पटना की हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट बांकीपुर में हुए उपचुनाव को जनसुराज के प्रशांत किशोर ने 19,246 वोटों के अंतर से जीत लिया है।
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32 राउंड की गिनती में पीके को 64117 (49.23%) और भाजपा के नीरज कुमार को 44794 (34.4%) वोट मिले। 14263 (10.95%) वोट लाकर राजद की रेखा गुप्ता तीसरे नंबर पर रहीं।
भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट हार गई। 30 साल बाद यह सीट भाजपा के हाथ से निकली। भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद ब्राह्मण और भूमिहार समाज की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी है। नीट पेपर लीक के बाद हुए विरोध प्रदर्शन के चलते GEN-Z ने जनसुराज के लिए खुलकर वोट दिया।
भाजपा क्यों अपने गढ़ में हार गई? प्रशांत किशोर क्यों जीते? 9 पॉइंट में जानिए…।
1- भरत तिवारी एनकाउंटर, ब्राह्मण और भूमिहार समाज की नाराजगी
भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर ब्राह्मण और भूमिहार वोट बैंक में सम्राट सरकार के खिलाफ काफी नाराजगी थी। इन्हें बीजेपी का कोर वोट बैंक माना जाता है। उपचुनाव को ब्राह्मण और भूमिहार मतदाताओं ने अपना गुस्सा प्रकट करने के मौके के रूप में इस्तेमाल किया। इसमें राजपूत वोट बैंक ने भी मदद कर दी।
प्रशांत किशोर पीड़ित परिवारों से मिले। बांकीपुर के अलग-अलग मोहल्लों की सवर्ण बहुल सोसायटियों, क्लबों और व्यापारिक मंडलों के साथ छोटी-छोटी बैठक की। लोगों को समझाया कि भाजपा शासन में जहानाबाद की नीट छात्रा हत्याकांड और आरा के भरत तिवारी का एनकाउंटर हुआ। किसी को न्याय नहीं मिला। भाजपा ने कथित तौर पर एक कम पढ़े लिखे और आपराधिक चरित्र वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया है।

प्रशांत किशोर ने भरत तिवारी के परिजनों से मुलाकात की थी। (फाइल तस्वीर)
प्रशांत किशोर ने अपनी जनसभाओं में लोगों को समझाया कि भाजपा ने आपको 'टेकन फॉर ग्रांटेड' ले लिया है। ब्राह्मण समाज (सवर्ण) से आने वाले प्रशांत किशोर ने लोगों के बीच 'राइट पीपल, राइट थिंकिंग' (सही लोग, सही सोच) का अपना विचार बताया। व्यवस्था में बदलाव के लिए वोट की अपील की।

नोट- आबादी का प्रतिशत लगभग में है।
2- जेन-जी फैक्टर, छात्रों पर चली लाठी का युवाओं ने लिया बदला
बांकीपुर चुनाव ऐसे वक्त हुआ जब दिल्ली में नीट पेपर लीक को लेकर जेन-जी आंदोलन चला। धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। 20 जुलाई को दिल्ली में नीट पेपर लीक के विरोध में उग्र प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों की भीड़ संसद के दरवाजे तक पहुंची। 5 आईपीएस समेत 118 पुलिसकर्मी और 60 से ज्यादा प्रदर्शनकारी घायल हुए।
22 जुलाई को पटना में नीट पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन किया। पुलिस ने लाठीचार्ज और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। आंसू गैस के गोले दागे। झड़प में आईजी जितेंद्र राणा समेत एक दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। लाठीचार्ज में करीब 10 छात्र भी जख्मी हुए।
23 जुलाई को पटना समेत कई जिलों में हंगामा और हिंसक झड़पें हुईं। 25 जुलाई को बिहार बंद बुलाया गया। इस दौरान पटना, सीवान, छपरा व भागलपुर में पुलिस पर हमले हुए। सीवान और सीतामढ़ी के एसपी घायल हो गए।
20 से 25 जुलाई तक हुए उग्र प्रदर्शन को लेकर पुलिस ने 694 छात्रों को हिरासत में लिया, 335 को जेल भेजा। बाद में सरकार ने छात्रों पर दर्ज FIR वापस लिए और जेल से रिहा किया।
इसके चलते युवाओं में बीजेपी के प्रति नाराजगी उपजी। प्रशांत ने छात्रों के आंदोलन को समर्थन दिया। युवाओं ने बदलाव के लिए जन सुराज को चुना। बांकीपुर में मतदाताओं की कुल संख्या 3,79,616 है। 53,419 वोटर 18 से 29 साल के हैं। निर्वाचन विभाग के अनुसार 30 जुलाई को 1,30,208 वोट डाले गए। वोट डालने घर से निकले लोगों में युवाओं की संख्या अधिक थी। युवा वोटर भले कुल मतदाताओं के 14% हिस्सा थे, लेकिन कुल 34.30% वोटिंग में इनकी हिस्सेदारी अधिक थी।

