जबलपुर, 10 सितंबर 2026: हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश ने आज दांपत्य जीवन के एक महत्वपूर्ण विवाद का निराकरण करते हुए स्पष्ट कर दिया कि, पति की 25% इनकम पर पत्नी का हक होता है। यह अधिकार विवाह संबंध स्थापित होते ही प्रभावी हो जाता है। यदि दोनों अलग होते हैं तो पति को न केवल अपनी इनकम का 25% भरण पोषण देना होगा बल्कि अपनी इनकम का सबूत भी देना होगा।
श्रीमती प्रियांशु मिश्रा बनाम विनय मिश्रा मामले की पूरी कहानी एवं पृष्ठभूमि
प्रियांशु मिश्रा (याचिकाकर्ता/पत्नी) और विनय मिश्रा (अनावेदक/पति) का विवाह 17 जून 2019 को संपन्न हुआ था। वैवाहिक विवाद के चलते पत्नी 16 जनवरी 2020 से अपने माता-पिता के साथ अलग रह रही है। पत्नी ने 6 सितंबर 2021 को दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट, कटनी में भरण-पोषण के लिए आवेदन (MJCR No. 167/2021) दायर किया था। फैमिली कोर्ट कटनी के प्रधान न्यायाधीश ने 27 जून 2026 को आदेश पारित कर पत्नी के आवेदन को स्वीकार किया। कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पति की मासिक आय 1,50,000 रुपये निर्धारित की, लेकिन भरण-पोषण के रूप में केवल 30,000 रुपये प्रतिमाह की राशि तय की। साथ ही यह भरण-पोषण याचिका दायर करने की तिथि (06.09.2021) से न देकर 1 जून 2025 से लागू किया। फैमिली कोर्ट का मानना था कि मामले की कार्यवाही में देरी पत्नी के कारण हुई है।
फैमिली कोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर पत्नी ने अधिवक्ता प्रमेंद्र सिंह ठाकुर के माध्यम से हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने 8 सितंबर 2026 को इस पर फैसला सुनाया (Neutral Citation No. 2026:MPHC-JBP:68616)।
पत्नी के वकील श्री प्रमेंद्र सिंह ठाकुर के तर्क:
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि जब फैमिली कोर्ट ने स्वयं पति की मासिक आय 1,50,000 रुपये आंकी है, तो ऐसे में केवल 30,000 रुपये प्रतिमाह का भरण-पोषण तय करना अत्यंत कम (Meagre) और कानून के प्रतिकूल है। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष कि पत्नी ने प्रक्रिया में देरी की है, पूरी तरह गलत और परवर्स (Perverse) है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रजनीश बनाम नेहा मामले में स्थापित कानून के अनुसार, भरण-पोषण आवेदन की तिथि (06.09.2021) से ही मंजूर किया जाना चाहिए था।
पति का आचरण एवं पक्ष:
हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का अनुपालन न होने के कारण मामले को रिमांड करने से पहले अनावेदक/पति को नोटिस जारी करना आवश्यक नहीं समझा। रिकॉर्ड से उजागर हुआ कि फैमिली कोर्ट ने पति को अपनी सैलरी स्लिप पेश करने का निर्देश दिया था और 22 सितंबर 2025 को पति ने कोर्ट में सैलरी स्लिप देने का वचन (Undertaking) भी दिया था। इसके बावजूद उसने अपनी सैलरी स्लिप प्रस्तुत नहीं की, जो कि उसकी वास्तविक आय और वित्तीय क्षमता तय करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज था।
पत्नी के आचरण पर न्यायालय का रुख:
फैमिली कोर्ट ने 29 अप्रैल 2024 को पत्नी का अंतरिम भरण-पोषण आवेदन खारिज करते हुए नोट किया था कि वह बी.एससी. और एम.बी.ए. (B.Sc., M.B.A.) शिक्षित है तथा उसने घरेलू हिंसा अधिनियम (D.V. Act) की धारा 12 के तहत पहले से 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मिलने का तथ्य छिपाया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि तथ्य छिपाना सवालिया निशान खड़ा करता है, परंतु शपथ पत्र में घरेलू हिंसा की कार्यवाही का उल्लेख आने के कारण यह छिपाव बेअसर हो गया। साथ ही आदेश पत्रकों से सिद्ध हुआ कि 06.09.2021 से 29.04.2024 के दौरान पत्नी की ओर से कोई देरी नहीं की गई थी।
संबंधित कानून, धाराएं एवं लैंडमार्क जजमेंट्स
निर्णय के दौरान उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण अधिनियमों, धाराओं और सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों का उल्लेख किया:
Cr.P.C. की धारा 125 एवं 125(2): पत्नी, बच्चों व माता-पिता के भरण-पोषण तथा अंतरिम भरण-पोषण का कानूनी प्रावधान।
