1966 में रिलीज हुई Love in Tokyo से हिंदी सिनेमा में मनोरंजन के एक सुनहरे अध्याय की शुरुआत हुई थी। फिल्म के 60 साल पूरे होने पर जानिए इससे जुड़े दिलचस्प किस्से...

जापान में शूट हुई पहली हिंदी फिल्म। फोटो क्रेडिट- यूट्यूब

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संक्षेप में पढ़ें
संजीत नार्वेकर, मुंबई। आज का फिल्मी किस्सा कुछ यहां से शुरु होता है कि फिल्म 'लव इन टोक्यो' (Love In Tokyo) के रिलीज होते ही एक लेखक ने निर्माता-निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती (चक्की दा) को कानूनी नोटिस भेजकर दावा किया कि फिल्म की कहानी उनकी है। चक्की दा ने तुरंत उन्हें फाइव स्टार होटल में दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया।
लेखक हैरान था कि अदालती दुश्मन होने के बावजूद उनके साथ ऐसा शाही व्यवहार क्यों हो रहा है? चक्की दा ने हंसते हुए जवाब दिया, "मैं आपका शुक्रगुजार हूं क्योंकि आप पहले शख्स हैं जिसने माना कि मेरी फिल्म में कोई कहानी भी है, वरना सारे समीक्षक तो कह रहे हैं कि इसमें कहानी नाम की कोई चीज ही नहीं है।"
जॉय और आशा का जादू
यह घटना भले ही काल्पनिक लगे, लेकिन यह 20वीं शताब्दी के छठे दशक के उस पलायनवादी सिनेमा को बखूबी बयां करती है, जिसे मुखर्जी भाइयों (शशाधर और सुबोध) और नासिर हुसैन (Nasir Hussain) ने गढ़ा था। आजादी के ठीक बाद दर्शक उपदेशात्मक और गंभीर पारिवारिक ड्रामों से थक चुके थे। उन्हें अब हल्की-फुल्की कॉमेडी, चुलबुले रोमांस और गुनगुनाने योग्य संगीत की तलाश थी, जो 'तुमसा नहीं देखा' और 'दिल देके देखो' से शुरू हुई।

साल 1961 में आई 'जंगली' ने इसमें रंग भर दिए और मनोरंजन का यह कारवां चल निकला। प्रमोद चक्रवर्ती इस सिनेमा की कतार में थोड़े देर से शामिल हुए। गुरु दत्त के साढ़ू भाई होने के नाते उन्होंने शुरुआत में 'ओ क्लॉक' और 'पासपोर्ट' जैसी मिस्ट्री फिल्में बनाई थीं। लेकिन 1964 में 'जिद्दी' के साथ उन्होंने अपनी शैली बदली।
साल 1966 में आई 'लव इन टोक्यो' असल में इसी 'जिद्दी' की अगली कड़ी जैसी थी। दोनों ही फिल्मों में जॉय मुखर्जी (शशाधर मुखर्जी के बेटे) और आशा पारेख (Asha Parekh) की बेहद लोकप्रिय जोड़ी मुख्य भूमिका में थी, जो उस दौर के युवा दिलों की धड़कन बन चुके थे।
मनोरंजन का पूरा पैकेज
फिल्म की कहानी नायक अशोक (जॉय मुखर्जी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने अनाथ भतीजे चीकू को लेने टोक्यो जाता है। वहां उसकी मुलाकात आशा (आशा पारेख) से होती है, जो जबरन शादी और विलेन प्राण (जो हमेशा की तरह दौलत के पीछे थे) से बचकर भागी है। भेष बदलने के खेल और गानों के बीच महमूद, शुभा खोटे और धूमल की मशहूर तिकड़ी ने हास्य का तड़का लगाया।
इसमें महमूद और धूमल के दृश्य बाद में अमोल पालेकर और उत्पल दत्त की 'युवा-बुजुर्ग' वाली सदाबहार कॉमेडी की याद दिलाते हैं। इस फिल्म के पास एक और तुरुप का इक्का था-विदेशी लोकेशन। राज कपूर (Raj Kapoor) की 'संगम' (1964) के बाद यह विदेशी धरती पर शूट होने वाली दूसरी और जापान में फिल्माई जाने वाली पहली हिंदी फिल्म थी।

जहां 'संगम' में सिर्फ हनीमून का एक हिस्सा विदेश में था, वहीं चक्की दा ने गुरु दत्त की फिल्मों के दिग्गज कैमरामैन वी.के. मूर्ति की सिनेमैटोग्राफी के जरिए टोक्यो के हिबिया पार्क, इंपीरियल पैलेस, टोक्यो टावर और हिरोशिमा की हसीन वादियों को गानों में पिरो दिया। इसके बाद तो 'अराउंड द वर्ल्ड' और 'इवनिंग इन पेरिस' जैसी फिल्मों की कतार लग गई।
कालजयी संगीत की धुन
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका कर्णप्रिय संगीत था, जिसे शंकर-जयकिशन ने अपने करियर के चरम पर तैयार किया था। हसरत जयपुरी ने फिल्म के लगभग सभी गाने लिखे, जिनमें लता मंगेशकर का गाया 'सायोनारा' और मोहम्मद रफी का टाइटल ट्रैक 'जापाआआन... लव इन टोक्यो' आज भी लोगों की जुबान पर है।
केवल 'कोई मतवाला आया' गाना शैलेंद्र ने लिखा था, क्योंकि वे उस वक्त 'तीसरी कसम' के निर्माण में व्यस्त थे। दिलचस्प बात यह है कि भारत को 'मोशी-मोशी' (हेलो) और 'सायोनारा' (बाय-बाय) जैसे जापानी शब्दों से इसी फिल्म ने मिलवाया था। इस फिल्म का एक अनोखा असर ठीक पचास साल बाद दिखा।
टोक्यो में रहने वाले एडोब जापान के अधिकारी और फोटोग्राफी के शौकीन मनीष प्रभुणे ने, जिन्होंने बचपन में इस फिल्म को देखा था, इसके शूटिंग लोकेशंस को दोबारा तलाशने का बीड़ा उठाया। उन्होंने 1966 के टोक्यो और 2016 के आधुनिक टोक्यो की तुलनात्मक तस्वीरें कैमरे में कैद कीं। यह उस ऐतिहासिक फिल्म की गोल्डन जुबली मनाने का एक बेहद अनूठा और जज्बाती तरीका था, जिसने पहली बार भारत को जापान से मिलवाया था।