साइबर ठगी करने वाले सिर्फ लोगों को अपने जाल में नहीं फंसाते, बल्कि ठगी की रकम को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाने के लिए बैंक खातों का भी पूरा इंतजाम रखते हैं. मुंबई की खार पुलिस ने ऐसे ही एक नेटवर्क की परतें खोली हैं, जहां बैंक खातों का इस्तेमाल कथित तौर पर साइबर ठगी की रकम को इधर-उधर करने के लिए किया जा रहा था. पुलिस की जांच में 22 बैंक खाते सामने आए हैं, जिनका कनेक्शन देशभर में दर्ज 42 साइबर फ्रॉड शिकायतों से मिला है. इन शिकायतों में करीब 7 करोड़ 42 लाख 28 हजार 409 रुपये की ठगी का आंकड़ा सामने आया है. इस मामले में पुलिस ने अविनाश बाबासाहेब खरात को गिरफ्तार किया है, जबकि उसके साथ जुड़े बताए जा रहे विकास गजानन भुजबळ की भूमिका की जांच की जा रही है.
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टेलीग्राम से शुरू हुआ खेल, मुनाफा कमाने का दिया लालच
रैकेट का खुलासा खार पुलिस स्टेशन में दर्ज एक साइबर फ्रॉड की जांच के दौरान हुआ. शिकायतकर्ता से टेलीग्राम के जरिए संपर्क किया गया. उसे ऑनलाइन टास्क पूरा करने और इसके बदले मोटा मुनाफा कमाने का लालच दिया गया.शुरुआत में सब कुछ भरोसेमंद दिखाने की कोशिश की गई और फिर शिकायतकर्ता से अलग-अलग बैंक खातों में पैसे जमा कराने को कहा गया. मुनाफे की उम्मीद में शिकायतकर्ता ने कुल 4 लाख 7 हजार 764 रुपये जमा कर दिए. लेकिन रकम खाते में पहुंचते ही कहानी बदल गई. न मुनाफा मिला, न मूल रकम वापस आई. ठगी का एहसास होने के बाद शिकायतकर्ता ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया.
हेल्पलाइन और साइबर पोर्टल ने खोली खातों की कड़ियां
मामला दर्ज होने के बाद खार पुलिस ने सिर्फ शिकायतकर्ता के खाते तक जांच सीमित नहीं रखी. तकनीकी जांच के जरिए उन बैंक खातों और ट्रांजैक्शन की कड़ियां जोड़ी गईं, जहां शिकायत की रकम पहुंची थी. पुलिस ने साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 और साइबर समन्वय पोर्टल से मिली जानकारी को भी जांच में शामिल किया. एक-एक बैंक खाते और उसके लेन-देन को खंगालने के बाद जांच की दिशा अविनाश खरात और विकास भुजबळ तक पहुंची. इसके बाद पुलिस ने अविनाश खरात को गिरफ्तार कर लिया.
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जांच में मिला बैंक खातों का जाल, एक नाम पर 13 खाते
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस के सामने बैंक खातों का ऐसा जाल आया, जिसने मामले को एक सामान्य साइबर ठगी से कहीं बड़ा बना दिया. पुलिस के मुताबिक, अविनाश खरात के नाम पर 13 बैंक खाते, जबकि विकास भुजबल के नाम पर 9 खाते मिले हैं. यानी दोनों के नाम से कुल 22 बैंक खाते सामने आए. पूछताछ में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने कथित तौर पर अपने अलावा दूसरे लोगों के नाम पर भी बैंक खाते खुलवाए थे. इन खातों को साइबर ठगी करने वालों को इस्तेमाल के लिए दिए जाने का संदेह है. यही खाते साइबर अपराधियों के लिए ठगी की रकम पहुंचाने और आगे ट्रांसफर करने का जरिया बने.
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म्यूल अकाउंट आखिर क्या होता, जिसके जरिए ठगी हुई
साइबर अपराध की भाषा में ऐसे बैंक खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल ठगी या दूसरे गैर-कानूनी तरीके से हासिल रकम को प्राप्त करने और आगे दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है. सीधे शब्दों में कहें तो साइबर ठग खुद जिस खाते का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, उसके लिए ऐसे खातों का सहारा लेते हैं. खार पुलिस की जांच में भी कथित तौर पर इसी तरह के बैंक खातों का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है.
22 खातों की जांच ने खोली 7.42 करोड़ की ठगी की कहानी
पुलिस के लिए सबसे बड़ा सुराग तब मिला, जब इन 22 बैंक खातों को साइबर समन्वय पोर्टल पर जांचा गया. इन खातों से देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज 42 साइबर फ्रॉड शिकायतों का कनेक्शन सामने आया. इन शिकायतों में ठगी गई रकम का कुल आंकड़ा करीब 7 करोड़ 42 लाख 28 हजार 409 रुपये है. यानी खार पुलिस के हाथ सिर्फ एक शिकायत की जांच नहीं लगी, बल्कि ऐसे बैंक खातों का नेटवर्क आया, जिनसे कथित तौर पर साइबर ठगी की रकम का बड़ा लेन-देन हुआ था.
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अब फ्रॉड गैंग के असली खिलाड़ियों तक पहुंचने की कोशिश
एक गिरफ्तारी के बाद भी पुलिस की जांच खत्म नहीं हुई है. अब सवाल यह है कि इन खातों को साइबर ठगों तक कौन पहुंचाता था? इन खातों में आने वाली रकम आखिर कहां जाती थी? और इस पूरे नेटवर्क के पीछे कितने लोग काम कर रहे हैं? खार पुलिस अब अन्य आरोपियों, खातों के लाभार्थियों और पैसों के लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है. पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि 22 बैंक खातों का इस्तेमाल कितने समय से और किन-किन साइबर अपराधों में किया जा रहा था. इस मामले ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि साइबर ठगी का खेल सिर्फ फोन, लिंक या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है.
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इसके पीछे पैसों को घुमाने और असली आरोपियों तक पहुंचने से पहले उनकी पहचान छिपाने के लिए म्यूल अकाउंट का पूरा नेटवर्क भी काम कर सकता है. खार पुलिस की जांच अब इसी नेटवर्क की अगली कड़ी तलाश रही है.