26 जुलाई को नीट पेपर लीक मामले को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया था।
3- कुर्मी वोट बैंक की नाराजगी
कुर्मी वोट बैंक में दो तरह की नाराजगी रही। नीतीश कुमार को बीजेपी ने जिस तरह से CM की कुर्सी से हटाया और वे राज्यसभा गए। उससे कुर्मी वोट बैंक में नाराजगी है। निशांत कुमार की एंट्री राजनीति में हुई। वह विधान परिषद गए, मंत्री बनाए गए, लेकिन कुर्मियों की नाराजगी दूर नहीं हुई।
12 टाउनशिप के निर्माण के लिए सरकार ने जमीन की खरीद बिक्री पर रोक लगा दी। इसका असर सवर्ण वोट बैंक के साथ ही कुर्मी वोट बैंक पर काफी पड़ा। ये ऐसा वर्ग है जो अपनी जमीनों पर ऐसी बंदिश बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। इसको लेकर इनके अंदर गुस्सा है।
4- नाराज नेताओं को अपनी ओर किया
पीके ने बीजेपी और आरजेडी के कई नाराज नेताओं को अपनी तरफ किया। अति पिछड़ा नेता रामबली चंद्रवंशी की सदस्यता आरजेडी ने बिहार विधान परिषद से खत्म करवा दी। इसके बाद रामबली जन सुराज के साथ चले गए।
पीके ने उन्हें बांकीपुर उपचुनाव का प्रभारी बनाया। शक्तियां नहीं दी तो रामबली गुस्सा हो गए। अंतिम समय में पीके ने रामबली को मना लिया। बांकीपुर विधानसभा में चंद्रवंशियों के वोट बैंक को अपनी तरफ करने में पीके कामयाब रहे।
5- एक महीने में 150 चाय पर चर्चा, 50 जनसभाएं
पीके ने ताबड़तोड़ चुनावी जनसभाएं की। 30 दिन में हर दिन 5 चाय पर चर्चा और 2 जनसभा की। राजद से अधिक बीजेपी को टारगेट पर लिया। सम्राट चौधरी पर खूब हल्ला बोला। घर-घर जाकर वोट मांगा।
जनता से बार-बार कहते रहे कि अपने बच्चों के लिए वोट करिए, सरकार को बदलने के लिए वोट कीजिए। यह नैरेटिव गढ़ने में लगे रहे कि उनकी जीत होगी तो बीजेपी बिहार में मुख्यमंत्री बदल देगी।
दूसरा बड़ा नैरेटिव गढ़ा कि बीजेपी वाले तो कहते रहते हैं कि कुत्ता-बिल्ली किसी को यहां से टिकट देंगे तो वह जीत जाएगा। ऐसा बोलकर प्रशांत ने वोट बैंक का विस्तार किया। बीजेपी ने ऐसा उम्मीदवार दिया जो ठीक से अपनी बात भी नहीं रख पा रहा था।
6- नितिन नवीन की खामियों को गली-गली गिनाया
प्रशांत किशोर की टीम गली-गली घूमती रही और दिखाती रही कि साफ-सफाई, सड़क और जल जमाव की स्थिति कैसी है। पीके खुद भी इसे नितिन नवीन का फेल्योर बताते रहे, जबकि यह काम नगर निगम के जिम्मे आता है। पीके लोगों को यह समझाने में कामयाब रहे कि विधायक का दायित्व भी होता है कि इसे देखे।
बांकीपुर पटना का एक प्रमुख शहरी इलाका है। प्रशांत किशोर और उनकी टीम पारंपरिक जातिगत नारों के बजाय ड्रेनेज/जलजमाव की समस्या, ट्रैफिक प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर, हायर एजुकेशन और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दों को उठाया। लोगों को मिलने वाली सुविधा पर ध्यान दिलाया।

