झुंझुनूं की मिट्टी में आयरन-जिंक की कमी, सिर्फ 3% बचा: खेत बंजर होने का डर, गेहूं, सरसों, बाजरा और चना की पैदावार पर असर - Jhunjhunu News

Published on 7 अग॰ 2026

झुंझुनूं की उर्वर भूमि अब मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी के कारण बंजर होने की कगार पर पहुंच रही है। कृषि विभाग की मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में बीते डेढ़ साल में जिलेभर से लिए गए 12,814 मिट्टी के नमूनों की जांच में आयरन और जिंक की भारी कमी सामने आई है।

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कृषि विभाग की ओर से जिले के विभिन्न क्षेत्रों से मिट्टी के 12,814 नमूने लेकर उनकी जांच करवाई गई।

कृषि विभाग की ओर से जिले के विभिन्न क्षेत्रों से मिट्टी के 12,814 नमूने लेकर उनकी जांच करवाई गई।

आयरन-जिंक की कमी से फसलों का विकास प्रभावित

मिट्टी परीक्षण केंद्र के इंचार्ज मुकेश चाहर ने बताया कि जिले के हजारों खेतों में जिंक और आयरन जैसे जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी है। इसकी वजह से गेहूं, सरसों, बाजरा और चना जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

कृषि विभाग ने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से मिट्टी के 12,814 नमूने लेकर उनकी जांच करवाई है। इनमें 12,513 नमूनों में आयरन और 12,317 नमूनों में जिंक की कमी मिली है।

ऑर्गेनिक कार्बन घटने से बढ़ रही समस्या

मिट्टी परीक्षण केंद्र इंचार्ज मुकेश चाहर के अनुसार मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा लगातार घट रही है। इसके कारण आयरन और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ती जा रही है।

उन्होंने बताया कि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी के साथ क्षारीयता और लवणीयता की समस्या भी सामने आ रही है।

जिले के हजारों खेतों में जिंक और आयरन जैसे जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी है।

जिले के हजारों खेतों में जिंक और आयरन जैसे जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी है।

मिट्टी की जांच के बाद ही डालें खाद

मुकेश चाहर ने किसानों से मिट्टी की जांच करवाने के बाद ही जांच रिपोर्ट की सिफारिश के अनुसार फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल करने की सलाह दी है।

उन्होंने कहा कि खेतों में ज्यादा से ज्यादा गोबर की खाद, हरी खाद और अन्य ऑर्गेनिक कम्पोस्ट का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ और जैविक तत्व बने रहेंगे और आयरन-जिंक जैसे पोषक तत्वों की कमी को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

आयरन की कमी से नई पत्तियां पड़ने लगती हैं पीली

आयरन पौधों में क्लोरोफिल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी होने पर पौधों की नई पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। इससे पौधों का विकास प्रभावित होता है और फसल की पैदावार घट सकती है।

जिंक पौधों की बढ़वार और दानों के पूर्ण विकास के लिए जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व है। इसकी कमी से फसल कमजोर रह सकती है और दाने छोटे एवं कम विकसित हो सकते हैं।

मिट्टी परीक्षण केंद्र अधिकारी मुकेश चाहर।

मिट्टी परीक्षण केंद्र अधिकारी मुकेश चाहर।

असंतुलित रासायनिक खाद से मिट्टी की ताकत घट रही

केंद्र इंचार्ज मुकेश चाहर ने बताया कि मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट के पीछे असंतुलित रासायनिक खाद का इस्तेमाल भी एक कारण है। बिना मृदा परीक्षण करवाए केवल यूरिया यानी नाइट्रोजन का अत्यधिक इस्तेमाल मिट्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

  • फसल चक्र का अभाव: एक ही खेत में बार-बार एक ही तरह की फसल उगाने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ता है।
  • जैविक खाद की अनदेखी: गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट और हरी खाद का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं होने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ कम होते हैं।
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपेक्षा: जिंक और आयरन जैसे जरूरी तत्वों को खाद प्रबंधन में पर्याप्त मात्रा में शामिल नहीं किया जाता।

समय रहते सुधार नहीं किया तो बढ़ेगी लागत

यदि किसानों ने समय रहते वैज्ञानिक तरीके नहीं अपनाए तो आने वाले साल में अधिक रासायनिक खाद डालने के बावजूद उत्पादन में गिरावट आ सकती है।

कृषि लागत बढ़ने और फसल की गुणवत्ता घटने से किसानों की आय प्रभावित होगी। लगातार मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ने पर जिले की उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदलने का खतरा भी बढ़ सकता है।

मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए ये उपाय जरूरी

  • नियमित मृदा परीक्षण: किसानों को हर 2 से 3 साल में अपने खेत की मिट्टी की जांच करवानी चाहिए।
  • संतुलित उर्वरक प्रबंधन: यूरिया पर निर्भरता कम कर फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल करना चाहिए।
  • जैविक खाद का इस्तेमाल: गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट और हरी खाद का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए।
  • फसल चक्र अपनाएं: हर सीजन में अलग-अलग फसलें बोने से मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।
  • जिंक सल्फेट का इस्तेमाल: विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार खेत में जरूरत के मुताबिक जिंक सल्फेट और आयरन सप्लीमेंट का इस्तेमाल किया जा सकता है।