मावली परघाव की रस्म के साथ माता का राजमहल में आगमन होता है और बस्तर की विशिष्ट दशहरा परंपरा आगे बढ़ती है।