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सालाना महज 684.9 यूनिट बिजली खपत के दावे के साथ बेचा गया एसी हकीकत में 4.21 गुना ज्यादा बिजली खींचने लगा। लगातार शिकायतों के बावजूद जब ई-कॉमर्स कंपनी ने न तो उपकरण सुधारा और न ही बदला, तो मामला उपभोक्ता आयोग पहुंच गया। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने फ्लिपकार्ट समेत 4 कंपनियों को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए पीड़ित के पक्ष में कड़ा फैसला सुनाया है।
गुना निवासी शिकायतकर्ता ने मई 2025 में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म फ्लिपकार्ट से ₹19,990 में 'मार्क 1 टन 3 स्टार स्प्लिट इनवर्टर एसी' खरीदा था। कंपनी ने इसके विज्ञापन में दावा किया था कि यह सालभर में केवल 684.9 यूनिट बिजली खाएगा। लेकिन घर में लगाने के कुछ ही दिनों बाद बिजली की भारी खपत होने लगी। जब विद्युत मापक यंत्र से जांच कराई गई तो सामने आया कि एसी प्रति घंटे 1.8 यूनिट बिजली खींच रहा था। इस हिसाब से अगर एसी रोजाना 12 घंटे चलाया जाए, तो महीने में ही करीब 432 यूनिट खपत हो जाती।
15 से ज्यादा शिकायतें, 10 बार आए तकनीशियन; फिर भी हल नहीं निकला पीड़ित ने फ्लिपकार्ट के डिजिटल माध्यम (पोर्टल) पर 15 से ज्यादा शिकायतें दर्ज कराईं। लगभग 10 बार कंपनी के प्राविधिक (तकनीशियन) जांच करने घर पहुंचे। पड़ताल में सामने आया कि एसी महज 15-20 मिनट चलता था और मुख्य पुर्जे (कंप्रेसर) में खराबी के कारण घर का स्वचालित बिजली नियंत्रक (एमसीबी) गिर जाता था। कंपनी ने एक बार एसी बदला भी, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही। इसके बाद कंपनियों ने ग्राहक की शिकायतों पर ध्यान देना ही बंद कर दिया।
कंपनियों ने कोर्ट के नोटिस का नहीं दिया जवाब, एकतरफा फैसला आयोग के अध्यक्ष सुरेश कुमार चौबे और सदस्य सुमीना आर्य की पीठ ने मोंटाना इलेक्ट्रॉनिक्स, एम/एस डी.आर. फ्लिपकार्ट, फ्लिपकार्ट इंटरनेट प्राइवेट लिमिटेड और एपेक्स कंज्यूमर केयर प्राइवेट लिमिटेड को पक्ष रखने के लिए सूचना पत्र (नोटिस) जारी किया था। लेकिन किसी भी कंपनी ने आयोग में कोई जवाब या दस्तावेज जमा नहीं कराए। इसके बाद अदालत ने एकतरफा सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया।
आयोग का सख्त आदेश: 2 महीने में राहत दें, नहीं तो 9% ब्याज लगेगा सुधारें या नया दें: आयोग ने कंपनियों को दो महीने के भीतर उपकरण नि:शुल्क सुधारने या उसी प्रारूप (मॉडल) का नया एसी देने का आदेश दिया है। रकम वापसी: ऐसा न करने पर क्रय राशि ₹19,990 को 7% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाना होगा। हर्जाना: मानसिक-शारीरिक कष्ट के लिए ₹5,000, मुकदमा व्यय ₹2,000 और अधिवक्ता शुल्क ₹3,000 (कुल ₹10,000) अतिरिक्त देने होंगे। दंड (पेनाल्टी): यदि कंपनियां दो महीने के भीतर यह भुगतान नहीं करती हैं, तो ब्याज की दर बढ़ाकर 9% प्रतिवर्ष कर दी जाएगी।