इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को महज 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत देने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए संबंधित पीठासीन अधिकारी से उचित स्पष्टीकरण मांगा। हाईकोर्ट ने कहा कि इतने कम समय के लिए सुरक्षा देने का कोई स्पष्ट कारण आदेश में दर्ज
.
जस्टिस मदन पाल सिंह की कोर्ट ने सुरेश यादव और दो अन्य की ओर से दाखिल बीएनएसएस की धारा 528 के तहत याचिका पर सुनवाई कर रही है।
आजमगढ़ का मामला याचिका में आजमगढ़ की एडिशनल सेशंस कोर्ट नंबर-1 के 23 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है।ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों की अग्रिम जमानत मंजूर तो की लेकिन उनकी गिरफ्तारी से सुरक्षा सिर्फ 30 दिनों तक सीमित की। आरोपियों की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि इतनी कम अवधि के लिए सुरक्षा देने का कोई औचित्य नहीं है।
खास तौर पर इसलिए कि जांच के दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया और चार्जशीट दाखिल होने तक भी उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि जिन अपराधों का आरोप लगाया गया, उनमें अधिकतम सजा सात साल से कम है। उन्होंने बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस का भी पालन किया था।
आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान बेंच के फैसले सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (एन सी टी दिल्ली) का हवाला देते हुए कहा कि सामान्य तौर पर अग्रिम जमानत उचित शर्तों के साथ मुकदमे की समाप्ति तक जारी रह सकती है। हाईकोर्ट ने इससे पहले 18 अगस्त 2026 को आरोपियों को अंतरिम सुरक्षा देते हुए ट्रायल कोर्ट से यह रिपोर्ट मांगी थी कि आखिर अग्रिम जमानत को केवल 30 दिनों तक सीमित करने का आधार क्या है? हाईकोर्ट ने गौर किया कि इस मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी थी और ट्रायल कोर्ट संज्ञान भी ले चुका था।
इसके बावजूद अग्रिम जमानत मंजूर करते समय ट्रायल जज ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सुरक्षा केवल 30 दिनों के लिए ही क्यों दी जा रही है।
ट्रायल जज तीन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण दें हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के आदेश का परिणाम यह हो सकता है कि 30 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपी को फिर से बेल के लिए आवेदन करना पड़े। हाईकोर्ट ने इसे अनावश्यक उत्पीड़न की स्थिति बताया। संबंधित ट्रायल जज ने 3 सितंबर 2026 को अपना स्पष्टीकरण दाखिल किया, लेकिन हाईकोर्ट उससे संतुष्ट नहीं हुआ।
अब हाईकोर्ट ने ट्रायल जज को तीन बिंदुओं पर उचित स्पष्टीकरण दाखिल करने का निर्देश दिया। जज से पूछा गया कि उन्होंने कितने मामलों में आरोपियों को 20, 30 या 40 दिनों जैसी सीमित अवधि के लिए जमानत दी है।
क्यो दी गई जमानत अदालत ने यह भी पूछा कि इस मामले में ऐसी कौन सी विशेष परिस्थितियां हैं, जिनके आधार पर आरोपियों को केवल 30 दिनों की अग्रिम जमानत देना उचित समझा गया, जबकि कथित अपराधों में अधिकतम सजा सात साल से कम थी और चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने तीसरा सवाल यह रखा कि 30 दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपियों से क्या अपेक्षा थी। क्या उन्हें ट्रायल जज के समक्ष आत्मसमर्पण कर दोबारा अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना है।
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि अदालत अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार करते समय या तो उचित शर्तों के साथ मुकदमे के निष्कर्ष तक सुरक्षा दे सकती है या अपराध की गंभीरता समेत प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अर्जी खारिज कर सकती है। हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को दी गई अंतरिम सुरक्षा आगे भी जारी रखने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को होगी। रजिस्ट्रार (अनुपालन) हाईकोर्ट को आदेश की प्रति आवश्यक अनुपालन के लिए आजमगढ़ के जिला जज को भेजने का निर्देश दिया गया है।