35 साल बाद इंदौर फिर बनेगा राजनीति का पॉवर सेंटर: 1991 में राजीव गांधी के लिए रातभर जागा था शहर अटलजी को सुनने राजबाड़ा चौक पड़ गया था छोटा - Indore News

Published on 16 सित॰ 2026

इंदौर28 मिनट पहलेलेखक: गौरव शर्मा

  • कॉपी लिंक

इंदौर एक बार फिर देश की राजनीति का केंद्र बिंदु बनने जा रहा है, जहां 17 से 19 सितंबर के दौरान भाजपा, संघ और कांग्रेस के दिग्गजों की मौजूदगी रहेगी। करीब 35 साल पहले 1991 के दौर में राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर जैसे शीर्ष नेताओं की मौजूदगी से शहर में सियासी हलचल हुई थी।

इस बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक के बाद एक दौरों ने इंदौर को फिर राजनीति का पॉवर सेंटर बना दिया है। तीन अलग-अलग विचारधाराओं के इन शीर्ष स्तंभों के जुटने से न केवल मालवा-निमाड़, बल्कि देश की भावी सियासत के समीकरण तय होंगे।

जब लोटे से पानी पीकर राजीव जी ने टीआई को लगा लिया गले

1991 में राजीव गांधी इंदौर में राजबाड़ा की आमसभा को संबोधित करने आए। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष गंगाराम तिवारी ने मुझे संचालन सौंपा। शाम 7 बजे की सभा के लिए जगह-जगह स्वागत के कारण राजीव जी को एयरपोर्ट से राजबाड़ा पहुंचने में 9 घंटे लग गए।

गोराकुंड पर राजीव जी ने पानी मांगा। साथी मदन थलौरे पीतल के लोटे में पानी लाए, जिसे उन्होंने पिया। तभी सुरक्षा ड्यूटी में तैनात टीआई भूपेंद्र शुक्ला ने एक कार्यकर्ता को धक्का दिया तो राजीव जी नाराज हो गए। कृपाशंकर शुक्ला के यह बताने पर कि ‘अधिकारी अपने ही हैं’, राजीव जी ने टीआई का हाथ पकड़कर कहा- ”आप तो हमारे परिवार के हैं, साथ चलिए।” - केके मिश्रा, वरिष्ठ कांग्रेस नेता

जब अटलजी के राजनीतिक ‘तेवर व तंज’ सुनने थम जाते थे विरोधी

अटलजी जब मंच पर आते थे, तो उन्हें सुनने के लिए भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विरोधी दलों के लोग भी खिंचे चले आते थे। उनकी भाषा में पैना राजनीतिक तेवर होने के साथ-साथ अद्भुत हास्य, व्यंग्य और सहजता का समावेश होता था। यही वजह थी कि उनके घोर राजनीतिक विरोधी भी उनके भाषण की मिठास और तंज सुनने के लिए रास्ते में रुक जाते थे।

आज के सोशल मीडिया और डिजिटल कैंपेन के दौर से राजबाड़ा का वह दौर बिलकुल अलग था। तब नेता सीधे जनता के सामने मंच पर होते थे और लोग घंटों बिना हिले-डुले खड़े रहकर उन्हें सुनते थे। - सत्यनारायण सत्तन, वरिष्ठ भाजपा नेता

35 सालों में क्या बदला... कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश मिंडा कहते हैं 35 सालों में राजनीति पूरी तरह से बदल गई है। पहले बड़ा माध्यम जनसभा, पोस्टर, जुलूस थे। आज वही राजनीति सोशल मीडिया, लाइव प्रसारण, डिजिटल कैंपेन और सीधे युवा संवाद तक पहुंच गई है। तब राजीव गांधी और अटलजी को सुनने के लिए लोग घंटों सड़कों पर खड़े रहते थे।

अब युवाओं, लोगों से सीधे संवाद हो रहा है। लेकिन एक चीज नहीं बदली वह है इंदौर का राजनीतिक महत्व। इतने अंतराल में चेहरे बदल गए, मुद्दे बदल गए, राजनीति का तरीका बदल गया, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के नक्शे पर इंदौर की जगह कायम है।

इसलिए अहम है इंदौर

  • प्रकाशचंद्र सेठी : इंदौर की राजनीति में एक समय केंद्र में थे। दो बार मुख्यमंत्री रहे। सांसद रहे। केंद्र में गृह मंत्री, रक्षा मंत्री जैसे पदों पर रहे। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी नेताओं में माने जाते थे।
  • होमी दाजी : कॉमरेड व मजदूर आंदोलन के प्रमुख नेता रहे। 1957 में विधानसभा पहुंचे। 1962 में सांसद चुने गए। कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। संसद में मजदूरों की आवाज को प्रमुखता से उठाया।
  • सुमित्रा महाजन: महाजन 1989 से लगातार आठ बार इंदौर की सांसद रही। केंद्रीय मंत्री रहीं। लोकसभा स्पीकर भी रही। महाजन ने लगातार जीत का रिकॉर्ड भी बनाया।
  • कैलाश विजयवर्गीय : इंदौर में महापौर रहे। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बने। हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पार्टी संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली। विधानसभा-4, विधानसभा-2, महू से विधायक रहे। वर्तमान में विधानसभा-1 से विधायक हैं।
  • दिग्विजय सिंह : स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई इंदौर से ही की। सामाजिक, राजनीतिक जुड़ाव काफी रहा। मध्यप्रदेश के 10 साल तक सीएम रहे।
  • 2010 : इंदौर में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सभा भी हो चुकी
  • 17 से 20 फरवरी 2010 : इंदौर मे बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की तीन दिनी बैठक भी हुई थी। उस समय नितिन गडकरी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।

.