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प्रदुमन कौशिक | बुलंदशहर2 घंटे पहले
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47 साल बाद फैसला, 140 बोरी गेहूं गबन के आरोप से बुजुर्ग चौकीदार बरी।
भारतीय न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। बुलंदशहर के पहासू थाने में वर्ष 1979 में दर्ज हुए 140 बोरी सरकारी गेहूं गबन के बहुचर्चित मुकदमे में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कक्ष संख्या-द्वितीय) की पीठासीन अधिकारी कोमल शुक्ला ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर आरोपी चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा को सभी आरोपों से बाइज्जत दोषमुक्त कर दिया। मामले के मुख्य आरोपी केंद्र प्रभारी राजवीर की दौरान-ए-मुकदमा मौत हो चुकी है।
13 जुलाई 1979 को पहासू गेहूं खरीद केंद्र से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदाम के लिए ट्रक संख्या यूएसएल 6735 से 140 बोरी गेहूं भेजा गया था। आरोप था कि तत्कालीन करीब 19,000 रुपये कीमत का यह गेहूं एफसीआई गोदाम पहुंचा ही नहीं और रास्ते में ही गबन कर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिए गए।
एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट दाखिल
इस मामले में पुलिस ने केंद्र प्रभारी राजवीर और ट्रक के साथ भेजे गए अस्थाई चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा (निवासी साबितगढ़) के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट दाखिल की थी। वर्ष 1999 में आरोपियों पर आरोप तय हुए, लेकिन सुनवाई के दौरान ही केंद्र प्रभारी की मृत्यु हो गई।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष का केस धराशायी
(एलएडीसीएस) के सहायक पुष्पेंद्र कुमार सिंह ने अदालत में बुजुर्ग की बेगुनाही की पैरवी की। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष का केस तब धराशायी हो गया जब संभागीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) के रिकॉर्ड से खुलासा हुआ कि जिस वाहन संख्या (यूएसएल 6735) को ट्रक बताया गया था, वह वास्तव में एक एंबेसडर कार के नाम दर्ज थी।
अदालत ने माना कि एंबेसडर कार में 140 बोरी गेहूं लादना संभव ही नहीं है। इसके अलावा गवाह फर्जी चालान पर हस्ताक्षर की पुष्टि करने में भी नाकाम रहे। घटना के समय नरेशचन्द्र महज 190 रुपये मासिक मानदेय पर काम करते थे।
47 साल बाद बेगुनाही का फैसला
जवानी से लेकर बुढ़ापे तक, जिंदगी का आधा हिस्सा तारीखों और अदालती चक्करों में बीत गया। ढलती उम्र और गरीबी के बीच जब आस टूटने लगी, तब लीगल एड ने उनका सहारा बनकर मुफ्त कानूनी लड़ाई लड़ी। 47 साल बाद बेगुनाही का फैसला आने पर बुजुर्ग और उनके परिवार ने राहत की सांस ली है।
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