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (D.V. Act) की धारा 12: घरेलू हिंसा के मामलों में भरण-पोषण व राहत का प्रावधान।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 136 एवं 142: सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की बाध्यकारिता।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश X एवं आदेश XI (नियम 21): वित्तीय दस्तावेजों की प्रस्तुति, प्रश्नोत्तरी (Interrogatories) और आदेश न मानने पर प्रतिरक्षा (Defence) को निरस्त (Strike off) करने की शक्ति।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 एवं 165: जब तथ्य केवल किसी एक व्यक्ति (पति) के विशेष ज्ञान में हों, तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी उसी पर होती है।
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 191, 193, 199 व 209 (तथा Cr.P.C. धारा 340): न्यायालय के समक्ष झूठा शपथ पत्र जमा करने या तथ्य छिपाने पर झूठी गवाही (Perjury), अवमानना और 7 वर्ष तक के कारावास व जुर्माने का प्रावधान।
Landmark Judgments: पत्नी को भरण पोषण के मामले में
रजनीश बनाम नेहा एवं अन्य ((2021) 2 SCC 324)
सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला जिसमें देश के सभी फैमिली कोर्ट्स/मजिस्ट्रेट्स के लिए संपत्ति व देनदारियों के प्रकटीकरण का शपथ पत्र (Affidavit of Disclosure of Assets and Liabilities - Enclosure I) जमा करना अनिवार्य किया गया है। इसमें साफ किया गया है कि भरण-पोषण आवेदन की तिथि से ही देय होगा।
कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी नी नंदी ((2017) 14 SCC 200):
सुप्रीम कोर्ट का लैंडमार्क फैसला, जिसके तहत पति के शुद्ध वेतन का 25% या 1/4 भाग पत्नी के भरण-पोषण के लिए एक वाजिब राशि माना जाता है।
मोहित असवानी बनाम रेखा असवानी (2026 SCC OnLine MP 11678):
म.प्र. हाईकोर्ट का निर्णय, जिसमें कहा गया था कि आय छिपाकर अधूरा शपथ पत्र दाखिल करना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सीधा उल्लंघन है।
शैलेन्द्र राय बनाम श्रीमती प्रगति राय (Cr. Rev. No. 3769/2025):
म.प्र. हाईकोर्ट का निर्णय जिसमें स्थापित किया गया कि सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 के तहत जारी निर्देशों का पालन न करना न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के समान है।
सतलुज जल विद्युत निगम ((2019) 14 SCC 449) एवं राम चंद्र सिंह बनाम सावित्री देवी ((2003) 8 SCC 319):
धोखाधड़ी और तथ्य छिपाने (Fraud & Suppression) पर सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत "Fraud vitiates every solemn act" (धोखाधड़ी न्याय के हर पवित्र कार्य को दूषित कर देती है)।
ए.वी. पपैया शास्त्री बनाम ए.पी. राज्य ((2007) 4 SCC 221) एवं के.डी. शर्मा बनाम सेल ((2008) 12 SCC 481):
कपट से प्राप्त अदालती आदेश अमान्य होता है और अदालत के समक्ष गंदे हाथों (Soiled hands) या तथ्य छिपाकर आने वाले को राहत नहीं दी जा सकती।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय एवं विशेष टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट कटनी के 27.06.2026 के आदेश को निरस्त कर दिया। मामले को फैमिली कोर्ट कटनी के समक्ष मूल नंबर पर बहाल करते हुए पुनः विचार हेतु वापस भेज दिया। फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह पति की निर्धारित 1,50,000 रुपये मासिक आय के आलोक में 'कल्याण डे चौधरी' मामले के 25% वाले सिद्धांत तथा भरण-पोषण की देय तिथि (Payable Date) पर पुनः विचार कर नया आदेश पारित करे। अंतरिम व्यवस्था के तौर पर, नया फैसला आने तक पति 27.06.2026 के आदेशानुसार पत्नी को 30,000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान निरंतर करता रहेगा।
न्यायालय की विशेष टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि फैमिली कोर्ट को पति द्वारा सैलरी स्लिप पेश न करने पर उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकालना चाहिए था या उसकी प्रतिरक्षा को निरस्त (Strike off Defence) करने पर विचार करना चाहिए था।
केवल फॉर्म भरकर अधूरा शपथ पत्र जमा करना सुप्रीम कोर्ट के 'रजनीश बनाम नेहा' फैसले का अनुपालन नहीं माना जाएगा; सहायक दस्तावेज (जैसे फॉर्म 16, सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट) लगाना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति की आय 1.5 लाख रुपये आंकी गई थी, तो 25% (37,500 रुपये) के बजाय केवल 30,000 रुपये देने के पर्याप्त और न्यायसंगत कारण दर्ज करना फैमिली कोर्ट के लिए आवश्यक था।