7- मंदिर-मंदिर माथा टेका, अपनी छवि बदली
बांकीपुर उपचुनाव के लिए प्रशांत किशोर ने अपनी छवि बदली। 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार यात्रा के दौरान जो PK माथे पर तिलक लगाने के चंद सेकेंड बाद उसे पोंछते नजर आए थे उन्होंने मंदिरों के चक्कर लगाए।
प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद ही मंदिर-मंदिर जाना और पूजा करना शुरू कर दिया। वह माथे पर त्रिपुंड लगाए नजर आए। इस तरह आम वोटर खास तौर से सवर्णों और वैश्य वोटर को रिझाया। सिर के बढ़े बालों को चोटी जैसा आकार दे दिया। सवर्णों के यह कनेक्ट करता रहा।
8- यादव-मुस्लिम वोट डायवर्ट किया
यादवों और मुसलमानों को लग गया कि तेजस्वी यादव ठीक से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वे दो दिन के रोड शो पर निकले बाकी ज्यादातर समय विदेश में रहे। विधानसभा के मानसून सत्र से भी पूरी तरह से गायब रहे।
यादवों के एक बड़े हिस्से को लगा कि बीजेपी से जन सुराज ही लड़ रही है। यही वजह है कि यादव वोट बैंक का एक हिस्सा जन सुराज की तरफ ढल गया। मुसलमानों में तेजस्वी को लेकर तो नाराजगी है ही। विधानसभा चुनाव के समय महागठबंधन की ओर से अतिपिछड़ा नेता मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री का फेस घोषित किया गया, लेकिन किसी मुसलमान फेस की घोषणा नहीं की।
उसी समय यह बात गूंजी थी कि क्या मुसलमान सिर्फ चादर बिछाने के लिए हैं। दुजरा और सब्जीबाग इलाकों में जनसुराज ने काफी मेहनत की और मुसलमान वोट बैंक के बड़े हिस्से को अपनी तरफ करने में कामयाब रहे।
मुसलमानों को भी लगा कि आरजेडी को वोट देने का मतलब वोट बर्बाद करना है। बीजेपी को रोकना है तो जनसुराज को वोट देना होगा। पीके लगातार बीजेपी पर हमलावर रहे, तेजस्वी पर नहीं, इसका भी असर रहा।
वोटिंग से एक दिन पहले जनसुराज के कार्यकर्ता को डिटेन करने के सवाल पर प्रशांत किशोर पुलिस थाना पहुंच गए और वहां डट गए। थाना प्रभारी पर गुस्सा दिखाया। इससे मैसेज गया कि प्रशांत कार्यकर्ता के लिए खड़ा रहने वाले नेता हैं। वोटर में मैसेज गया कि प्रशांत शासन-प्रशासन से डरने वाले नेता नहीं हैं।

प्रशांत किशोर को मिली बढ़त के बाद पार्टी कार्यकर्ता जश्न मनाते हुए।
9- उपचुनाव से फायदा, एक ही सीट पर लगाना था पूरा संसाधन
बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर का दावा था कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को 25 से ज्यादा सीटें मिल जाएंगी तो वे राजनीति छोड़ देंगे। उस चुनाव में जेडीयू को 85 सीटों पर जीत मिली।
प्रशांत किशोर की पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। प्रशांत ने राजनीति नहीं छोड़ी और तय किया कि बांकीपुर उपचुनाव लड़ेंगे। इसमें उनके सामने सहुलियत यह थी कि पूरे बिहार पर फोकस करने की जरूरत नहीं थी। एक सीट पर अपना पूरा संसाधन लगा दिया।
नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद सीट खाली हुई थी। बीजेपी ने मंडल स्तर के कार्यकर्ता नीरज सिन्हा को उतारा। बीजेपी ने पूरी ताकत लगाई। केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक के मंत्री चुनाव प्रचार में आए, लेकिन प्रशांत एग्रेसिव होकर लड़े और बीजेपी के 30 साल के किले को गिरा दिया।
प्रशांत सरकार की ही मुश्किल नहीं बढ़ाएंगे, बल्कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सामने भी चुनौती हैं। कांग्रेस की जो लाचारी कई बार आरजेडी के साथ रहने की दिखती रही है उसे भी राहत मिलने की गुंजाइश है। यानी प्रशांत की जीत के साथ बिहार की राजनीति कई तरह से बदलेगी।
बीजेपी का माइक्रो मैनेजमेंट ध्वस्त हो गया
वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह कहते हैं, ‘ग्राउंड में पीके का असर था। बीजेपी का माइक्रो मैनेजमेंट ध्वस्त हो गया। पीके के विरोध में कुछ नहीं था, सब कुछ उनके पक्ष में ही था। कास्ट और रिलीजन से ऊपर उठ कर लोगों ने जनसुराज को वोट किया।’

वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने कहा, ‘प्रशांत किशोर की जीत का सबसे बड़ा कारण बीजेपी और तेजस्वी यादव का अहंकार है। यादव और मुसलमान प्रशांत की तरफ चले गए। आरा कांड का असर पड़ा। कॉकरोच पार्टी के आंदोलन का असर भी पड़ा।’

वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क ने कहा, ‘ओपिनियन पोल के अनुसार बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे आए हैं। मीडिया रिपोर्ट में ये बात सामने आ रही थी कि प्रशांत किशोर बीजेपी के उम्मीदवार पर भारी पड़ेंगे।’